डॉ दिलीप अग्निहोत्री
उत्तर प्रदेश में दलितों के नाम पर राजनीति बहुत हुई। दलितों की दुहाई देने वाले स्वयं और उनके भाई बन्धु फर्श से अर्श तक पहुंच गए। लेकिन आम दलित अपनी जगह पर रह गया। इसका कारण था कि उन्हें केवल वोटबैंक समझा गया। इस आधार पर एक राजनीतिक पार्टी पर चुनाव में टिकट देने की भारी कीमत वसूलने के आरोप भी लगते रहे है। यह आरोप उस पार्टी में कार्य करने वालों ने ही लगाए थे। यह अच्छा है कि दलित समुदाय अब ऐसे लोगों से सवाल करने लगा है। तभी से वह पार्टी हाशिये पर चली गई। जिस पार्टी को वह अपना दुश्मन मानती थी , जिसपर जानलेवा हमले और घोर अभद्र अपमान करने का आरोप लगाती लगाया जाता था, उसी से समझौते को विवश होना पड़ा। लेकिन दलित समुदाय के समक्ष ऐसी कोई विवशता नहीं है।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दलितों के आर्थिक उत्थान के प्रयास किये। इसके मद्देनजर अनेक योजनाएं चलाई। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इन योजनाओं को अपने विकास एजेंडे में प्रमुखता से शामिल किया । इसी का परिणाम था कि एक वर्ष की सीमित अवधि में दलितों के जीवन में सुधार दिखाई देने लगा। बिजली ,गैस और पक्के मकान ने उनका जीवन बदला, तो मुद्रा बैंक और कौशल विकास योजना से स्वरोजगार को बढ़ावा मिला।
योगी आदित्यनाथ इतने से ही संतुष्ट नहीं हुए। वह विकास का भौतिक सत्यापन करना चाहते थे। इस कार्य में आने वाली बाधाओं को समझना चाहते थे। आमजन के विचार से अवगत होना चाहते थे । इन सब जानकारी के आधार पर भविष्य की योजनाएं बनाना चाहते है। उत्तर प्रदेश में गांवों की स्थिति ऐसी है कि कुछ गांवों की वास्तविकता से बहुत से गांवों के संबन्ध में अनुमान लगाया जा सकता है। इस आधार पर योजनाएं बनाना सुगम हो जाता है। पहले ऐसा कोई अध्ययन नहीं किया गया। योगी ने अधिकारियों के आंकड़ों पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं किया। उन्होंने गांव में जाने , चौपाल लगाने ,दलित परिवार में भोजन करने का अभियान चलाया। यह कार्यक्रम कैसा होना चाहिए, इसका उदाहरण भी उन्होंने स्वयं प्रस्तुत किया। उनकी सादगी देख कर गांव के लोग भी आश्चर्यचकित थे। वह कल्पना भी नही कर सकते थे कि कोई मुख्यमंत्री इतना भी सादगी पसन्द हो सकता है।
उत्तर प्रदेश ग्राम स्वराज अभियान की सुनियोजित योजना योगी आदित्यनाथ ने बनाई थी। डॉ आम्बेडकर जयंती पर शुरू किए गए इस अभियान का समापन हुआ। यह निर्णय उन्होंने अपने अनुभव के आधार पर लिया था। पांच बार सांसद और देश प्रदेश की यात्राओं के दौरान उन्होंने गांव की स्थिति का बहुत करीब से अनुभव किया था। कृषि राज्य सरकार का विषय है। सपा और बसपा दोनों को यहाँ पूर्ण बहुमत से सरकार चलाने का अवसर मिला । लेकिन गांव की स्थिति सुधारने का कोई कारगर प्रयास नहीं किया गया। बिडंबना देखिये आज यही पार्टियां सरकार पर हमला बोल रही है। यह अच्छा है कि योगी ने इन बातों की कोई चिंता नहीं की। वह जानते है कि विपक्ष उनके प्रत्येक कार्य की आलोचना करेगा। उन्होंने गांव के विकास की दूरगामी योजना बनाई। इसे ग्राम स्वराज का नाम दिया गया। इसके लिए दलित बहुल और पिछड़े गांवों में चौपाल लगाने का कार्यक्रम रखा गया। इसके माध्यम से वह अपने सहयोगियों को गांव की वास्तविक स्थिति के अध्ययन में लगाना चाहते थे।
ऐसा नहीं कि इनमें से कोई गांव की स्थिति से अनभिज्ञ है। लेकिन जब ग्राम स्वराज का लक्ष्य बनाया जाता है , तो विशेष प्रकार के अध्ययन की आवश्यकता होती है। इस अभियान का यही उद्देश्य था। इसके विभिन्न चरण थे। जिसमें गांव की दशा को समझना, लोगों के विचार जानना, विकास की संभावनाओं का आकलन करना, इस आधार पर एक फीडबैक तैयार करना था। रात्रि विश्राम पर तो न्यूनतम फोकस करना था। उसे सामाजिक समरसता की दृष्टि से शामिल किया गया था। यह भी देखना था कि राज्य में दलितों के नाम पर राजनीति तो बहुत होती रही है, लेकिन गांव में उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। योगी आदित्यनाथ इस स्थिति को बदलना चाहते है। यह उम्मीद करनी चाहिए कि ग्राम स्वराज अभियान से मील फीडबैक बहुत महत्वपूर्ण होंगे। इनके आधार पर गांवों के विकास की नई योजनाएं बनाना आसान हो जाएगा।
ग्राम स्वराज अभियान गांवों खासकर दलित और पिछड़े बाहुल्य गांवों में सरकार की लोकप्रियता बढाई है। मुख्यमंत्री, मंत्रीगण , जनप्रतिनिधि आदि का सीधे जनता संवाद हुआ। बिजली कनेक्शन, गैस कनेक्शन, गरीबों को आवास, राशन कार्ड, विधवा, दिव्यांग और वृद्धा पेंशन आदि के संबन्ध में जानकारी प्राप्त की गई। योगी ने मेहंदीपुर में दलित के घर खाना खाने के बाद संक्षिप्त बात में कहा कि सरकार ने इस अभियान के तहत राज्य के चार हजार सात सौ से अधिक दलित बाहुल्य गांवों को पहले फेज में लाभांवित करने के लिए चुना है। जिनमें मेहंदीपुर की तरह काम हो रहा है। इसको बीजेपी सामाजिक भेदभाव दूर करने का प्रयास बता रही है। योगी ने दलितों से अपना पुराना रिश्ता बताया। गोरखधाम पीठ में हमेशा से जातिवाद और छुआछूत का विरोध किया। सामाजिक एकता का काम किया। योगी आदित्यनाथ के गुरु और दादा गुरु ने हमेशा मलिन और दलित बस्तियों में सहभोज किया करते थे। योगी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे है। दलितों के साथ भोजन एक पहलू है। दूसरे पहलू में उनके विकास की योजनाएं है। चालीस लाख निजी शौचालय गरीब परिवारों को देने, छत्तीस लाख गरीबों को फ्री बिजली कनेक्शन देने, सैंतीस लाख गरीबों को राशन कार्ड दिलाने, गैन कनेक्शन मुहैया कराने, युवाओं को स्टार्टअप योजना, मुद्रा योजना के तहत रोजगार मुहैया कराया जा रहा है।
आंबेडकर जयंती पर राज्य सरकार ने ग्राम स्वराज अभियान की शुरुआत की। इस अभियान की शुरुआत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री कार्यालय से अनुसूचित जाति जनजाति वर्ग के लाभार्थियों को मुफ्त कनेक्शन और चार एलईडी बल्ब देकर की। इस अभियान के तहत प्रदेश तीन हजार तीन सौ सत्तासी अनुसूचित जाति जनजाति बाहुल्य गांवों में राज्य सरकार बिजली कनेक्शन, रसोई गैस, आवास, शौचालय और स्वास्थ्य बीमा मुहैया कराएगी।
तीन हजार से अधिक गांवों में बीपीएल परिवारों को मुफ्त और एपीएल परिवारों को पचास रुपये प्रति महीने की दस आसान किस्तों पर बिजली कनेक्शन देगा। इसकी शुरुआत ऊर्जा विभाग दो हजार सैट सौ से अधिक कैंप लगाकर कर दी है। कार्यक्रम में सीएम ने कांग्रेस, सपा और बसपा पर निशाना साधते हुए कहा कि देश में लंबे समय तक कांग्रेस की सरकार रही। इसके बाद भी चार करोड़ घरों तक बिजली नहीं पहुंची। छत्तीस करोड़ लोगों के बैंक अकाउंट नहीं थे। आठ करोड़ घरों में रसोई गैस कनेक्शन नहीं था और दो करोड़ घरों में शौचालय नहीं थे। भाजपा सरकार इनके घरों में ये सुविधाएं मुहैया करवा रही है। उन्होंने कहा कि चौदह साल तक यूपी में सपा-बसपा की सरकार थी, फिर भी दोनों सरकारों ने दलितों और पिछड़ों की चिंता नहीं की।
जिन चयनित गांवों में बिजली का कोई इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है, वहां राज्य सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर मुहैया करवा कर तीस जुलाई तक कनेक्शन दे देगी। सपा सरकार ने एक साल में आठ लाख चवालीस हजार घरों में बिजली कनेक्शन दिए जबकि योगी सरकार ने छत्तीस लाख घरों में कनेक्शन दिया। सपा करीब पैतीस हजार मजरों तक जबकि योगी सरकार ने इकसठ हजार से अधिक मजरों तक बिजली पहुंचा दी है। इस दौरान पन्द्रह बिजली पारेषण उपकेंद्रों का लोकार्पण किया गया। जाहिर है कि विकास की बड़ी योजना के साथ योगी सरकार दलितों के द्वार पर पहुंची थी। दलितों के यहां भोजन करने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी जाते थे। लेकिन उनके पास दलितों के विकास का कोई एजेंडा ही नहीं था। जबकि उस समय केंद्र में उनकी सरकार हुआ करती थी। मायावती ने निर्धन दलितों को कभी अपने पास आने नहीं दिया। रैलियों में भीड़ बढ़ाने के लिए उनका उपयोग अवश्य किया। सपा ने इस लिए दलित समाज की उपेक्षा की, क्योकि उन्हें वह अपनी दुश्मन बसपा का वोटबैंक मानती थी।
नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की सरकार ने वोटबैंक की राजनीति को दरकिनार कर दलितों को आर्थिक रूप में स्वावलंबी बनाने का प्रयास किया। इन सरकारों ने सीमित अवधि में रिकार्ड कार्य किया है। इनसे दलितों के जीवन मे बड़ा सुधार हो रहा है। योगी आदित्यनाथ ने अमरोहा के दलित बहुल गांव मेहंदीपुर पहुंचे थे। एक दिन गांव के लिए अभियान के तहत योगी ने गांव वालों की समस्याएं सुनीं। उन्होंने अधिकारियों को साफ निर्देश दिए थे कि आम जनता को अपनी बात रखने से रोका नहीं जाए। मुख्यमंत्री इस दौरान साधारण तरीके से गांव में रहे। इसके अलावा उन्होंने एसी, कूलर या मच्छरदानी का इंतजाम नहीं करने के निर्देश गए थे।वह चाहते थे कि लोगों को यह लगे कि उनके बीच का ही कोई व्यक्ति उनके साथ बैठा है। मुख्यमंत्री की वस्तुतः यही जीवन शैली है। जो अधिकारी उनके सन्यासी जीवन शैली से परिचित नहीं थे , वह पिछली सरकारों के मुख्यमंत्रियों की भांति योगी की यात्रा में भव्य इंतजाम कर देते थे। योगी ने खुद इस पर रोक लगाई थी। ग्राम स्वराज अभियान में प्राप्त फीडबैक के आधार पर एक रिपोर्ट अगले कुछ दिनों में तैयार हो जाएगी। इसके आधार पर समग्र ग्राम विकास को गति दी जाएगी।






