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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    पंथनिरपेक्षता विचार है आडंबर नहीं

    By June 29, 2018 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    सात वर्ष बाद देश की सियासत में टोपी प्रकरण एक बार फिर चर्चा में है। दो हजार ग्यारह में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी विशेष मजहबी टोपी पहनने से विनम्रतापूर्वक इनकार किया था। इतिहास ने अपने को एक बार फिर दोहराया है। मगहर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विशेष टोपी लेने से हाथ जोड़ कर इनकार किया।
    विपक्षी पार्टियां तो जैसे तैयार बैठे थे। उन्हें सात वर्ष पहले वाली ऊर्जा मिल गई। उनकी प्रतिक्रिया से लगा कि जैसे इस प्रकार की टोपियां ही धर्मनिरपेक्षता की प्रतीक होती है। पहन ली तो धर्मनिरपेक्षता, न पहनी तो साम्प्रदायिक।
    इस प्रकार के विचारों ने ही मुसलमानों का अहित किया है। उन्हें ऐसे ही आडम्बरों से भृमित किया गया। ऐसे ही लोगों के शासन में मुसलमानों की स्थिति सर्वाधिक दयनीय रही है। कांग्रेस, कम्युनिस्ट,राजद ,सपा,जैसी पार्टियों के रिकार्ड का अध्य्यन किया जा सकता है।
    वसुधा को कुटुंब मानने वाली संस्कृति में पंथनिरपेक्षता का स्वभाविक समावेश होता है। इसके लिए अलग से किसी आडंबर की आवश्यकता नहीं होती है। भारतीय संविधान के निर्माता इस तथ्य से परिचित थे। इसलिए उन्होंने मूल संविधान की प्रस्तावना में इस शब्द का उल्लेख नहीं किया था। यह शब्द उन्नीस सौ छिहत्तर में  बयालीसवें संविधान संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था। बिडंबना यह कि इसके बाद धर्मनिरपेक्षता नाम से यह शब्द सियासत में फैशन की तरह शामिल हो गया।
    योगी आदित्यनाथ कबीर की मजार पर व्यवस्थाएं देखने पहुंचे थे। वहां के व्यवस्थापक ने योगी के हाथ में टोपी थमाने का प्रयास किया लेकिन योगी ने इनकार करके हाथ जोड़ लिए। व्यवस्थापक समझ गए कि योगी टोपी नहीं पहनना चाहते हैं। इसके बाद उन्होंने टोपी के लिए कोई आग्रह नहीं किया। इस बात को उन्होंने सहजता से लिया। लेकिन अपने को सेक्युलर बताने वाले नेताओं ने यह मुद्दा लपक लिया।
    अहमदाबाद जिले के पीराणा गांव के इमाम शाही सैय्यद ने मंच पर मोदी को भेंटस्वरूप इस्लामिक टोपी पहनाने की कोशिश की थी। उन्होंने जेब से टोपी निकाली थी। मोदी ने हाथ जोड़कर उनसे कुछ कहा। इसके बाद इमाम ने अपने गले में पड़ी शाल उन्हें ओढ़ा दी थी और टोपी जेब में रख ली।  मामला मीडिया में उछला तो कांग्रेस और मोदी विरोधियों ने भी इसे तूल दे दिया था। जबकि  इमाम ने इसे इस्लाम का अपमान था।
    सेक्युलर शब्द के परिवेश और तात्पर्य को समझने की आवश्यकता है। इसका प्रचलन यूरोप में शुरू हुआ था। ब्रिटेन में चर्च और राजसत्ता के बीच श्रेष्ठता को लेकर लंबा विवाद चला था। अंत एक समझौता हुआ। इसमें शक्तियों का विभाजन हुआ। यह तय हुआ कि पारलौकिक विषयों पर चर्च और लौकिक विषयों पर राजसत्ता का अधिकार होगा। लौकिक का मतलब ही सेक्युलर था। भारत में यह वोटबैक की सियासत करने वालों के लिए यह सबसे प्रिय मुद्दा बन गया।
    भारतीय सन्दर्भ में इसका मतलब है कि शासन सत्ता पंथ के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगी। प्रत्येक नागरिकों को अपने पंथ के पालन का अधिकार होगा। एक दूसरे को परेशान करने वाले कार्य नहीं किये जयेगे। इसमें आडम्बर की कोई आवश्यकता नहीं है। योगी आदित्यनाथ गोरक्षा पीठाधीश्वर भी है। उन्हें इस पीठ के नियमों का भी पालन करना होता है। इसमें टोपी का निषेध है। जिन धार्मिक स्थलों पर सिर ढंक कर जाने का नियम है, वहां योगी कंधे धारण वस्त्र को ही सिर पर रख लेते है। नरेंद्र मोदी भी ऐसे नियमों का सम्मान करते है।
    वैसे अपने पंथ की विशेष टोपी किसी अन्य को पहनाने का प्रयास करना अनुचित है। जबकि ऐसा करने वाले दूसरे पंथों के रंग,नियम ,वस्त्र धारण नहीं करते। जो व्यवहार आपको पसंद नहीं आता, उसे दूसरों पर भी प्रयुक्त नहीं करना चाहिए। इस संबन्ध में सिख गुरुद्वारों से प्रेरणा लेनी चाहिए। यहां गुरुग्रन्थ साहब के समक्ष सिर ढंक कर आने का नियम है। सिख लोग पगड़ी बांधते है। लेकिन जो पगड़ी नही बांधते,उनके लिए रुमाल की व्यवस्था होती है। वह अपना रुमाल भी सिर पर रख सकते है। ऐसा नहीं होता कि वहाँ के व्यवस्थापक किसी आगंतुक को पगड़ी पहनाने का प्रयास करे। बताया जाता है फिकरों के हिसाब से टोपियों में भी अंतर होता है। ऐसे में किसी अन्य आगंतुक के लिए ऐसा करना उचित कैसे हो सकता है।

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