जम्मू कश्मीर में भाजपा के द्वारा गठबंधन को दिया गया महबूबा सरकार को करारा झटका एक मिसाल है राज्य में पिछले तीन सालों से जो वहां हालात है उन पर महबूबा सरकार का कोई नियंत्रण नहीं था। फिलहाल अब वहां राज्यपाल शासन है। और केंद्र सरकार वहां आतंकियों के खिलाफ और कड़े कदम उठा रही है।सुरक्षाबलों ने ऑपरेशन ऑल आउट पूरी सख्ती के साथ नए सिरे से आपरेशन शुरु कर दिया है, जिससे अलगाववादी संघटनओं और आतंकियों के माथे पर पसीना ला दिया है।
घाटी में आतंकियों की तलाश और उनके सफाई का काम तेज हुआ तो कुछ शुरुआती सफलता भी मिली है। आतंकवाद से निपटने की रणनीति में बदलाव हुआ है। सरकार ने शक्ति का एक और कदम बढ़ाया है जिसके अंतर्गत मुठभेड़ में मारे गए आतंकियों का जनाजा निकालने पर प्रतिबंध लगाया गया है। सैनिक कारवाई में अब जो दहशतगर्द मारे जाएंगे, उन्हें दफनाने की जिम्मेदारी सुरक्षाबल ही उठाएंगे। अभी तक विदेशी आतंकियों के जनाजे पर प्रतिबंध था, लेकिन अब देश के दहशतगर्दों पर भी यही नियम लागू होगा।

ऐसा कदम इसलिए उठाना पड़ा क्योंकि अक्सर देखा गया है कि आतंकियों के जनाजे में शामिल होने वाली भीड़ के बाद और उनके जनाजे के भक्तों की तस्वीरों आतंकी सरगनाओं की तकरीर आज के प्रभाव में आकर घाटी में आतंकी पैदा होने की खबरें आ रही थी।
बुरहान वानी के जनाजे के बाद भी इस बात की पुष्टि हुई थी कि कुछ युवा हिजबुल मुजाहिदीन में शामिल हुए इसके बाद तो आतंकी के जनाजे के बाद ऐसा ही हुआ और कुछ युवा चरमपंथी संगठनों में शामिल होने लगे। पार्टी के युवाओं का आतंकियों के संगठन में शामिल होना सुरक्षा बलों के लिए सिरदर्द साबित हो रहा था। आतंकी बने युवाओं को चिन्हित करना भी जटिल काम था। आतंकी ही नहीं किसी भी व्यक्ति के मृत शरीर का अंतिम संस्कार उसके अपने रीति-रिवाज के अनुसार करने का उसके परिजनों को पूरा अधिकार होता है। इसी अधिकार के मद्देनजर मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों का शरीर उनके परिजनों को सौंप दिया जाता था लेकिन इस अधिकार का गलत फायदा उठाने की कोशिश होती रही, हर आतंकवादी के जनाजे में घाटी के हजारों की संख्या में लोग शामिल होने लगे और आतंकी को शहीद की तरह महिमामंडित किया जाने लगा।
वहां चरमपंथी तकरीरें कर लोगों को भड़काने का काम करते रहे बंदूक दाग कर आतंकी को सलामी दी जाती थी। जनाजे की तस्वीरें और वीडियो, सोशल मीडिया के जरिए प्रसारित कर युवाओं को बरगलाया जाता। जनाजे में इतनी ज्यादा भीड़ हो जाती थी कि आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई मुश्किल हो जाती थी। समझा जा सकता है कि यदि चरमपंथी संगठन में स्थानीय युवा भर्ती होने लगे और एक आतंकी के मारे जाने की प्रतिक्रिया में नए आतंकी पैदा होने लगे। आतंकियों के जनाजे की घाटी में आतंकियों की खेप तैयार करने का कारण बनने लगे तो सुरक्षा बलों की मुश्किलें कितनी बढ़ जाएंगी ऐसे में आतंकियों के जनाजे पर रोक का ही तो विकल्प बचता है।
-नीतू सिंह







