डॉ दिलीप अग्निहोत्री
कर्नाटक चुनाव परिणाम का कई प्रकार से विश्लेषण हो सकता है। लेकिन एक बात तय है कि यह जनादेश कांग्रेस के विरुद्ध है। इसके अलावा जनता दल सेकुलर और कांग्रेस दोनों एक दूसरे पर जम कर हमला बोल रही थी ,खुद राहुल गांधी और सिद्धरमैया ने जदयू प्रमुख देवगौड़ा के खिलाफ मोर्चा खोला था। यहाँ कहने का यह मतलब नहीं कि एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले त्रिशंकु विधानसभा में मिल कर सरकार नहीं बना सकते। जम्मू कश्मीर में ऐसी ही सरकार चल रही है। लेकिन कर्नाटक में एक कांग्रेस और जदयू के बीच चुनाव पूर्व गठबन्धन नहीं था। जबकि भाजपा अकेली सबसे बड़ी पार्टी है। ऐसे में राज्यपाल के समक्ष सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने का विकल्प उपयुक्त था। इसकी तुलना गोवा या पांडिचेरी से नहीं की जा सकती। वहां जिन भाजपा के साथ चुनाव लड़ने वाले विधायको ने ही समर्थन दिया था। इसलिए कांग्रेस का दावा अपने आप कमजोर पड़ गया था।कर्नाटक चुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच था। जनता दल सेकुलर भी तीसरी ताकत के रूप में मौजूद थी। पहले मुख्य मुकाबले वाली पार्टियों की स्थिति पर गौर करिए।
देश में कांग्रेस और भाजपा दोनों राष्ट्रीय पार्टियां है। इनके संबन्ध में एक निष्कर्ष कर्नाटक चुनाव से निकला है। इसके अनुसार कांग्रेस को अपने प्रांतीय नेताओं के भरोसे ही चुनावी समर में उतरना पड़ेगा। उन्हें केंद्रीय नेतृत्व से कोई उम्मीद नहीं करनी चाहिए। बल्कि ये लोग जितना सक्रिय होंगे , उतने ही नुकसान की संभावनारहेगी। दूसरी तरफ भाजपा को अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष , प्रधानमंत्री और प्रांतीय नेताओं की छवि का भी लाभ मिल रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर संघठन और प्रधानमंत्री के पद अलग हांथों में है। अमित शाह संघठन और प्रबंधन में बेजोड़ है। नरेंद्र मोदी आज भी देश की राजनीति के सर्वाधिक लोकप्रिय और विश्वसनीय नेता है। इसी के साथ प्रांतीय स्तर पर भी लोकप्रिय नेताओ की कमी नहीं है। कर्नाटक में येदुरप्पा लिंगायत समुदाय के है। उनका जनाधार भी है। इसके अलावा भाजपा की जीत में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का भी उल्लेखनीय योगदान था। उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश सुशासन की दिशा में बढ़ रहा है। सिद्धरमैया सपा शासन की भांति केंद्र की योजनाओं का मखौल बनाते रहे। इसका नुकसान आमजन को हुआ । जबकि योगी ने इन योजनाओं को लागू किया। एक वर्ष में रिकार्ड कार्य हुए है। कर्नाटक में कांग्रेस ने हिन्दू धर्म में विभाजन का कार्य किया। योगी आदित्यनाथ ने एकता का सन्देश दिया।
जबकि कांग्रेस को प्रत्येक स्तर पर कमजोर नेतृत्व के चलते नुकसान हुआ। कर्नाटक के पहले भी यही देखा गया। जहाँ प्रांतीय नेतृत्व कमजोर पड़ा,वहां कांग्रेस पराजित होती चली गई। पंजाब एक अपवाद रहा। यहां कांग्रेस ने अकाली दल को पराजित करके सरकार बनाने में सफलता प्राप्त की। इसका श्रेय भी मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को मिला । बताया जाता है कि उम्मीदवारों के चयन से लेकर प्रचार तक उनके नियंत्रण में चला था। चुनाव के पहले उन्होंने हाईकमान को अपनी इस शर्त से अवगत करा दिया था। यह शर्त मंजूर करनी पड़ी। अमरिंदर सिंह के नाम पर वहां कांग्रेस की सरकार बनी। उत्तर प्रदेश का उदाहरण तो सर्वाधिक दिलचस्प है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी , पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी उत्तर प्रदेश की है ,यही दो लोग यहां से लोकसभा में है। लेकिन प्रांतीय संघठन बदहाल है । उसका असर पार्टी पर साफ दिखाई देता है।
कर्नाटक मुख्यमंत्री सिद्धरमैया के नेतृत्व में ही पार्टी चुनावी मोर्चे पर थी । लेकिन उनकी सरकार पर भ्र्ष्टाचार के बेहिसाब आरोप थे। कहा जा रहा था कि जबसे अधिकांश राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई है, तब से सिद्धरमैया के ऊपर बोझा बढ़ गया था। पार्टी की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में उनकी हिस्सेदारी बहुत बढा दी गई थी। इसका प्रतिकूल असर सरकार पर हो रहा था। सिद्धरमैया इसे समय रहते समझ नहीं सके। जब समझे ,तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लिंगायत समुदाय को अलग धर्म की मान्यता का प्रस्ताव पारित कर दिया। केंद्र की मनमोहन सिंह सरकार ने इस प्रस्ताव को मानने से इनकार कर दिया था पुनः उसे लाने की आवश्यकता नहीं थी। कर्नाटक में पांच वर्ष तक शासन करने के बाद भी कांग्रेस उपलब्धियों के नाम पर खाली हाथ थी। यह विरोधियों का आरोप नहीं, उसकी खुद की कवायद से उजागर हुआ। धर्म विभाजन के आधार पर अपनी सत्ता बचाने का अंतिम प्रयास किया। मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने का प्रस्ताव पारित किया। कांग्रेस की त्रासदी समझी जा सकती है। इसके लिए उसने विभाजनकारी चाल चलने में संकोच नहीं किया।
इसका दोहरा नुकसान हुआ। एक सरकार की छवि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। यह माना गया कि उसके पास अपनी उपलब्धियां बताने के लिए कुछ नहीं है। दूसरा यह कि इतने हल्के ढंग से यह विषय उठाने से लिंगायत समुदाय भी खुश प्रभावित नहीं हुआ। क्योकि यह विशुद्ध राजनीतिक चाल थी।
लिंगायत या वीरशैव का आदि स्रोत भारतीय दर्शन ही है, जिसमें भगवान शिव सर्वत्र पूज्य हैं। भारतीय राष्ट्र को इन धार्मिक तत्वों ने सदैव जोड़ कर रखा है। यहां तक कि विदेशी आक्रांता भारत को राजनीतिक रूप से गुलाम बनाने में अवश्य सफल रहे थे, लेकिन विविधता के बाबजूद भारत एक राष्ट्र बना रहा। कांग्रेस के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने वह कार्य किया है, जिसका साहस विदेशी आक्रांता भी नहीं कर सके। केवल कुर्सी के लिए ऐसी कुटिलता का प्रदर्शन किया गया। कर्नाटक में कांग्रेस नरेंद्र मोदी के विकास के एजेंडे के सामने ठहर नहीं सकी। वह नकारात्मक मुद्दे उठाकर विकास से लोगों का ध्यान भटकाना चाहती थी। उसने लिंगायत को अलग किया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के खिलाफ झूठा प्रचार किया। ये सब नकारात्मक राजनीति थी।
कांग्रेस को लगता है कि संघ पर हमला बोलकर वह अपना समीकरण दुरुस्त कर लेगी। लेकिन, वह मतदाताओं के मिजाज को समझने में विफल रही। लोग जानते हैं कि सच्चाई क्या है। झूठ का सहारा लेकर लोगों को भ्रमित नहीं किया जा सकता। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक बार भी सरकारी नौकरियों में आरक्षण समाप्त करने की बात नहीं की। लेकिन, कांग्रेस झूठ का सहारा ले रही थी। वह कहती रही कि संघ आरक्षण समाप्त करना चाहता है। कर्नाटक चुनाव में भी कांग्रेस का यही राग अलापा था। यह दांव भी उल्टा पड़ा। इसके अलावा पांच वर्षों की नाकामी सिद्धारमैया की मुसीबत बन गई । बतौर मुख्यमंत्री उनके पास अपनी उपलब्धियां बताने के लिए कुछ भी नहीं है। यह विरोधियों का आरोप नहीं था। बल्कि इसे सिद्धारमैया स्वयं प्रमाणित कर रहे थे। विकास की जगह लिंगायत और संघ के प्रति उनका ज्यादा आकर्षण था। राहुल गांधी के लिए तो वैसे भी नरेंद्र मोदी और संघ पर हमला बहुत प्रिय विषय है। मसला कुछ भी हो, वह अपनी इसी धुन में रहते हैं। राहुल गांधी कर्नाटक में भी यही कर रहे थे। ऐसे में परिणाम भी ऐसे ही मिलने थे। कांग्रेस को जदयू के सामने समर्पण करना पड़ा।







