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    कृतिम बहार में आनन्दित विपक्ष

    By May 24, 2018 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    विपक्ष के अंगना में बड़े समय बाद बहार दिखाई दी। इसमें शामिल नेताओं का उत्साह देखने लायक था।बंगलुरू में कुमारस्वामी का शपथ ग्रहण समारोह इसका गवाह बना।  कुछ पल के लिए ऐसा लगा, जैसे इन्हें विजय श्री जनादेश से नसीब हुई है। सभी के चेहरे पर गौरव का भाव था। वह भी गदगद थे, जिन्हें कर्नाटक के लोग ठीक से पहचानते भी नहीं है , वह लोग भी चहक रहे थे, जिनका अस्तित्व अपने ही गढ़ में खतरे का सामना कर रहा है। प्यासी धरती पर पानी की बौछार  हो रही थी। लगातार पराजय और ईवीएम को कोसते कोसते ये नेता भी आजिज आ गए थे। भला हो जेडीएस और कांग्रेस का, एक दुज़रे कि बखिया उधेड़ते हुए एक मंच पर आ गए।
    लेकिन यह बहार स्वभाविक नहीं थी। इसका कृतिम तरीके से इंतजाम किया गया था। कांग्रेस एक सौ बाइस से अठहत्तर पर खिसक गई थी। यह तो पतझड़ था। जेडीएस की अधिकांश सीटों पर जमानत जब्त हो गई थी । पार्टी के मुखिया प्रधानमंत्री रह चुके है। बेटा मुख्यमंत्री था, लेकिन पुर जोर लगाने के बाद अड़तीस सीट नसीब हुई। यह भी बाहर की निशानी नहीं थी। कांग्रेस और जेडीएस मिल कर लड़ी होती, तो माना जाता कि जनादेश इनके लिए था। लेकिन चुनाव में दोनों ने एक दूसरे की जड़ खोदने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। तब कांग्रेस जेडीएस को भाजपा की बी टीम बता रही थी। इस हिसाब से तो भाजपा के एक सौ चार और जेडीएस को अड़तालीस सीट देने वाले मतदाता कांग्रेस को सत्ता में नहीं देखना चाहते थे। इसमें बसपा का एक प्रत्याशी भी शामिल था। यह योग एक सौ बयालीस बनता है। कांग्रेस बहुत पीछे थी। लेकिन जो एक दूसरे के खिलाफ थे, वह मिल गए। कहा यह जनादेश है, यह प्रजातन्त्र का सम्मान है। इस प्रकार जश्न ए  बहारा का कृतिम इंतजाम किया गया था।
    क्षेत्रीय दल अपने ही प्रदेश में बढ़िया प्रदर्शन कर लें ,यही उनके लिए बहुत होता है। ऐसे क्षेत्रीय दल जब किसी अन्य प्रदेश में एक दो सीट जीतते है ,तो वह संबंधित प्रत्याशी की ही जीत होती है। नेतृत्व का करिश्मा एक सीट में ही कैसे सिमट सकता है। इस जमावड़े के कुछ दिलचस्प नजारे भी थे। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा दोनों को कांग्रेस का साथ पसन्द नहीं है। कुछ दिन पहले ही बसपा प्रमुख ने कांग्रेस के खिलाफ बयान दिया था। कर्नाटक में जब येदुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी , तब इसके लिए मायावती ने कांग्रेस को ही जिम्मेदार बताया था। लेकिन बंगलुरू के मंच पर सोनिया गांधी ने मायावती को जगह देने के लिए अजित सिंह को किनारे कर दिया। अजित सिंह वैसे भी समझौते का दर्द दबाए बैठे है। वह कैराना में अपनी मर्जी से अपनी पार्टी के मूल कैडर का प्रत्याशी उतार नहीं सके। प्रत्याशी गठबन्धन के दूसरे दल ने तय किया था । उसे अजित की पार्टी में भेजा गया । उनके सामने की विकल्प ही नहीं था। बिडंबना देखिये बंगलुरू में ये नेता देवगौड़ा के बेटे की ताजपोशी में जुटे थे , लेकिन अजित सिंह के बेटे को कैराना से उम्मीदवार तक नहीं बनाया गया। इसके बाद भी कहा जा रहा है कि गठबन्धन बहुत मजबूत है।
    गठबन्धन तो होना ही था । सपा बसपा सीट के हिसाब से जहाँ पहुंच गए है ,उसके बाद इनके सामने कोई अन्य रास्ता भी नहीं बचा था। लेकिन असली परीक्षा तब होगी जब मुख्यमंत्री पद का निर्धारण करना होगा। जब बंगला का इतना मोह होता है , तब मुख्यमंत्री की कुर्सी की तो बात ही अलग है। बिहार से तेजश्वी यादव भी यहां पहुंचे थे। जाहिर है की कांग्रेस और राजद यहां मिल कर चुनाव लड़ेंगी। यह अपनी वर्तमान संख्या देखकर खुश है। लेकिन यह संख्या इनको नीतीश कुमार की बेदाग छवि का समर्थन और नेतृत्व मिलने के बाद मिली थी। उसके पहले कांग्रेस और राजद दोनों बिहार की राजनीति में हाशिये पर जा चुके थे। इस बार नीतीश और भाजपा मिल कर चुनाव लड़ेंगे। ममता बनर्जी , चन्द्र बाबू नायडू , नवीन पटनायक कांग्रेस सहित किसी भी पार्टी को चुनाव में अहमियत नहीं देंगे। फिर भी पटनायक को छोड़ कर अन्य विपक्षी नेताओं ने गठबन्धन की कृतिम बहार का लुफ्त उठाया। इसके पहले चुनावी तूफान ने इनकी जमीन पर तबाही ला दी थी। यहां एक दूसरे का हाँथ थामे अनेक नेताओं की पार्टियों का लोकसभा में अस्तित्व ही नही है। ये जानते है कि कही अगला चुनाव भी ऐसे ही निकल गया तो अस्तित्व पा स्थाई संकट आ जायेगा। इसलिए इन्हें  अपने दुश्मनों के साथ भी मुस्कुराना पदः रहा है।
    कुछ भी हो कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण में विपक्षी नेताओं का जमावड़ा कहीं न कहीं उनकी परेशानी से प्रेरित था। यही परेशानी इनको यहां तक खींच लाई थी। इनमें यदि ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू को हटा दें तो किसी में भी अब अकेले चुनाव लड़ने का साहस नहीं बचा है।
    सन्योग से ये दोनों कांग्रेस से भी दूरी बनाकर रखना चाहते है। आंध्र प्रदेश और प बंगाल में इन पार्टियों को कांग्रेस से मुकाबला करना है। विपक्षी एकता के बीच ममता बनर्जी ने बंगलुरू में ही कांग्रेस को निराश करने वाला बयान दिया। उन्होंने कहा कि वह क्षेत्रीय दलों के संपर्क में रहेगी। जिससे संघीय ताने बाने को बनाये रखा जाए। ममता की इस रणनीति में कांग्रेस का कहीं नाम तक नहीं है। यही रणनीति चंद्रबाबू नायडू की है। ये लोग ऐसे मंच का प्रयोग तीसरे मोर्चे के लिए  करना चाहते थे। मतलब इस एकता के पीछे भी विभाजन छिपा हुआ है। जो लोकसभा चुनाव में  प्रकट रूप से दिखाई देगा। जब ये क्षेत्रय दल कांग्रेस को भी औकात में रखने का प्रयास करेंगे। तेलंगाना के मुख्यममत्री चंद्रशेखर राव आज भी तीसरे मोर्चे के हिमायती है। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति देखना भी दिलचस्प है। गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में सपा बसपा ने कांग्रेस को घास नहीं डाली। मजबूरी में उसे चुनाव में उतरना पड़ा। जमानत बचाने के लाले पड़ गए थे।  कैराना और नूरपुर में भी कांग्रेस के साथ बेकद्री का व्यवहार किया गया। उधर बंगलुरू में मायावती और सोनिया गांधी बिछड़ी बहनों की तरह मिल रही थी , इधर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को कोई पूंछने वाला नहीं है। प्रदेश का संघठन इस नजारे को देख कर हतप्रभ है।
    इन सबसे स्पष्ट नजरिया उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने अपनाया। उन्होंने कहा कि वह बंगलुरू जैसे समारोह में नहीं जाते है। कांग्रेस और भाजपा से उनकी समान दूरी है। इस प्रकार नवीन पटनायक इस घालमेल की राजनीति से बिल्कुल अलग दिखाई दिए। जबकि अनेक पार्टियां दोहरे मापदंड लेकर चल रही है। जहां इनका प्रभाव है ,वहां ये कांग्रेस को कमजोर करने का प्रयास कर रही है। मंच पर दोस्ती का पैगाम दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में सपा बसपा अन्य किसी को तरजीह नहीं दे रहे है। इन दोनों पार्टियों को  अपने जातीय और मजहबी समीकरण पर विश्वास है। अन्य किसी भी प्रान्त में विपक्षी एकता का खास महत्व नहीं है। वहां एक ही क्षेत्रय पार्टी का महत्व है। उन्हें किसी अन्य पार्टी की कोई जरूरत भी नहीं है। जाहिर है कि दोस्ती के इस अभिनय के पीछे गहरे अंतर्द्वंद है। ये भाजपा से लड़ना चाहते है , अकेले लड़ने की हिम्मत नहीं रही,  लेकिन इस जंग में अपने ही घोषित साथी से पिछड़ना भी नहीं चाहते। इसलिए गठबन्धन के बाबजूद  वोट ट्रांसफर की गारंटी नहीं रहेगी। इसके अलावा इनकी एकता का कोई वैचारिक आधार नही है। केवल नरेंद्र मोदी का भय इन्हें एक मंच पर खींच लाया है। मतलब नकारात्मक रूप में इनको भी मोदी मोदी बी कहना होगा।

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