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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    लुप्त होती पारंपरिक जल-प्रणालियां!

    By April 24, 2018 Current Issues No Comments8 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    गरमी ने रंग दिखाना शुरू ही किया कि देश का जल संकट नीति निर्माताओं को पानी-पानी कर रहा है। असल में न तो हमारे यहां बरसात पानी की कमी है और ना ही उसे सालभर सहेज कर रखने की की कोई योजना। दुर्भाग्य है कि जैसे-जैसे समाज ज्यादा उन्नत, विकसित और तकनीकी-प्रेमी होता गया, अपनी परंपराओं को बिसरा बैठा। पहले-पहल तो लगा कि पानी पाईप के जरिये घर तक नल से आएगा, खेत में जमीन को छेद कर रोपे गए नलकूप से आएगा, लेकिन जब ये सब  ‘चमत्कारी उपाय’(?) फीके होते गए तो मजबूरी में पीछे पलट कर देखना पड़ा। शायद समाज इतनी दूर निकल आया था कि अतीत की समृद्ध परंपराओं के पद-चिन्ह भी नहीं मिल रहे थे। तभी तो अब पूरे मुल्क में सारे साल, भले ही बाढ़ वाली बारिश गिर रही हो, पानी के लिए दैया-दैया होती दिखती है। भले ही रोज के अखबार मुल्क में पानी के भीषण संकट की खबरें छापतें हों, लेकिन हकीकत यह है कि भारत जल निकायों के मामले में दुनिया के सबसे धनी देशों में से एक है। तालाब, कुंए, बावडी, कुएं, नदी, झरने, सरिताएं, नाले…… ना जाने कितने आकार-प्रकार के जल-स्त्रोत यहां हर गांव-कस्बे में पटे पड़े हैं। कभी जिन पारंपरिक जल स्त्रोतों का सरोकार आमजन से हुआ करता था, उन निधियों की कब्र पर अब हमारे भविष्य की इमारतें तैयार की जा रही हैं।

    राष्ट्रीय स्तर पर 5723 ब्लॉकों में से 1820 ब्लॉक में जल स्तर खतरनाक हदें पार कर चुका है। जल संरक्षण न होने और लगातार दोहन के चलते 200 से अधिक ब्लॉक ऐसे भी हैं, जिनके बारे में केंद्रीय भूजल प्राधिकरण ने संबंधित राज्य सरकारों को तत्काल प्रभाव से जल दोहन पर पाबंदी लगाने के सख्त कदम उठाने का सुझाव दिया है. लेकिन देश के कई राज्यों में इस दिशा में कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया जा सका है। उत्तरी राज्यों में हरियाणा के 65 फीसदी और उत्तर प्रदेश के 30 फीसदी ब्लॉकों में भूजल का स्तर चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है. लेकिन वहां की सरकारें आंखें बंद किए हुए हैं. इन राज्यों को जल संसाधन मंत्रालय ने अंधाधुंध दोहन रोकने के उपाय भी सुझाए हैं. इनमें सामुदायिक भूजल प्रबन्धन पर ज्यादा जोर दिया गया है। इसके तहत भूजल के दोहन पर रोक के साथ जल संरक्षण और संचयन के भी प्रावधान किए गए हैं। देश में वैसे जल की कमी नहीं है। हमारे देश में सालाना 4 अरब घन मीटर पानी उपलब्ध है।

    इस पानी का बहुत बड.ा भाग समुद्र में बेकार चला जाता है इसलिए बरसात में बाढ की तो गर्मी में सूखे का संकट पैदा हो जाता है। पानी के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जो सरकार लोगों को पानी न मुहैया करा सके, उसे शासन करने का कोई अधिकार नहीं है. अदालत के निर्देश पर एक उच्चस्तरीय समिति खारे पानी को पीने लायक बनाने और बरसाती पानी के प्रबंधन के सस्ते और आसान तरीके ढूंढने के लिए बनाई गई थी. इस समिति की रिपोर्ट पर क्या हुआ कोई नहीं जानता? हां यह बात सभी जानते हैं कि इस हालात का बड़ा करण पारंपरिक जल स्त्रोतों का नष्ट होना है।
    मप्र के बुरहानपुर शहर की आबादी तीन लाख के आसपास है। निमाड़ का यह इलाका पानी की कमी के कारण कुख्यात है, लेकिन आज भी शहर में कोई अठारह लाख लीट पानी प्रतिदिन एक ऐसी प्रणाली के माध्यम से वितरित होता है जिसका निर्माण सन 1615 में किया गया था। यह प्रणाली जल संरक्षण और वितरण की दुनिया की अजूबी मिसाल है, जिसे ‘भंडारा’ कहा जाता है। सतपुड़ पहाड़ियों से एक-एक बूंद जल जमा करना और उसे नहरों के माध्यम से लोगों के घ्एरों तक पहुंचाने की यह व्यवस्था मुगल काल में फारसी जल-वैज्ञानिक तबकुतुल अर्ज ने तैयार की थी। समय की मार के चलते दो भंडारे पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। यह देश-दुनिया जब से है तब से पानी एक अनिवार्य जरूरत रही है और अल्प वर्शा, मरूस्थल, जैसी विशमताएं प्रकृति में विद्यमान रही हैं। यह तो बीते दो सौ साल में ही हुआ कि लोग भूख या पानी के कारण अपने पुश्तैनी घरों- पिंडों से पलायन कर गए। उसके पहले का समाज तो हर तरह की जल-विपदा का हल रखता था। अभी हमारे देखते-देखते ही घरों के आंगन, गांव के पनघट व कस्बों के सार्वजनिक स्थानों से कुएं गायब हुए हैं।

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    बावड़ियों को हजम करने का काम भी आजादी के बाद ही हुआ।  हमारा आदि-समाज गर्मी के चार महीनों के लिए पानी जमा करना व उसे किफायत से खर्च करने को अपनी संस्कृति मानता था। वह अपने इलाके के मौसम, जलवायु चक्र, भूगर्भ, धरती-संरचना, पानी की मांग व आपूर्ति का गणित भी जानता थ। उसे पता था कि कब खेत को पानी चाहिए और कितना मवेशी को और कितने में कंठ तर हो जाएगा। वह अपनी गाड़ी को साफ करने के लिए पाईप से पानी बहाने या हजामत के लिए चालीस लीटर पानी बहा देने वाली टोंटी का आदी नहीं था। भले ही आज उसे बीते जमाने की तकनीक कहा जाए, लेकिन आज भी देश के कस्बे-शहर में बनने वाली जन योजनाओं में पानी की खपत व आवक का वह गणित कोई नहीं आंक पाता है जो हमारा पुराना समाज जानता था।

    राजस्थान में तालाब, बावड़ियां, कुई और झालार सदियों से सूखे का सामना करते रहे। ऐसे ही कर्नाटक में कैरे, तमिलनाडु में ऐरी, नगालेंड में जोबो तो लेह-लद्दाक में जिंग, महाराश्ट्र में पैट, उत्तराखंड में गुल हिमाचल प्रदेश में कुल और और जम्मू में कुहाल कुछ ऐसे पारंपरिक जल-संवर्धन के सलीके थे जो आधुनिकता की आंधी में कहीं गुम हो गए और अब आज जब पाताल का पानी निकालने व नदियों पर बांध बनाने की जुगत अनुतीर्ण होती दिख रही हैं तो फिर उनकी याद आ रही है। गुजरात के कच्छ के रण में पारंपरिक मालधारी लोग खारे पानी के ऊपर तैरती बारिश की बूंदों के मीठे पानी को ‘विरदा’ के प्रयोग से संरक्षित करने की कला जानते थे। सनद रहे कि उस इलाके में बारिश भी बहुत कम होती है। हिम-रेगिस्तान लेह-लद्दाक में सुबह बरफ रहती है और दिन में धूप के कारण कुछ पानी बनता है जो षाम को बहता है। वहां के लोग जानते थे कि षाम को मिल रहे पानी को सुबह कैसे इस्तेमाल किया जाए।

    तमिलनाडु में एक जल सरिता या धारा को कई कई तालाबों की श्रंखला में मोड़कर हर बूंद को बड़ी नदी व वहां से समुद्र में बेजा होने से रोकने की अनूठी परंपरा थी। उत्तरी अराकोट व चेंगलपेट जिले में पलार एनीकेट के जरिए इस ‘‘पद्धति तालाब’’ प्रणाली में 317 तालाब जुड़े हैं। रामनाथपुरम में तालाबों की अंतर्श्रखला भी विस्मयकारी है। पानी के कारण पलायन के लिए बदनाम बंुदेलखंड में भी पहाडी के नीचे तालाब, पहाडी पर हरियाली वाला जंगल और एक  तालाब के ‘‘ओने’’(अतिरिक्त जी की निकासी का मुंह) से नाली निकाल कर उसे उसके नीेचे धरातल पर बने दूसरे तालाब से जोड़ने व ऐसे पांच-पांच तालाबों की कतार बनाके की परंपरा 900वीं सदी में चंदेल राजाओं के काल से रही है। वहां तालाबों के आंतरिक जुड़ावों को तोड़ा गया, तालाब के बंधान फोड़े गए, तालाबों पर कालोनी या खेत के लिए कब्जे हुए, पहाड़ी फोड़ी गई, पेड़ उजाड़ दिए गए। इसके कारण जब जल देवता रूठे तो पहले नल, फिर नलकूप के टोटके किए गए। सभी उपाय जब हताश रहे तो आज फिर तालाबों की याद आ रही है।

    यह जान लेना जरूरी है कि धरती पर इंसान का अस्तित्व बनाए रखने के लिए पानी जरूरी है तो पानी को बचाए रखने के लिए बारिश का संरक्षण ही एकमात्र उपाय है। भारत में हर साल औसतन 37 करोड़ हैक्टर मीटर वर्शा जल प्राप्त होता है, जबकि देश का कुल क्षेत्रफल 32 करोड़ अस्सी लाख हैक्टर मीटर है।  यानि हर वर्गमीटर में एक मीटर से भी मोटी पानी की परत। हमारे यहां पानी की उपलब्धता अमेेरिका से बहुत ज्यादा है,  फिर भी हमारी 33 फीसदी षहरी व 60 प्रतिशत ग्रामीण आबादी को षुद्ध पेय जल उपलब्ध नहीं है। यदि देश की महज पांच प्रतिशत जमीन पर पांच मीटर औसत गहराई में  बारिश का पानी जमा किया जाए तो पांच सौ लाख हैक्टर पानी की खेती की जा सकती है। इस तरह औसतन प्रति व्यक्ति 100 लीटर पानी प्रति व्यक्ति पूरे देश में दिया जा सकता है और इस तरह पानी जुटाने के लिए जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर सदियों से समाज की सेवा करने वाली पारंपरिक जल प्रणालियों को खेाजा जाए, उन्हें सहेजने वाले, संचालित करने वाले समाज को सम्मान दिया जाए और एक बार फिर समाज को ‘‘पानीदार’’ बनाया जाए। यहां ध्यान रखना जरूरी है कि आंचलिक क्षेत्र की पारंपरिक प्रणालियों को आज के इंजीनियर षायद स्वीकार ही नहीं पाएं सो जरूरी है कि इसके लिए समाज को ही आगे किया जाए।

    जल संचयन के स्थानीय व छोटे प्रयोगों से जल संरक्षण में स्थानीय लोगों की भूमिका व जागरूकता दोनों बढ़गेी, साथ ही इससे भूजल का रिचार्ज तो होगा ही जो खेत व कारखानों में पानी की आपूर्ति को सुनिश्चित करेगा।

    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार है

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