ममता ने किया संविधान निर्माताओं का अपमान

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
ममता बनर्जी को प्रदेश और केंद्र की सत्ता में रहने का पर्याप्त अवसर मिला है। इस रूप में उन्हें भारतीय संविधान की व्यवहारिक जानकारी भी मिली है। केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें बखूबी ज्ञान मिला होगा कि अपना संविधान न तो पूर्ण संघात्मक है, न पूर्ण एकात्मक है। इसमें दोनों के तत्व शामिल है।
 संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच समझ कर यह व्यवस्था की थी। उन्होंने इतिहास से सबक लिया। जब अनेक क्षत्रपों ने राष्ट्रीय एकता व अखंडता के विरुद्ध आचरण किया। इसका लाभ विदेशी शक्तियों ने उठाया। यह स्थिति न आये इस लिए संविधान निर्माताओं ने संघात्मक के साथ एकात्मक तत्व का समावेश किया।
ममता भाजपा सरकार में रेल मंत्री हुआ करती थी। रेल देश को जोड़ने की प्रतीक होती है। यह केंद्र का विषय है। ममता को यह मंत्रालय सदैव सबसे प्रिय था।
फिर ऐसा समय भी आया था जब ममता कम्युनिस्ट सरकार को हटा कर पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन की मांग करती थी। रेल, राज्यपाल, संचार, सेना, केंद्रीय जांच एजेंसी, अनुच्छेद 352, 356 व 360 , आदि एकात्मक लक्षण है। संविधान निर्माताओं ने इन्हें देश के भावी कल्याण हेतु रखा था।
 ममता बनर्जी ने मात्र एक आरोपी अधिकारी के लिए संविधान निर्माताओं के अपमान किया है। संविधान के एकात्मक लक्षण की उन्होंने अवहेलना की है। जबकि वह जानती है कि किसी आरोपी को बचाना उनके लिए संभव नहीं है। क्योंकि उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देश में जांच चल रही है। ममता उस अधिकारी को बचा भी नहीं सकी। सुप्रीम कोर्ट ने शिलांग में उससे पूंछताछ का आदेश दिया। ममता का दांव नाकाम हुआ।
वस्तुतः ममता यह सब जानती थी। वह ज्यादा जिद करती तो, उनकी सरकार बर्खास्त हो सकती थी।
वह केवल प्रस्तावित गठबन्धन की नेता बनना चाहती थी। लेकिन चंदबाबू नायडू और शरद पवार के अलावा किसी का उन्हें साथ नहीं मिला। ममता का यह दांव उल्टा पड़ा है। शारदा घोटाले को लेकर उनकी परेशानी बढ़ेगी। ममता के समर्थक केंद्र सरकार पर हमला बोल रहे है। जबकि यह सुप्रीम कोर्ट से संबंधित मसला है। ममता के प्रत्येक आरोप सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने वाले है।
उन्होंने कहा कि केंद्र संघात्मक व्यवस्था पर हमला बोल रहा है। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। यह संघात्मक शासन पर हमला नहीं है। बल्कि यह एकीकृत न्यायिक प्रक्रिया की मिसाल है। इस संवैधानिक व्यवस्था और भावना को समझने की आवश्यकता है। यदि विभिन्न राज सरकारे इसी प्रकार अपने चहेते अधिकारियों को बचाने लगेगीं तो संघात्मक व्यवस्था का संचालन मुश्किल हो जाएगा। ममता बनर्जी ने संविधान की जगह अपनी राजनीति को महत्व दिया है। यह आपत्तिजनक है।

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