जी क़े चक्रवर्ती
जम्मू कश्मीर में सीमा रेखा पर पाकिस्तान की सेना की ओर से जिस तरह पूरी रात गोलीबारी की गई उसकी वजह से एक निर्दोष बच्चे के साथ कई मौत व कई अन्य लोग घायल भी हो गए जोकि बहुत गंभीर मामला है, इस तरह की हरकतों से एक बात तो स्पष्ट हो गयी है कि नियंत्रण रेखा पर शांति बहाल करने का पाकिस्तानी द्वारा किया गया कथित आग्रह एक खतरनाक ढोंग है या फिर कहें कि सीमा सुरक्षा बल के हमारे अधिकारियों को उनकी बात को सही तरह से समझने में चूक हुई है। ऐसा भी संभव है कि पाकिस्तानी रेंजर्स हमेशा की भांति शांति का मुखौटा पहनकर भारतीय सुरक्षा बलों को धोखा देने की कोशिश की हो।
चूंकि पाकिस्तान एवं उसकी सेना पहले तो पवित्र रमजान के मौके पर सीजफॉयर का कथित पालन करके नाटक व अमन-चैन और शांति बहाली का दिखावा करता है और फिर बाद में ठीक इसके विपरीत उलट काम को अंजाम देने का भी काम करता है, इसलिए पाकिस्तान द्वारा जब तक संघर्ष विराम के प्रति वास्तविक सुचिता पूर्ण पहल करते हुए दिखाई न दे, तब तक बार-बार झूठ का सहारा लेने वाले इस देश पर यक़ीन करना हमारे लिए बहुत बड़ी भूल कहलायेगी और ऐसी कायराना हकरत करने वाले इस देश से बचने में ही हमारी भलाई भी कहलाएगी।
यह कोई हैरत वाली बात नहीं है जैसा कि हम लोगों को याद होगा कि अभी चंद ही दिनों पहले एशिया के पत्रकारों के एक समूह से बातचीत में पाकिस्तानी सेना के अफसरों द्वारा भारत से सीमारेखा में शांति बनाए रखने से संबंधित संवाद करने की जो इच्छा प्रकट की गई थी, वह मात्र दुनिया को धोखे में रखने के लिए हो। पाकिस्तान जब तक भारत से बातचीत करने का कोई मजबूत प्रस्ताव लेकर सामने नही आता है तब तक उस पर गंभीरता दिखाने की कोई आवश्यकता ही नही है और नही उसके प्रतिनिधियों की ओर से यहां-वहां दिए गए बयानों का संज्ञान लेकर देश को ऐसा संकेत नहीं देने चाहिए कि पाकिस्तान की ओर से वार्ता किये जाने की पेशकश का इंतजार कर रहा हो। यदि भारत को पाकिस्तानी सेना का भारत से संबंध सुधारने अथवा दोनों देशों के मध्य सार्थक बीच बातचीत करने का परिवेश बनाने को लेकर थोड़ी बहुत भी ईमानदार होती तो उसकी ओर से सीमा पर युद्ध जैसे हालातों को पैदा ही नही होने दिया जाता।
जम्मू एवं कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्रों के आबादी वाले क्षेत्र को पाकिस्तान द्वारा बार-बार निशाना बनाना उसके सेनाओं के पागलपन के अलावा और कुछ नही समझा जा सकता है भारत के प्रति पाकिस्तानी सेना द्वारा हमेशा से शत्रुता का भाव रखना उसके एक सनक के रूप में बदल गया और इसका ताजा प्रमाण यह है कि अभी हाल ही में जब भारतीय सेना ने रमजान के समय कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ चलाये जा रहे अपने अभियानो को रोकने की घोषणा की तो सीमा पार से संघर्ष विराम के उल्लंघन करने जैसी हरकतें तेज कर दी गई। हालांकि संघर्ष विराम का उल्लंघन करने की स्थिति में पाकिस्तान को भी बहुत अधिक क्षति उठानी पड़ती, लेकिन नफरत में अंधी हो कर पाकिस्तानी सेना के रुख में वर्तमान समय तक कोई परिवर्तन हुआ दिखाई नही देता है।
फिलहाल पाकिस्तानी सेना का भारत विरोधी जैसे रवैये में कमी आने के कहीं कोई गुंजाईस इसलिए भी नही है क्योंकि जिसका पहला कारण तो यह है कि वहां पर आम चुनाव बहुत नजदीक हैं और दूसरी वजह यह है कि पाकिस्तानी सेना के अफसर खुल्लम-खुल्ला यह कहने में भी संकोच नहीं करते हैं कि उसकी ओर से स्थापित किए गए आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा को मुख्यधारा में लाने की जरूरत है जबकि उसी के द्वारा तरह-तरह के आतंकी संगठनों को पालने-पोसने एवं बढ़ावा देने जैसी गतिविधियों को रोकना पड़ेगा और यह तभी संभव हो पायेगा जब पाकिस्तानी सेना खुद अपने यहां के नागरिकों, सरकार एवं मीडिया पर बुरी तरह हावी हो कर अपने कार्य को अंजाम देगी लेकिन शायद पाकिस्तान इस तरह के कार्यों को अंजाम तक पहुंचने में कामयाब हो पाएगी और न ही भारत को इस तरह की अपेक्षाएं उससे रखने की जरूरत भी नही है।







