डॉ दिलीप अग्निहोत्री
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना विजय दशमी के दिन हुई थी। यह कोई संयोग मात्र नहीं था, बल्कि संघ संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार इस माध्यम से भारतीय गौरव का सन्देश देना चाहते थे। इसमें विदेशी शासन से मुक्ति और देश को परम बैभव पर पहुंचाने का विचार स्वभाविक रूप से शामिल रहा है। स्वतंत्रता के बाद संघ अपने दूसरे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए समर्पित भाव से लगा है। विजय दशमी को प्रेरणा और शौर्य का उत्सव माना गया। इस दिन नागपुर में सर संघचालक का संबोद्धन विशेष रूप से महत्वपूर्ण होता है।सरसंघचालक मोहन भागवत ने इस बार अपने संबोद्धन में अनेक ज्वलंत विषयों की चर्चा की। व्यापक सन्दर्भ के आधार पर ही इसका विश्लेषण हो सकता है। कानून के द्वारा जन्मभूमि पर राम मंदिर निर्माण एक विषय था। इस पर सर्वाधिक चर्चा हुई। लेकिन इसके सन्दर्भो को जोड़ कर देखना चाहिए।
मोहन भागवत ने संविधान, न्यायपालिका और महात्मा गांधी के अहिंसा मार्ग के प्रति आस्था व्यक्त की। लेकिन बाबर जैसे आक्रांता का महिमा मंडन उचित नहीं। यह इतिहास का नफरत भरा अध्याय है, जबकि श्री राम का अयोध्या में जन्म आस्था से जुड़ा मुद्दा है। इस भावना को समझ लेने से मंदिर निर्माण संभव हो जाएगा। तब कानून बना कर शांति व अहिंसक तरीके से मंदिर निर्माण हो सकेगा। उन्होंने कहा कि रामजन्मभूमि पर जल्द से जल्द राम मंदिर बने इसलिए सरकार को कानून बनाकर मंदिर निर्माण करना चाहिए। लेकिन यह हिंदू-मुसलमान का मसला नहीं है।
यह भारत का प्रतीक है और जिस रास्ते से मंदिर निर्माण संभव है, मंदिर का निर्माण होना चाहिए। इसके अलावा मोहन भागवत ने नक्सल, पाकिस्तान चीन की समस्या का भी उल्लेख किया। ये सभी भारत वीरोधी ताकते है। ऐसे में आंतरिक और बाह्य सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। सरकार इस दिशा में प्रभावी कदम उठा रही है। नक्सली और वामपंथियों की गतिविधियों को आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा हैं। मोहन भागवत ने कहा कि कुछ लोग भारत के टुकड़े होने की बात करते हैं, संविधान को नहीं मानते। समाज के उपेक्षित तबके का लाभ उठाते हैं, अभावग्रस्त छात्रों को भड़काते हैं।
संघ भारत की बाह्य सुरक्षा के प्रति भी जागरूक रहता है। पाकिस्तान और चीन के आक्रमण के समय संघ के स्वयंसेवक भारतीय सेना व प्रशासन की सहायता करने में जुटे थे। ऐसे में मोहन भागवत की आज उन्ही मुल्कों के रुख पर चिंतित होने स्वभाविक है। उन्होंने कहा कि हम दुनिया में किसी से शत्रुता नहीं करते लेकिन हमसे शत्रुता करने वाले कई लोग हैं, हमें उनसे सतर्क रहने की जरूरत है। ऐसे लोगों से बचने का एक ही तरीका है कि हम इतना बलवान बने कि किसी की आक्रमण करने की हिम्मत ही न पड़े। पड़ोस में सरकार बदल गई लेकिन उनकी नीयत नहीं बदली।
कुछ शक्तियां मालदीव, श्रीलंका को अपनी तरफ करने की कोशिश कर रही हैं। प्रयास यह हो कि अपनी सुरक्षा के लिए किसी पर निर्भर ना रहना पड़े। हमें अपने देश में ही सुरक्षा से जुड़ी चीजों को बनाना चाहिये।
सबरीमाला मंदिर के सामाजिक सन्दर्भ का भी मोहन भागवत ने उल्लेख किया।न्यायपालिका के महत्व से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन किसी का अहित न करने वाली कतिपय संस्थानों की अपनी भी परंपरा होती है। सबरीमाला में सुप्रीमकोर्ट के निर्णय के बाद भी समाधान नहीं निकला। वस्तुतः यहां के नियम महिला विरोधी या महिलाओं का उत्पीड़न करने वाले नहीं थे। विशेष आयुवर्ग की महिलाओ का ही प्रवेश वर्जित था। यह महिलाओं के उत्पीड़न या उनके अधिकार छीन लेने का विषय नहीं था। फिर भी स्थानीय लोगों के साथ मिलकर उपयुक्त समाधान निकाला जा सकता था। स्त्री और पुरुष के बीच समानता अच्छी बात है, लेकिन इतने सालों से चली आ रही परंपरा और उसका पालन करने वालों लोगों की भावना का सम्मान नहीं किया गया, उनकी नहीं सुनी गई। धर्म के मामलों में संबंधित धर्म के धर्माचार्यों से बातचीत करना आवश्यक होता है। सबको साथ लेकर भी धीरे-धीरे बदलाव किया जा सकता है।
इस प्रकार मोहन भागवत ने सामाजिक सद्भाव में बाधक प्रमुख समस्याओं का उल्लेख किया। इसी के समाधान के सुझाव भी दिए। उनकी पूरी संकल्पना मजबूत समाज और राष्ट्र की अवधारणा पर आधारित है। यदि जन्म भूमि पर राम मंदिर का निर्माण होता है, तो हिन्दू और मुसलमानों के बीच सद्भाव बढ़ेगा। दलितों को बराबरी पर लाने से हमारा समाज को ताकत मिलेगी। उन्होंने कहा भी कि समय पर न मिले तो वह सहायता व्यर्थ हो जाती है। अनुसूचित जातियों के लिए योजनाएं बनती हैं लेकिन हर जगह समय पर लागू नहीं पाती। इस ओर सरकारों की विशेष ध्यान देना चाहिए। ये सभी समाधान अंततः राष्ट्र और समाज को मजबूत बनायेगे।







