अपनी छवि साफ़ करने में जुटी पुलिस के साथ ऐसा कुछ न कुछ जरूर हो जाता है जिससे उसकी बनी अच्छी छवि फिर धूमिल हो जाती है। बता दें कि खाकी वर्दी की दो घटनाओं ने पूरे देश में फिर से इस सवाल को सुलगा दिया है कि पुलिस की कार्यशैली में सुधार कब और किस रूप में आएगा? पहली घटना राजधानी दिल्ली की है, जो देश की सबसे तेजतर्रार पुलिस फोर्स है। यहां के एक थानाध्यक्ष और उनके सहकर्मियों पर छह लोगों को बेवजह थाने में बंदकर पीटने और छोड़ने के एवज में 25 हजार रुपये वसूलने का आरोप है। बकायदा इसका वीडियो फुटेज भी सार्वजनिक होकर पुलिस की छवि को दागदार कर रहा है।
वहीं दूसरी वारदात दिल्ली से बिल्कुल सटे नोएडा शहर की है। यहां के एक दारोगा और उसके साथियों पर दो युवकों का फर्जी मुठभेड़ में मारने का संगीन आरोप लगा है। दोनों में से एक युवक की हालत गंभीर बनी हुई है। चूंकि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के सत्ता संभालने के बाद से कानून-व्यवस्था की हालत बेहद दयनीय है। इसे पटरी पर लाने के लिए शासन ने पुलिस को खुली छूट दी हुई है।
शायद उत्तर प्रदेश की पुलिस को इस बात का इल्म नहीं है कि अपनी ताकत का इस्तेमाल उन्हें अपराधियों के खिलाफ करना है न कि आम निरीह जनता के विरुद्ध। जब जनता को ऐसी पुलिस से वास्ता पड़ेगा तो इसे समझने में ज्यादा वक्त जाया नहीं किया जा सकता कि न्याय मिलेगा भी कि नहीं? इसे विडंबना ही कहेंगे कि आजादी के 70 साल बाद भी जनता पुलिस को एक पक्षपाती, क्रूर, भ्रष्ट और अक्षम फोर्स मानती है। दरअसल, पुलिस बल में मानसिक तौर पर बदलाव नहीं होने से एक नई संस्कृति का जन्म हुआ है, जिसमें अपराध या कानून के खिलाफजाने के बावजूद उनके खिलाफकोई कार्रवाई नहीं होती है।
यह नई संस्कृति ही मानवाधिकारों के घोर और बेशर्म उल्लंघन के रूप में दिखता है। यह आदर्श स्थिति नहीं है। जो चीजें अपराध का कारण बनते हैं, पुलिस को उन्हें गहराई से समझने की जरूरत है। इंग्लैंड की पुलिस व्यवस्था के जनक सर रॉबर्ट पील के मुताबिक, पुलिस को हर हाल में जनता के साथ संबंध बनाकर रखना चाहिए। क्योंकि इसी से उस परंपरा का अनुमोदन होता है कि पुलिस पब्लिक है और पब्लिक ही पुलिस है। यह होगा कैसे; इसके लिए गहन पड़ताल जरूरी है।







