स्मार्ट फोन के उपयोग में आत्मानुशासन अनिवार्य

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
आधुनिक अविष्कारों ने जीवन की सुविधाओं को बढ़ाया है, लेकिन इससे संबंधित समस्यायों और बीमारियों में भी वृद्धि हुई है। मोबाइल फोन भी इसी में शामिल है। पिछले कुछ वर्षों में एक प्रकार से मोबाइल फोन क्रांति शुरू हुई। देखते ही देखते इसका व्यापक प्रचार भी हो गया। शुरुआत उच्च वर्ग से हुई। फिर मध्यम, और निर्धन वर्ग भी इसकी दौड़ में शामिल हो गया। मोबाइल फोन दैनिक जीवन की आवश्यकता हो गई। इसका अगला चरण स्मार्ट फोन था। यह भी तेजी से लोकप्रिय हुआ। पहले फोन परस्पर संवाद का माध्यम मात्र था। लैंड लाइन फोन के समय घर से बाहर निकलने के बाद सुविधा समाप्त हो जाती थी। मोबाइल ने यह कमी दूर कर दी। स्मार्ट फोन ने बैंकिंग सुविधा, बिलों के भुगतान , रेलवे हवाई टिकट आदि को घर बैठे सुगम बना दिया है। घर बैठे टैक्सी, होटल आदि में बुकिंग होने लगी। वीडियो कांफ्रेसिंग से लोग अपने मित्रों,परिजनों से बात कर सकते है। सरकारी कार्यों में भी इसका उपयोग बहुत बढा है।
ऐसे में स्मार्ट फोन की उपयोगिता निर्विवाद है। लेकिन प्रत्येक वस्तु के दो पहलू होते है। इनकी उपयोगिता के साथ साथ कुछ हानिकारक तत्व भी होते है। इसी स्मार्ट फोन का चौबीस घण्टे में आधे घण्टे से ज्यादा का उपयोग हानिकारक होता है। वैसे यह बात केवल स्मार्ट फोन पर ही लागू नहीं होती। रसोई में चक्कू बहुत उपयोगी होता है। उससे सब्जी काटी जाती है। किंतु उसके भी गलत प्रयोग से नुकसान हो जाता है। जरा सी लापरवाही हाथ को घायल कर सकती है। जिससे टिटनेस का खतरा भी उतपन्न हो सकता है।
बिजली, एलपीजी गैस बहुत उपयोगी होते है। लेकिन इनके प्रयोग में लापरवाही बहुत नुकसानदेह होती है। इसी प्रकार स्मार्ट फोन के प्रयोग में सावधानी आपेक्षित होती है। यह समझना जरूरी है कि यह रेडिएशन से युक्त होता है।
 मोबाइल के प्रयोग में सावधानी और आत्मानुशासन जरूरी है। आधे घण्टे से ज्यादा मोबाइल का उपयोग शारीरिक और मानसिक रूप से घातक होता है। इसके टॉवर तक के दुष्प्रभाव दिखने लगे है। पशु पक्षी सभी इससे प्रभावित हुए है। गौरैया और गिद्ध कम होने लगे है। ऐसे में यह सोचना गलत है कि इंसानों पर इसका असर नहीं होता होगा।
हवाई जहाज में रेडिएशन के कारण मोबाइल फोन बंद कराए जाते है। इसके रेडिएशन का दुष्प्रभाव बादलों पर पड़ता है। इससे विमान का कंट्रोल रूम से सम्पर्क टूट सकता है। आँख, मष्तिष्क और हार्ट पर इसके दुष्प्रभाव पड़ते है। विशेषज्ञ भावना सक्सेना ने प्रयोग के माध्यम से अपनी बात समझाई। मोबाइल शरीर से दूर होना चाहिए। यह जितना करीब होगा व्यक्ति की शारीरिक क्षमता उतनी ही कम हो जाती है। मोबाइल के बिना हांथों को सामने और पीछे जोड़ना आसान होता है। जबकि मोबाइल को जेब  रखने के बाद वह लचक तत्काल कम हो जाती है। मोबाइल चलते समय सोचने की क्षमता कम हो जाती है।
अभिवावकों को इस बात का अनुभव भी होता है। मोबाइल चला रहे बच्चों से जब वह कोई बात करते है, तो उनका ध्यान इस ओर कम हो जाता है।
सोचने और उसके अनुरूप क्रियान्वयन की प्रक्रिया को मोबाइल कम कर देता है। मोबाइल को सिर के पास रख कर सोना हानिकारक होता है। इससे सिरदर्द, बेचैनी आदि की समस्या उतपन्न होती है। अनेक लोग रात में नींद खुलने पर मोबाइल फोन देखते है। इससे आंखों पर बहुत खराब प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा नींद पूरी नहीं होती है। समय पर सोना समय पर जागना योग शास्त्र का नियम है। रात्रि सोने के लिए और दिन जागने के लिए होता है। लेकिन मोबाइल के प्रति आशक्ति जीवन में असंतुलन पैदा कर देती है।
 जाहिर है कि स्मार्ट फोन का प्रयोग निर्धारित समय तक ही होना चाहिए। उसके बाद इसका न केवल प्रयोग बहस कर देना चाहिए, बल्कि इसे अपने से दूर भी रखना चाहिए। मोबाइल फोन का ज्यादा इस्तेमाल दिमागी सेल्स को तो प्रभावित करता है। यह  कैंसर की संभावना भी बढा देता है। शरीर से कुछ दूरी पर मोबाइल फोन का इस्तेमाल करना चाहिए। मोबाइल रेडिएशन से दिमाग का कैंसर, एकाग्रता, आंख की समस्याएं, तनाव में वृद्धि, न्यूरोडेगेनेरेटिव डिसऑर्डर, दिल की बीमारी और सुनने में परेशानी जैसी समस्याएं हो सकती हैं।  ऐसे में बेहतर यही है कि मोबाइल फोन उपयोग की समय सीमा निर्धारित की जाए। आधे घण्टे से ज्यादा इसका प्रयोग न किया जाए।

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