डॉ दिलीप अग्निहोत्री
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार विकास नहीं विभाजन के प्रस्तावों के लिए याद की जाएगी। उसने यहाँ हिन्दू धर्म को विभाजित किया, कर्नाटक के अलग ध्वज का अनावरण किया, टीपू के नाम पर बटवारे को हवा दी। इसके बाबजूद उसे बहुमत नहीं मिला। ये कार्य संविधान की भावना के प्रतिकूल थे। यह अच्छा हुआ कि विभाजनकारी प्रस्तावों के लिए कांग्रेस को सजा मिली। यह सजा बरकरार रहनी चाहिए। जो लोग कांग्रेस की सत्ता में परोक्ष अपरोक्ष भागीदारी चाहते है, वह संविधान समाज और प्रजातन्त्र, सबकी अवहेलना कर रहे है।भारतीय संविधान ने ब्रिटेन की भांति सामान्य बहुत प्रणाली व संसदीय व्यवस्था को स्वीकार किया है। इसमें सँख्याबल का महत्व होता है। किसको कितने प्रतिशत वोट मिले,यह केवल मन बहलाने की बात होती है। इस आधार पर कांग्रेस को कर्नाटक में पराजय मिली है। अब सत्ता में भीतर, बाहर किसी भी तरीके से उसकी पैठ अमर्यादित और जनभावना का मखौल उड़ाने जैसा होगी। ऐसा भी नहीं कि पहले बेमेल गठबन्धन नहीं हुए है। अनेक बार मर्यादाओं और नैतिकता का उल्लंघन भी होता है। इनसे कोई अछूता भी नहीं है। लेकिन यहां बड़ा सवाल कर्नाटक की कांग्रेस के विभाजनकारी फैसलों को लेकर है। उसने केवल चुनावी समीकरण के लिए हिन्दू समाज को विभाजित करने का प्रस्ताव पारित किया था। इसके पहले उसने कर्नाटक के अलग ध्वज का न केवल प्रस्ताव किया था, बल्कि अलग घ्वज बना भी कर उसे सार्वजनिक भी कर दिया था।
इतिहास उठाकर देखें तो ऐसे ही अलगाववादी फैसलों ने भारत का बहुत नुकसान किया था। विदेशी आकांताओ ने इसी का फायदा उठाया था। संविधान के अनुसार किसी राज्य का अलग ध्वज नहीं हो सकता। विशेष दर्जे के कारण जम्मू कश्मीर अपवाद है। वैसे यह भी उचित नहीं है। लेकिन कर्नाटक की कांग्रेस सरकार अंग्रेजों की बाटो औ राज्य करो कि नीति पर चल रही थी। वह इतनी बेखौफ थी कि उसे संविधान की भी कोई चिंता नही थी। यह अच्छा हुआ कि मतदाताओं ने कांग्रेस को विभाजनकारी कदमों के लिए सजा दी। जाहिर है कि कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने हिन्दू धर्म के अलावा राष्ट्रीय ध्वज में भी अलगाव के प्रस्ताव किये थे। ईसाइयों और हिंदुओं को चिढ़ाने के लिए सरकारी खजाने से टीपू सुल्तान की जयंती का भव्य आयोजन किया था। ये सभी कार्य विधानसभा चुनाव के कुछ समय पहले किये गए। इनमें कही भी विकास के मुद्दे की चर्चा नहीं थी। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रत्येक चुनावी सभा में गरीबों , किसानों के लिए चलाई गई योजनाओं की चर्चा अवश्य करते थे। लेकिन टीआरपी का जमाना है। खबरों में कांग्रेस पर हमले की सुर्खियां बनती थी।
विधानसभा चुनाव से दो महीने पहले ही सिद्धरमैया सरकार ने राज्य के लिंगायत समुदाय को धार्मिक अल्पसंख्यक दर्जा देने की सिफारिश करने का फैसला किया था। यह बांट कर राज्य करने के ब्रिटिश विचार से प्रेरित था। राज्य में लिंगायत आबादी कम से कम सत्रह प्रतिशत आबादी है। इन्हें परंपरागत रूप से ये भाजपा का समर्थक माना जाता है। ये बात अलग है कि केंद्र सरकार कांग्रेस की इस साजिश को बेनकाब कर दिया था। केंद्रीय मंत्री अर्जुन मेघवाल ने अब एक पत्र जारी किया है, जिसे दो हजार तेरह में कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी को भेजा गया था।
इसमे लिंगायत समुदाय को एक स्वतंत्र धर्म के रूप में मान्यता देने का प्रस्ताव था। इस प्रस्ताव को केंद्र में तब की यूपीए सरकार ने खारिज कर दिया था। इस समय डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे। कांग्रेस सत्ता के लिए विभाजन करना चाहती थी। इसके पहले सिद्धरमैया ध्वज के आधार पर भी विभाजन करना चाहते थे। वह इतनी जल्दी में थे कि नए झंडे का अनावरण भी कर दिया था। इतना ही नही इसका नामकरण भी कर दिया था। इस की आकृति आयताकार थी। इसमें तीन रंग लाल, सफेद और पीले रंग की पट्टी हैं, बीच में राज्य के प्रतीक दो सिर वाला पौराणिक पक्षी गंधा भेरुण्डा दर्शाया गया था। इस को नाद ध्वज नाम दिया गया था।
इसके अलावा कांग्रेस ने टीपू सुल्तान को भी वोटबैंक का मुद्दा बनाया। इससे भी समाज में विभाजन दिखाई देने लगा था। कांग्रेस खुश हुई। उसका तीर निशाने पर लगा था। टीपू सुल्तान पर आरोप है कि उसने सत्तर हजार इसाइयों और एक लाख हिन्दुओं का जबरदस्ती धर्मांतरण कराया था। इसलिए वहां के हिन्दू और ईसाई उससे नफरत करते है। लेकिन कांग्रेस की सरकार फिर विभाजन को हवा देने का प्रयास कर रही थी। वोटबैंक की राजनीति के तहत उसने टीपू की जयंती मनाई।
जाहिर है कि सिद्धरमैया ने समाज को बांट कर बहुमत हासिल करने का मंसूबा बनाया था। यह समाज ही नहीं संविधान के प्रति गुनाह था। संविधान राष्ट्रीय एकता अखंडता को अक्षुण रखने की बात करता है। कर्नाटक में कांग्रेस समाज को विभाजित कर रही थी । संविधान एक राष्ट्रीय ध्वज को मान्यता देता है, कर्नाटक की कांग्रेस सरकार अलग ध्वज का अनावरण कर रही थी। वह हिंदुओं और ईसाइयों की भावनाओं से खेल रही थी। इस गुनाह की मतदाताओं ने जो सजा दी है वह बरकरार रहनी चाहिए।







