डॉ दिलीप अग्निहोत्री
इसमें कोई संदेह नहीं कि विधानसभा चुनाव में भाजपा को झटका लगा है, लेकिन इस पराजय में भी उसके लिए उम्मीद की किरण है। जनसमर्थन में खास कमी नहीं हुई है। पांचों राज्यों में एक समानता थी। इन सभी में मुख्यमंत्रियों की ही प्रतिष्ठा ही दांव पर लगी थी। राजस्थान के चुनाव वसुंधरा राजे सरकार के लिए थे। कांग्रेस ने यहां अपने दो विकल्प रखे थे। पहले अशोक गहलोत और दूसरे सचिन पायलट। मध्यप्रदेश के चुनाव शिवराज सिंह चौहान की प्रतिष्ठा दांव पर थी। यहां भी कांग्रेस ने दावेदारी के लिए दो लोगों को उतारा था। पहले कमलनाथ और दूसरे ज्योतरदित्य सिंधिया। राजस्थान में सहज परिवर्तन की परंपरा का निर्वाह हुआ।मध्यप्रदेश में कहा गया कि शिवराज से पन्द्रह वर्ष के बोर हो गए। अबकी बदल कर देखते है। यहां अन्य कोई मुद्दा नही चला। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को नक्सलियों के प्रति नरम रुख का लाभ मिला। तेलंगाना में मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने अपनी प्रतिष्ठा दांव पर लगाई थी। वह सफल रहे। दक्षिण भारत में कांग्रेस का सफाया हो गया। मिजोरम में कांग्रेस के मुख्यमंत्री थे। उनकी प्रतिष्ठा दांव पर थी। क्षेत्रीय दल ने कांग्रेस का सफाया कर दिया।
यह सही है कि चुनाव में संख्याबल ही महत्वपूर्ण होता है। भाजपा को भी आत्मचिंतन करना होगा। कांग्रेस को पन्द्रह वर्ष पुरानी सरकार को हटाने में मुश्किल का सामना करना पड़ा। राजस्थान में कई दशक से चल रही परम्परा का निर्वाह हुआ। लेकिन जितनीं कम संख्या के साथ वहां सत्ता पक्ष की विदाई होती थी, वह नहीं हुआ। भाजपा जनसमर्थन के मामले में कुछ प्वाइंट ही पीछे है। सँख्याबल के हिसाब से भी वह मजबूत विपक्ष की भूमिका में रहेगी।
राजस्थान में वसुंधरा सरकार के अधिसँख्य मंत्रियों को पराजय का सामना करना पड़ा। जाहिर है इनका रिकार्ड खराब रहा होगा। भाजपा को ऐसी बातों पर चिंतन करना चाहिए। आज भी वह कई राज्यों की सत्ता में है। लेकिन यह एक समस्या है। अनेक मंत्री कार्यकुशल नहीं है। उनके ऊपर आरोप भी लगते है। खासतौर पर भ्र्ष्टाचार के आरोप पूरी पार्टी की छवि को खराब करते है। ऐसे मंत्रियों का कार्यकर्ताओं से संवाद नहीं रहता। यह धारणा बन जाती है कि उनके विभाग में बिना धन के सुनवाई नहीं होती। ऐसे लोगों को बनाये रखने का अंततः नुकसान उठाना पड़ता है।
इसी प्रकार बाहरी लोगों को एक सीमा से ज्यादा तरजीह देना गलत होता है। ये बाहरी लीग होते है, मौका देखकर बदल जाने में इन्हें रंचमात्र संकोच नहीं होता। जब इन लोगों को किसी पद से नवाजा जाता है तो जमीनी कार्यकर्ताओं में निराशा पैदा होती है। उत्तर प्रदेश में विधानपरिषद और राज्यसभा के कुछ नाम भाजपा के समर्थकों को निराश करने वाले थे। इससे होने वाले नुकसान की आहट सुनाई नहीं देती।
दो हजार तेरह में मिजोरम विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने चौतीस विधानसभा सीटें जीती थीं। लेकिन इस बार लगभग सफाया हो गया है। लोगों ने कांग्रेस को नकार दिया है।
कांग्रेस से ज्यादा इस बार राज्य में अन्य ने सीटें जीती हैं। अन्य के खाते में इस बार नौ सीटे आई हैं। भाजपा का खाता खुला। पूर्वोत्तर के राज्यों असम, त्रिपुरा, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और अब मिजोरम में कांग्रेस हार चुकी है। तेलंगाना में कांग्रेस पार्टी को भारी पराजय का सामना करना पड़ा है, सभी शीर्ष नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा है। यहां तक कि कांग्रेस नेतृत्व वाले पीपुल्स फ्रंट की जीत की स्थिति में जिन्हें मुख्यमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखा जा रहा था, उन्हें भी हार का स्वाद चखना पड़ा है।
तेलंगाना में मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव ने कांग्रेस को उठाने का मौका नहीं दिया। यहां पर टीआरएस दो तिहाई वोटों से भी ज्यादा बहुमत मिला। तेलंगाना राष्ट्र समिति के अध्यक्ष के. चंद्रशेखर राव ने अपना करिश्मा कायम रखा।
कांग्रेस ने यहां दिखा दिया कि उसमें सुधार संभव नहीं है। तीन राज्यों में ईवीएम को बढ़िया बताने वाली तेलंगाना में इसे गड़बड़ बता रही है। केंद्रीय चुनाव आयुक्त ने को कहा था कि ईवीएम में छेड़छाड़ करना संभव ही नहीं है। लोगों ने टीआरएस को जिताया है। कांग्रेस का दावा बिल्कुल गलत है। तेलंगाना में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन के लिए ईवीएम में छेड़छाड़ होने को जिम्मेदार ठहराया था।
जाहिर है कि सभी प्रदेशों में समान रूप से मुख्यमंत्रियों की प्रतिष्ठा ही दांव पर थी। कांग्रेस और भाजपा दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियां है। इनके राष्ट्रीय नेताओं ने चुनाव प्रचार किया। इसका भी सहज महत्व था, लेकिन चुनाव प्रांतीय स्तर का था। इस आधार पर लोकसभा के निष्कर्ष निकालने का औचित्य नहीं है।







