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    मेघों की धरती को चट कर जाएगी ‘रेट होल माईनिंग’

    By February 3, 2019 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    उन पंद्रह युवओं की लाशं भले ही पहचानी नहीं जा रही हों, लेकिन मेधालय में इन असामयिक मौतों से कुछ नहीं बदला। यहां तक कि सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद भी जमीन से कोयला निकालने का अवैध, भयानक और असुरक्षित कार्य यथावत जारी है। गत 13 दिसंबर को जमीन के भीतर अथाह जल-धार में गुम गए श्रमिकों के लिए अब राज्य प्रशासन ने मान लिया है कि मासूमों की लाशें इस लायक भी नहीं हैं कि उनको बाहर निकाल कर उनका अंतिम संस्कार किया जा सके। चमड़ी व मांस पूरी तरह गल गया है और उन लोथउ़ों में पहचानना मुश्किल है कि किसका शव कौनसा है।

    जहां मेघों का डेरा रहता है, वहां पेट पालना इतना जटल है कि 14-15 साल के बच्चों को कोयले की ऐसी खदानों में उतार दिया जाता है जो ना केवल अवैध हैं, बल्कि ना तो उनके पास सुरक्षा के कोई साधन होते हैं और ना ही जिंदगी का कोई भरोसा। चूहे के बिल जैसी इन संकरी खदानों में बच्चों को खोदने का एक उपकरण ले कर उतार दिया जाता है। यही नहीं इस अवैध खनन से नदी दूषित हो रही हैं, हवा-जमीन भी नष्ट हो रही है। राष्ट्रीय हरित अभिकरण एनजीटी ने सन 2014 में ही ऐसी ‘रेट होल माईनिंग’ पर पाबंदी लगा दी थी लेकिन अभी भी वहां का कोयला उप्र के बागपत के ईंट भट्टों तक कागजों में हेर फेरी कर आ रहा है।

    मेघालय से हजारों किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के बागपत के कुछ ईंट भट्टा व्यापारी अभी भी मेघालय की जेलों में केवल इस लिए सड़ रहे हैं कि उन्होंने कोयला खरीदने के कुछ कागजों पर शक किया था। कोयले के व्यापारी या खदानों के मालिक सियासत में रसूख रखते हैं व वे खोदो हुए कोयले को सन 2014 से पहले का खनन दिखा कर देशभर में परिवहन करते हैं। पिछले दिनो मेघालय की सिविल सोसायटी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत रिपोर्ट के प्रत्येक शब्द भ्रष्टाचार, अराजकता, इंसान की जिंदगी पर पैसे की होड़ की घिनौनी तस्वीर प्रस्तुत करता है। रिपेार्ट बताती है कि एनजीटी द्वारा पाबंदी लगाने के बाद भी 65 लाख 81 हजार 147 मेट्रीक टन कोयले का खनन कर दिया गया।

    सभी फोटो साभार: गूगल

    मेघालय एक पर्वतीय क्षेत्र है और दुनिया में सबसे ज्यादा बरसात वाला इलाका कहलाता है। यहां छोटी-छोटी नदियां व सरिताएं है जो यहां के लोगों के जीवकोपाजैन के लिए फल-सब्जी व मछली का साधन होती हैं। मेघालय राज्य जमीन के भीतर छुपी प्राकृतिक संपदाओं के मामले में बहुत संपन्न है। यहां चूना है, कोयला है और यूरेनियम भी है। शायद यही नैसर्गिक वरदान अब इसके संकटों का कारण बन रहा है। सन 2007 में ही जब पहली बार लुका व मिंतदु नदियों का रंग नीला हुआ था, तब इसकी जांच प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने की थी। मेघालय राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 2012 की अपनी रिपोर्ट में इलाके में जल प्रदूषण के लिए कोयला खदानों से निकलने वाले अम्लीय अपशिष्ट और अन्य रासायनिकों को जिम्मेदार ठहराया था।

    जान लें कि राज्य में प्रत्येक एक वर्ग किलोमीटर में 52 रेट होल खदाने हैं। अकेले जयंबतिया हिल्स पर इनकी संख्या 24,626 है। असल में ये खदानें दो तरह की होती हैं। पहली किस्म की खदान बामुश्किल तीन से चार फुट की होती है। इनमें श्रमिक रेंग कर घुसते हैं। साईड कटिंग के जरिए मजूदर को भीतर भेजा जाता है और वे तब तक भीतर जाते हैं जब तक उन्हें कोयले की परत नहीं मिल जाती। सनद रहे मेघालय में कोयले की परत बहुत पतली हैं, कहीं-कहीं तो महज दो मीटर मोटी। इसमें अधिकांश बच्चे ही घुसते हैं। दूसरे किस्म की खदान में आयाताकार आकार में 10 से 100 वर्गमीटर आमाप में जमीन को काटा जाता है और फिर उसमें 400 फीट गहराई तक मजदूर जाते हैं।

    imeging

    यहां मिलने वाले कोयले में गंधक की मात्रा ज्यादा है और इसे दोयम दर्जे का कोयला कहा जाता है। तभी यहां कोई बड़ी कंपनियां खनन नहीं करतीं। ऐसी खदानों के मालिक राजनीति में लगभग सभी दलों के लोग हैं और इनके श्रमिक बांग्लादेश, नेपाल या असम से आए अवैध घुसपैठिये होते हैं।

    एनजीटी द्वारा रोक लगाने के बाद मेघालय की पछिली सरकार ने स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय आदिवासियों के अधिकार के कानून के तहत इस तरह के खनन को वैध रूप देने का प्रयास किया था लेकिन कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम 1973 की धारा 3 के तहत कोयला खनन के अधिकार, वामित्व आदि हित केंद्र सरकार के पास सुरक्षित हैं सो राज्य सरकार इस अवैध खनन को वैध का अमली जामा नहीं पहना पाया। लेकिन गैरकानूनी खनाा, संकलन और पूरे देश में इसका परिवहन चलता रहा। वह तो दिसंबर के दूसरे सप्ताह में शिलांग से कोई 80 किलोमीटर दूर जयंतिया हिल्स की लुमथारी गांव की ऐसी ही अवैध खदान में 15 नबालिक मजदूर फंस गए व उनको निकालने के आपरेशन में उड़िस, बंगाल की सरकारें, आपदा प्रबंधन विभाग और नौसेना ने आपरेशन चलाया व उसी समय एक जनहित याचिका में मामला सुप्रीम कोर्ट में आया, सो दिल्ली के इसकी भनक लगी। वरना इस खून से सने कोयले के बल पर जीत कर आए जन प्रतिनिधि कभी इसकी चर्चा तक नहीं करते।

    रेट होल खनन न केवल अमानवीय है बल्कि इसके चलते यहां से बहने वाली कोपिली नदी का अस्तित्व ही मिट सा गया है। एनजीटी ने अपने पाबंदी के आदेश में साफ कहा था कि खनन इलाकों के आसपास सड़कों पर कोयले का ढेर जमा करने से वायु, जल और मिट्टी के पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। भले ही कुछ लोग इस तरह की खदानों पर पाबंदी से आदिवासी अस्मिता का मसला जोड़ते हों, लेकिन हकीकत तो सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत नागरिक समूह की रिपेार्ट बायान करती है। रिपोर्ट बताती है कि इस अवैधखनन में प्रशासन, पुलिस और बाहर के राज्यों के धनपति नेताओं की हिस्सेदारी है और स्थानीय आदिवासी तो केवल शेाषित श्रमिक ही है।

    सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि कोयले की कालिख राज्य की जल निधियों की दुश्मन बन गई है। लुका नदी पहाड़ियों से निकलने वाली कई छोटी सरिताओं से मिल कर बनी है,इसमें लुनार नदी मिलने के बाद इसका प्रवाह तेज होता है। इसके पानी में गंधक की उच्च मात्रा, सल्फेट, लोहा व कई अन्य जहरीली धातुओं की उच्च मात्रा, पानी में आक्सीजन की कमी पाई गई है। ठीक यही हालत अन्य नदियों की भी है जिनमें सीमेंट कारखाने या कोयला खदानों का अवशेष आकर मिलता है। लुनार नदी के उदगम स्थल सुतुंगा पर ही कोयले की सबसे ज्यादा खदाने हैं। यहां यह भी जानना जरूरी है कि जयंतिया पहाड़ियों के गैरकानूनी खनन से कटाव बढ़ रहा हे। नीचे दलदल बढ रहा है और इसी के चलते वहां मछलियां कम आ रही हैं।

    ऊपर से जब खनन का मलवा इसमें मिलता है तो जहर और गहरा हो जाता हें । मेघालय ने गत दो दशकों में कई नदियों को नीला होते, फिर उसके जलचर मरते और आखिर में जलहीन होते देखा है। विडंबना है कि यहां प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से लेकर एनजीटी तक सभी विफल हैं। समाज चिल्लाता है, गुहार लगता है और स्थानीय निवासी आने वाले संकट की ओर इशारा भी करते हैं लेकिन स्थानीय निर्वाचित स्वायत्त परिषद खदानों से ले कर नदियों तक निजी हाथों में सौंपने के फैसलों पर मनन नहीं करती हे। अभी तो मेघालय से बादलों की कृपा भी कम हो गई है, चैरापूंजी अब सर्वाधिक बािरश वाला गांव रह नहीं गया है, यदि नदियां खो दीं तो दुनिया के इस अनूठे प्राकृतिक सौंदर्य वाली धरती पर मानव जीवन भी संकट में होगा।

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