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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    बढ़ता प्रदूषण का जहर और बहरी सरकारें

    By January 25, 2019Updated:January 25, 2019 Current Issues No Comments3 Mins Read
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    भारत की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को लेकर यह कितनी शर्मनाक स्थिति बनी है जिसके संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की पीठ के एक न्यायाधीश को अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए यह कहना पड़ गया कि यह शहर अब रहने लायक नहीं रह गया है। रिटायर होने के बाद मैं यहां नहीं रहूंगा!

    यह न्यायाधीश प्रदूषण से संबंधित एक याचिका की सुनवाई कर रहे थे। बता दें कि दिल्ली की जहरीली होती हवा को लेकर सुप्रीम कोर्ट समय-समय पर सरकार को चेताता रहा है, अब एक बार फिर चेताया है कि राजधानी समेत पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र एनसीआर में हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई हैं। दिल्ली गैस चैंबर में तब्दील हो गई है।

    प्रदूषण को लेकर शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी यही बताती है कि प्रदूषण से निपटने की जिम्मेदारी उठाने वाले लोग या तो गैर जिम्मेदार साबित हुए हैं या फिर आने वाले संकट से मुंह फेर कर बैठे हैं, क्योंकि हालात तो हर दिन बिगड़ते ही जा रहे हैं लेकिन सुधार कहीं नहीं दिख रहा है। यहां तो प्रदूषण के साथ यातायात जाम भी बड़ी समस्या बन गया है लेकिन दोनों ही समस्याओं से निपटने के लिए स्थानीय सरकार या प्रशासन के उठाए गए सारे कदम अब तक बेअसर ही साबित हुए हैं।

    बता दें कि पिछले 1 महीने में ही औषत वायु गुणवत्ता सूचकांक 378 से ऊपर रहा जो अत्यंत गंभीर स्थिति के संकेत हैं। अभी पिछले महीने पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण ईपीसी दिल्ली सहित पूरे एनसीआर में 2 दिन के लिए सारे उद्योगों को बंद रखने का कदम भी उठाया था, लेकिन स्थिति में कोई फर्क नहीं दिखा। सच तो यह है कि दिल्ली और इससे सटे इलाकों नोएडा, फरीदाबाद और गाजियाबाद में हजारों औद्योगिक इकाइयां चल रहे हैं। सालों से इनमें से जहरीला धुआं निकल रहा है।

    जाहिर है कि मात्र कुछ दिनों के लिए उद्योगों को बंद कर देना ही सही विकल्प नहीं है। समस्या की मूल जड़ तो दिल्ली के कई इलाकों में खड़े कूड़े के पहाड़ हैं। सड़कों पर फर्राटा भरते पुराने वाहन दिन की अवधि कब की खत्म हो चुकी हैं। इसके अलावा लगातार जारी निर्माण विधियां और छोटे उद्योग हैं। जगह-जगह कूड़े कूड़े के पहाड़ जलते हैं तो इनसे जहरीला धुआं निकल कर पूरी दिल्ली में फैलता है, लेकिन शीर्ष अदालत की तमाम चेतावनी के बावजूद यह पहाड़ अभी तक हटाये नहीं जा सके।

    सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरकार और जांच एजेंसियों के लचर रवैये पर शीर्ष अदालत बार-बार तल्ख टिप्पणियां करती रहती है लेकिन इसके बावजूद कहीं से कोई सकारात्मक और ठोस पहल सामने नहीं आ पाती है जिसकी वजह से हालात जस के तस बने हुए हैं।

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