सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रोन्नति में आरक्षण का रास्ता फिर से साफ करना अपेक्षित था। इससे पहले जून में भी इस पर अंतरिम फैसला देते हुए न्यायालय ने कहा था कि जब तक अंतिम फैसला नहीं आ जाता तब तक प्रोन्नति में आरक्षण पर कोई रोक नहीं है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी ओर से स्पष्ट फैसला देने की जगह इसे राज्यों पर छोड़ दिया है। यानी राज्य सरकार चाहें तो प्रोन्नति में आरक्षण दे सकती है।
वस्तुत: शीर्ष न्यायालय ने 2006 के नागराज मामले के अपने फैसले में जो दो शत्रे लगाई थीं, उनका विरोध आरक्षण समर्थकों एवं सरकार ने किया था। इनमें एक तो यह था कि प्रोन्नति में आरक्षण देने के पहले यह देखा जाए कि उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व है या नहीं और दूसरा प्रशासनिक दक्षता को नकारात्मक तौर पर प्रभावित नहीं करने से जुड़ा था।
सामान्य शब्दों में कहें तो सरकार अनुसूचित जाति और जनजाति को प्रोन्नति में आरक्षण तभी दे सकती है, जब आंकड़ों के आधार पर तय हो कि उनका प्रतिनिधित्व कम है और वह प्रशासन की मजबूती के लिए जरूरी है। हालांकि राज्य सरकारों को संविधान के अनुच्छेद 16-4ए और अनुच्छेद 16-4बी के तहत अनुसूचित जाति-जनजाति कर्मचारियों को प्रोन्नति में आरक्षण देने के प्राप्त अधिकार को तब भी समाप्त नहीं किया था किंतु इन दो शतरे के कारण इसको अमल में लाने में कठिनाई आ रही थी। इसके खिलाफही न्यायालय में याचिकाएं डालीं गई थीं। न्यायालय ने बस इतना किया है कि उन शतरे को हटा दिया है। तो अब स्थिति पूर्ववत है।
प्रोन्नति में आरक्षण पर हमेशा से दो राय रही है। एक राय यह है कि, जिसे आरक्षण के तहत नौकरी मिल गई उसे प्रोन्नति उसके कार्य प्रदर्शन के आधार पर दिया जाए। दूसरी राय यह है कि उन जातियों को अपने मानसिक और शारीरिक विकास के लिए वैसी सुविधाएं और वातावरण नहीं मिलते जैसे दूसरी जातियों को मिल जाते हैं। इसलिए उनको प्रोन्नति में भी आरक्षण मिलना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद यह बहस बंद हो जाएगी इसकी उम्मीद नहीं करनी चाहिए। प्रोन्नति में आरक्षण के विरोध में सबसे बड़ा तर्क यही दिया जाता है कि इससे परिश्रम और दक्षता से काम करने वाले सामान्य वर्ग के कर्मचारियों-अधिकारियों के मनोविज्ञान पर नकारात्मक असर पड़ता है। यह चलता रहेगा। जब संपूर्ण आरक्षण पर ही आज तक देश में सहमति नहीं है तो प्रोन्नति के संदर्भ में ऐसा कहां से हो सकता है?







