डॉ दिलीप अग्निहोत्री
भारतीय सेना राजनीति से ऊपर रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वाह करती है। यही कारण है इसकी गिनती विश्व की सर्वश्रेष्ठ सेनाओं में होती है। इसी के अनुरूप हमारे सैन्य कमांडरों के बयानों को महत्व दिया जाता है। यह माना जाता है कि उनके बयान अंततः राष्ट्रीय सुरक्षा के अनुरूप होंगे। ये बात अलग है कि कांग्रेस के अनेक वर्तमान नेता इस संबन्ध में मर्यादा का उल्लंघन करते है।कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी किसी विषय को गहराई से समझे बिना मुद्दा उछाल देते है। वह इस बात पर भी विचार नहीं करते कि इसका देश की सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ेगा। इसके दो कारण लगते है। एक यह कि संप्रग सरकार ने सेना की सैन्य जरूरतों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। अब नरेंद्र मोदी सरकार उस कमी को दूर कर है। इसलिए कांग्रेस अपनी नाकामी छिपाने के लिए आरोप लगाती है। दूसरा यह कि कांग्रेस को लगता है कि वह दूसरे को चोर चोर कह कर अपने को ईमानदार साबित कर लेगी। ये दोनों ही चिंतन दोषपूर्ण है। राफेल विमान समझौते पर वह इसी नीति पर चल रही है।
वायु सेना प्रमुख बीएस धनोआ ने कहा कि शत्रु के खिलाफ उच्च गुणवत्ता और प्रौद्योगिकी वाले विमान अपरिहार्य हो गए थे। सरकार के समक्ष तीन विकल्प थे। पहला यह कि अभी इंतजार करते, दूसरा यह कि राफेल लड़ाकू विमान को वापस करते या तीसरा यह कि आपातकालीन खरीद करते। सरकार ने आपातकालीन खरीददारी की है। राफेल और एस-चार सौ वायुसेना की मारक क्षमता को धार देने के लिए एक बेहतर सौदा है। वायुसेना प्रमुख ने कहा कि पहले से ही एचएएल के साथ हुए करार में आपूर्ति को लेकर काफी देरी हो रही थी।
सुखोई-तीस की आपूर्ति में तीन वर्ष की देरी, जगुआर की आपूर्ति में छह वर्ष देरी, लाइट कम्बैट एयरक्राफ्ट की आपूर्ति में पांच वर्ष की देरी और मिराज दो हजार अपग्रेड की आपूर्ति में दो वर्ष की देरी है। ऐसे में स्क्वाड्रोन्स का कमजोर होते जाना यह चिंता का विषय था। सरकार ने इस कमी को दूर किया है। इसके अलावा दसॉल्ट एविएशन ने ऑफसेट साझेदार को चुना और सरकार तथा भारतीय वायुसेना की इसमें कोई भूमिका नहीं थी। राफेल एक अच्छा लड़ाकू विमान है।
वायु सेना प्रमुख ने तथ्यों के आधार पर ही अपनी बात कही है। कुछ और कॉर्पोरेट प्रतिद्वंदी इस सौदे पर गलत, भ्रामक और भटकाने वाली जानकारी दे रहे हैं। कांग्रेस अध्यक्ष इन्ही गलत बातों को लगातार दोहरा रहे है। समूह की ओर से सोमवार को जारी एक बयान के अनुसार अंबानी के अनुसार भारत जो छत्तीस राफेल जेट विमान फ्रांस से खरीद रहा है, उन विमानों के एक रुपये मूल्य के एक भी कलपुर्जे का विनिर्माण उनके समूह द्वारा नहीं किया जाएगा।
भारत के रक्षा मंत्रालय से रिलायंस समूह को इन विमानों के संबंध में कोई भी ठेका नहीं मिला है। अंबानी ने कहा है कि उनकी कंपनी की भूमिका केवल ऑफसेट अथवा निर्यात दायित्व तक सीमित है। इसमें भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन जैसे सरकरी संगठनों से लेकर सौ से अधिक की संख्या में छोटी मझोली कंपनियां शामिल होंगी। इससे भारत की विनिर्माण क्षमता का विस्तार होगा। ऑफसेट नीति कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार ने ही दो हजार पांच में लागू की थी। अंबानी ने स्पष्ट किया है कि उनके समूह ने राफेल विमानों की खरीददारी की इच्छा जताए जाने से महीनों पहले रक्षा विनिर्माण के क्षेत्र में कदम रखने की घोषणा दिसंबर दो हजार चौदह में ही कर दी थी।
कांग्रेस प्रवक्ता ने कहा कि वायु सेना प्रमुख बी एस धनोआ के बयान को सही ठहराया। उन्होंने कहा कि इसी जरूरत को देखते हुए इन विमानों की खरीद का पिछली सरकार ने निर्णय लिया था। कांग्रेस की यहाँ तक तो बात सही है। राफेल सौदे पर बात उसी ने शुरू की थी। लेकिन इसके बाद कि बातों से कांग्रेस बचना चाहती है। क्योंकि इसी में उंसकी विफलता छिपी है। कांग्रेस को वायु सेना प्रमुख की यह बात भी स्वीकार करनी होगी कि राफेल लड़ाकू विमान भारतीय सेना की ताकत बढ़ाएगा और यह दक्षिण एशिया में हवाई ताकत के परिदृश्य को बदल देगा। कांग्रेस भारत को यह ताकत दिलाने में नाकाम रही थी।








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