बगैर गाये- बछड़े के कैसा देहात?

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पंकज चतुर्वेदी

उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य जहां की अर्थ व्यवस्था या समृद्धि का मूल आधार खेती -किसानी है ; के वर्ष 2019 के सालाना बजट में एक अजब प्रावधान किया गया है- सरकारी स्तर पर ऐसी योजना लागू की जा रही ताकि गाय के बछड़े पैदा हो ही नहीं, बस बछिया ही हो। इसके लिए बजट में पचास करोड़ का प्रावधान रखा गया है ताकि ‘सेक्स सार्टेड सिमेंस’ के जरिये राज्य की देशी गायों का गर्भाधान करवा कर केवल बछिया पैदा होना सुनिश्चित किया जा सके।

इसके पीछे कारण बताया गया है कि इससे आवार पशुओं की समस्या से निजात मिलेगी। कैसी विडंबना है कि जिस देश में मंदिर के बाहर बैठे पाशाण नंदी को पूजने और चढौत के लिए लोग लंबी पंक्तियों में लगते हैं, वहां साक्षात नंदी का जन्म ही ना हो, इसके लिए सरकार भी वचनबद्ध हो रही है। हालांकि यह भारत में कोई सात साल पुरानी योजना है जिसके तहत गाय का गर्भाधान ऐसे सीरम से करवाया जाता है जिससे केवल मादा ही पैदा हो जो दूध दे सके, लेकिन इसे ज्यादा सफलता नहीं मिली है क्योंकि यह देशी गाय पर कारगर नहीं है। महज संकर गाय ही इस प्रयोग से गाभिन हो रही हैं।

चूंकि इस कार्य के लिए बीज का संवर्धन और व्यापार में अमेरिका व कनाड़ा की कंपनियां लगी हैं तो जाहिर है कि आज नही तो कल इसका बोलबाला होगा। इस तरह के एक ही लिंग के जानवर पैदा करने की योजना बनाने वालों को प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ने और ताजा-ताज बीटी कॉटन बीजों की असफलता को भी याद कर लेना चाहिए।

ये कोई ज्यादा पुरानी बात नहीं हैं, बामुश्किल तीन दशक पहले तक गांव में बछड़ा होना षुभ माना जाता था, दो साल उसकी खिलाई-पिलाई हुई और उसके बाद वह पूरे घर के जीवकोपार्जन का आधार होेता था घर के दरवाजे पर बंधी सुंदर बैल की जोड़ी ही उसकी संपन्न्ता और रूतबे का प्रमाण होती थी। बछड़ा एक महीने का भी हजार रूपए में बिक जाता था, जबकि गैया या बछड़ी को दान करना पड़ता था। चुपके से खेती के मशीनीकरण का प्रपंच चला । इसमें कुछ मशीन बनाने वाली , कुछ ईंधन बेचने वाली और सबसे ज्यादा बैंकिग को विस्तार देने वाले लोग षामिल थे।

दुश्परिणाम सामने हैं कि आबादी के लिहाज से खाद्यान की कमी, पहले की तुलना में ज्यादा भंडारण की सुविधा, विपणन के कई विकल्प होने के बावजूद किसान के लिए खेती घाटे का सौदा बन गई हैं और उसका मूल उसकी लागत बढ़ना है। इसमें कोई षक नहीं है कि इस समय उप्र के आंचलिक क्षेत्रों में आवरा गौवंश आफत बना हुआ है। आए रोज हंगामें-झगड़े हो रहे हैं, लेकिन गंभीरता से देखें तो इन आवरा पशुओं में अधिकांश गाय ही हैं।

असल में हम यह मानने को तैयार नहीं है कि हमनें गौवंश का निरादर कर एक तो अपनी खेती की लागत बढ़ाई, दूसरा घर के दरवाजे बंधे लक्ष्मी-कुबेर को कूड़ा खाने को छोड़ दिया। मसला केवल नियोजन का है, ये आवारा पशु करोड़ों की लागत की उर्जा के स्त्रोत और बैशकीमती खाद का जरिया बन सकते हैं।

विदेश से आयातित डीप फ्रोजन सीमेन यानि डीएफएस को प्रयोगशाला में इस तैयार किया जाता है कि इसमें केवल एक्स क्रोमोजोम ही हों। इसे नाईट्रोजन बर्फ वाली ठंडक में सहेज कर रखा जाता है। फिलहाल यह जर्सी और होरेस्टिक  फ्रीजियन नस्ल की गायों में ही सफल है। देशी गाय में इसकी सफलता का प्रतिशत तीस से भी कम है। विदेशी नस्ल की गाय की कीमत ज्यादा, उसका रखरखाव महंगा  और इस वैज्ञानिक तरीके से  गर्भाधान के बाद चार साल बाद उसके दूध की मात्रा में कमी आने का कटु सत्य सबके सामने है लेकिन उसे छुपाया जाता है। यही नहीं इस सीमेन के प्रत्यारोपण में पंद्रह सौ रूपए तक का खर्च आता है सो अलग। सबसे बड़ी बात कि किसी भी देश की संपन्न्ता की बड़ी निशानी माने जाने वाले ‘लाईव स्टॉक’ या पशु धन की हर साल घटती संख्या से जूझ रहे देश में अपनी नस्लों का कम होना एक बड़ी चिंता है। यह एक भ्रम है कि भारत की गायें कम दूध देती है।

पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली में चार किस्म की भारतीय गायों – सिंघी, थारपारकर, वृंदावनी, साहीवाल पर षोध कर सिद्ध कर दिया है कि इन नस्लों की गाये ंना केवल हर दिन 22 से 35 लीटर दूध देती हैं, बल्कि ये संकर या विदेशी गायों से अधिक काल तक यानि 8 से 10 साल तक ब्याहती व दूध देती हैं। एनडीआरआई, करनाल के वैज्ञानिकांे की ताजा रिपोर्ट तो और भी चौंकाने वाली है, जिसमें हो गया है कि ग्लोबल वार्मिग के कारण ज्यादा तपने वाले भारत जैसे देशों में अमेरिकी नस्ल की गायों ना तो जी पाएंगी और ना ही दूधदे पाएंगी। हमारी देशी गायों के चमड़े की मोटाई के चलते इनमें ज्यादा गर्मी सहने, कम भोजन व रखरखाव में भी जीने की क्षमता है।

यदि बारिकी से देखें तो कुछ ही सालों में हमें इन्हीें देशी गायो की षरण में जाना होगा, लेकिन तब तक हम पूरी तरह विदेशी सीमेंस पर निर्भर होंगे और हो सकता हैकि ये ही विदेशी कंपनियां हमें अपने ही देशी सांड का बीज बेचें।

अब जरा हमारे तंत्र में बैल की अनुपयोगिता या उसके आवार होने की हकीकत पर गौर करें तो पाएंगे कि हमने अपनी परंपरा को त्याग कर खेती को ना केवल महंगा किया, बल्कि गुणवत्ता, रोजगार, पलायन, अनियोजित षहरीकरण जैी दिक्कतों का भी बीज बोया। पूरे देश में एक हेक्टेयर से भी कम जोत वाले किसानों की तादाद 61.1 फीसदी है। देश में 1950-51 में सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 53.1 फीसदी हुआ करता था। संसद में पेश की गई आर्थिक समीक्षा में अब इसे 13.9 फीसदी बताया गया है। ‘नेशनल सैम्पल सर्वे’ की रिपोर्ट के अनुसार, देश के 40 फीसदी किसानों का कहना है कि वे केवल इसलिए खेती कर रहे हैं क्योंकि उनके पास जीवनयापन का कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।

जरा गौर करें कि जब एक हैक्टेयर से कम रकबे के अधिकांश किसान हैं तो उन्हें ट्रैक्टर की क्या जरूरत थी, उन्हें बिजली से चलने वाले पंप या गहरे ट्यूब वेल की क्या जरूरत थी। उनकी थोड़ी सी फसल के परिवहन के लिए वाहन की जरूरत ही क्या थी। एक बात जान लें कि ट्रैक्ट ने किसान को सबसे ज्यादा उधार में डुबोया, बैल से चलने वाले रहट की जगह नलकूप व बिजली के पंप ने किसान को पानी की बर्बादी और खेती लागत को विस्तार देने पर मजबूर किया। बैल को घर से दूर रखने के चलते कंपोस्ट की जगह नकली खाद की फिराक में किसान बर्बाद हुआ। सरकार ने खूब कजें्र बांट कर पोस्टर में किसान का मुस्कुराता चेहरा दिखा कर उसकर सुख-चैन सब लूट लिया।  खेत मजदूर का रोजगार छिना तो वह षहरों की और दौड़ा।

1976 में राष्ट्रीय कृषि आयोग की रिपोर्ट में कहा गया था कि गोबर को चूल्हे में जलाया जाना एक अपराध है उर्जा विशेषज्ञ मानते हैं कि हमारे देश में गोबर के जरिए 2000 मेगावाट उर्जा उपजाई जा सकती है । यह तथ्य सरकार में बैठे लेाग जानते हैं कि भारत में मवेशियों की संख्या कोई तीस करोड़ है। इनसे लगभग 30 लाख टन गोबर हर रोज मिलता है।  इसमें से तीस प्रतिशत को कंडा/उपला बना कर जला दिया जाता है। यह ग्रामीण उर्जा की कुल जरूरत का 10 फीसदी भी नहीं है ।

ब्रिटेन में गोबर गैस से हर साल सोलह लाख यूनिट बिजली का उत्पादन होता हे। चीन में डेढ करोड परिवारों को घरेलू उर्जा के लिए गोबर गैस की सप्लाई होती है। यदि गोबर का सही इस्तेमाल हो तो हर साल छह करोड़ टन के लगभग लकड़ी को बचाया जा सकता है। साढे तीन करोड़ टन कोयला बच सकता है। इसे कई करोड़ लेागों को रेाजगार  मिल सकता है। बैल को बेकार या आवारा मान कर बेकार कहने वालों के लिए यह आंकड़े विचारणीय है।

यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम अपनी ताकत को पहचान नहीं रहे और किसानी, दुग्ध उत्पादन में वृद्धि, बेकार पशुओं के निदान को उन विदशी विकल्पों में तलाश रहे हैं जो कि ना तो हमारे देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप है और ना ही व्याहवारिक।  जान लें कि बगैर बैल के ना तो पर्व-त्योहर हो सकेंगे, ना ही खेती और ना देशी गाय।

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