डॉ दिलीप अग्निहोत्री
कर्नाटक में सबसे बड़े दल के नेता येदुरप्पा मुख्यमंत्री बने। इस प्रकार संविधान और बोम्मई रिपोर्ट का एक साथ पालन हुआ। निर्धारित अवधि में वह बहुमत प्रमाणित नहीं कर सके तो उन्हें सता छोड़नी होगी। यह संविधान की व्यवस्था का तकाजा था। समाज के स्तर पर भी इस ताजपोशी का महत्व है। पूर्ववर्ती कांग्रेस की सरकार ने हिन्दू धर्म को विभाजित करके सत्ता हासिल करने का मंसूबा बनाया था। भाजपा ने समाज को जोड़ा ,और सबसे बड़ी पार्टी बनी।संविधान में कहीं भी बहुमत शब्द का उल्लेख नहीं है।अनुच्छेद 164 में यह अवश्य लिखा है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेंगे। लेकिन इस अनुच्छेद को दूसरे के साथ जोड़कर देखना चाहिए। अनुच्छेद 164 (२) में लिखा है कि मंत्री परिषद विधानसभा के विश्वास पर्यन्त पर रहेगी। इसका मतलब यह है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति के समय राज्यपाल को यह देखना चाहिए कि उसे विधानसभा में विश्वास हासिल हो सकता है या नहीं । यह संसदीय व्यवस्था को संचालित करने वाला प्रावधान है। यदि किसी पार्टी या चुनाव पूर्व बने गठबन्धन को स्पष्ट बहुमत मिला हो तो राज्यपाल के समक्ष कोई विकल्प नहीं होता। तब वह बहुमत दल या गठबन्धन के नेता को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करता है। राज्यपाल संविधान प्रदत्त अपने विवेक का प्रयोग त्रिशंकु विधानसभा में कर सकता है।
कर्नाटक में किसी एक पार्टी या चुनाव पूर्व बने गठबन्धन को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। भाजपा एक सौ चार सीट के साथ अकेली सबसे बड़ी पार्टी थी। लेकिन बहुमत से पीछे थी। सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उसने सरकार बनाने का दावा किया था। राज्यपाल वजुभाई वाला को इस दावे पर विचार करना था। भाजपा ने विधायक दल की बैठक में येदुरप्पा को नेता चुनने के बाद राज्यपाल के समक्ष दावा पेश किया था। उनके साथ एक सौ चार विधायकों की सूची थी।
दूसरा दावा कांग्रेस और जदयू का था। यह दिलचस्प दावेदारी थी। कांग्रेस और जदयू के नेता बड़ी जल्दीबाजी में थे। विधायक दल की बैठक और चुनाव आयोग द्वारा अधिकृत परिणाम जारी होने के पहले इसके नेता राज्यपाल के यहां पहुंच गए थे। दोनों की संख्या बहुमत से चार अधिक थी। राज्यपाल ने उनको उचित जबाब दिया कि अधिकृत परिणाम आने तक सभी दावेदारों को इंतजार करना चाहिए। अधिकृत परिणाम भी आ गए ।
कांग्रेस और जेडीयू ने विधायक दल की बैठक भी की। लेकिन इन दोनों बैठकों से कई विधायक नदारत थे। कांग्रेस के बारह और जदयू के दो विधायक बैठक में नहीं पहुंचे। मतलब विधिवत दावा पेश करने से पहले ही कांग्रेस और जदयू बहुमत से पीछे हो गया। कहा गया कि कांग्रेस के इक्कीस और जेडीयू के दस विधायक लिंगायत समुदाय के है। ये लिंगायत मठों के सम्पर्क में है। इन्हें मुख्यमंत्री के रूप में कुमार स्वामी मंजूर नहीं है। ये विधायक लिंगायत समुदाय के भाजपा नेता येदुरप्पा की राह में बाधक नहीं बनना चाहते। जाहिर है कांग्रेस अपने ही बने जाल में उलझ गई। उसने चुनाव से पहले लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देने वाला कार्ड चला था।
इससे भाजपा को तो नुकसान नहीं हुआ , लेकिन कांग्रेस के कई विधायक अलग होते दिखाई दे रहे है। कांग्रेस ने संख्या ही नहीं सम्मान भी खोया है। उसने अपने से आधी संख्या वाले क्षेत्रीय दल के सामने समर्पण कर दिया। फिर भी सत्ता में भागीदारी का अवसर नहीं मिला। इसके बाद उसे आधी रात में सुप्रीम कोर्ट भागना पड़ा। कुछ दिन पहले उसे यहाँ बड़ी गड़बड़ी दिखाई दे रही थी । लेकिन सत्ता में घुसने का मौका हाँथ से निकला तो ,यही की शरण लेनी पड़ी। ऐसे ही कांग्रेस ने जदयू प्रमुख देवगौड़ा और उनके सिद्धरमैया ने देवगौड़ा की फोटो मुख्यमंत्री कार्यालय से फेंकवा दी थी। चुनाव परिणाम आया तो सारी हेकड़ी गायब हो गई।
जाहिर है कि राज्यपाल के समक्ष दो दावे थे। पहला भाजपा का ,जिसके सभी विधायक उसके साथ थे, जो अकेली सबसे बड़ी पार्टी थी। दूसरा कांग्रेस और जदयू का दावा। जिनकी संख्या विधायक दल की बैठक में ही कम हो गई थी । अनुपस्थित विधायको को हटा दें तो इनके बहुमत का दावा भी ध्वस्त हो गया था। इसके अलावा सरकार बनने के पहले न्यूनतम साझा कर्यक्रम नहीं बल्कि अधिकतम सौदेबाजी शुरू हो गई थी। खुलेआम मलाईदार विभागों पर दावेदारी चल रही थी। एक तो संख्या कम हो गई , ऊपर बंदरबाट जैसी बातों ने अंततः राज्यपाल का कार्य आसान कर दिया। सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने के अलावा उनके सामने अन्य कोई विकल्प ही नहीं बचा था।
बात सबसे बड़े दल की चली तो कांग्रेस को गोवा मणिपुर याद आ गया। यहाँ वह सबसे बड़ी पार्टी थी । लेकिन बहुमत से दूर थी। लेकिन उसे सरकार बनाने का अवसर नहीं दिया गया। सबसे बड़ी पार्टी को बुलाना तभी आवश्यक होता है, जब कई दावेदार हों और इनके बहुमत को लेकर संशय हो। बोम्मई आयोग की रिपोर्ट में भी यही विचार प्रतिपादित था। बहुमत पर दुविधा की दशा में राज्यपाल सबसे बड़े दल को सरकार बनाने का आमंत्रण दें , उसके बाद विधानसभा के पटल पर बहुमत का परीक्षण हो। कर्नाटक के राज्यपाल ने यही किया। गोवा और मणिपुर के उदहारण कर्नाटक पर लागू नहीं होता। गोवा में महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी गोवा पीपुल्स फ्रंट से भाजपा के ही करीबी बन कर चुनाव लड़े थे। चुनाव में इन्होंने भाजपा का नहीं कांग्रेस का ही विरोध किया था । बिना किसी सौदेबाजी के इन्होंने भाजपा को समर्थन दिया, कांग्रेस के साथ जाने से इनकार कर दिया। विधान सभा में ऐसा कोई नहीं था,जो कांग्रेस का समर्थन करता। ऐसे में बहुमत से दूर कांग्रेस को सरकार बनाने का आमंत्रण देना अनैतिक होता। यही स्थिति मणिपुर में थी। यहां एनपीएफ, एनपीपी, और लोकजनशक्ति पार्टी भाजपा की ही सहयोगी थी। ऐसे में यहां भी बहुमत से दूर कांग्रेस को बुलाने का औचित्य नहीं था।
कांग्रेस आज कर्नाटक के राज्यपाल पर हमला बोल रही है। लेकिन इस पद के दुरुपयोग के सर्वाधिक मामले उसी के खाते में है। इसकी शुरुआत संविधान लागू होने के सात वर्ष बाद ही शुरू हो गई थी । तब केरल की बहुमत सरकार को हटाया गया था। बहुमत के दावे और विधायकों की भौतिक उपस्थिति के बाद भी अल्पमत की सरकार बनवा देने के अनेक उदाहरण है। ऐसा करने वाले कांग्रेस के संघीय शासन द्वारा नियुक्त राज्यपालों ने किया था। कर्नाटक में ही आठ वर्ष पहले राज्यपाल ने येदुरप्पा की सरकार को बहुमत परीक्षण के बाबजूद हटा दिया था। यहीं पर वेंकट सुबया ने एसआर बोम्मई ,को बहुमत के बाद भी हटाया था। हरियाणा में राज्यपाल गणपति राव ,उत्तर प्रदेश में रोमेश भंडारी,बिहार मेंबूटा सिंह
,झारखंड में शिबते रजी बहुमत को नजर अंदाज करने वाले राज्यपाल के रूप में याद किये जायेंगे। ये खुल कर कांग्रेस के पक्ष मे खेले थे। एक दिलचस्प सन्योग देखिये , आज जो जेडीएस के मुखिया है ,वह तब देश के प्रधानमंत्री थे। जो आज कर्नाटक के राज्यपाल है ,वह गुजरात भाजपा के अध्यक्ष थे। बताया जाता है कि केंद्र के इशारे पर गुजरात के राज्यपाल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री सुरेश मेहता को बर्खास्त कर दिया था। आज वही देवगौड़ा अपने बेटे के मुख्यमंत्री न बनने से परेशान है। निश्चित ही त्रिशंकु विधानसभा का मसला संवेदनशील होता है। कई बार एक ही फार्मूला सभी प्रान्तों में लागू नहीं हो सकता। क्योंकि चुनाव पूर्व और चुनाव बाद के तथ्यों पर भी ध्यान देना चाहिए। गुजरात के राज्यपाल ने सभी तथ्यों पर सावधानी से विचार किया। इस प्रकार वह उचित निर्णय पर पहुचे। अब बहुमत का निर्णय विधान सभा मे होगा। एसआर बोम्मई के सुझावों पर उनके ही गृह प्रान्त में अमल होना सुखद है।






