कुछ वक्त पहले मैं एक इलीट परिवार में था। गलती से ही वहां था। मैंने उनसे अपने अखबार ‘हिंदुस्तान’ में उसी दिन छपे एक लेख के बारे में बताया। परिवार के मुखिया के मुंह से अचानक निकल गया, ‘अरे हम हिंदी में एक अखबार अपने सर्वेन्ट के लिए मंगाते हैं। पता करता हूं कि वह कौन सा अखबार है?’
जाहिर है मुझे अच्छा नहीं लगा था। उखड़ कर कुछ कहना भी चाहता था। लेकिन फिर मुझे महसूस हुआ कि इसमें उखड़ने की कोई बात ही नहीं है। आखिर मैं क्यों चाहता हूं कि यहां का इलीट हिंदी अखबार को पढ़े। या अपने यहां मंगाए।
असल में अंगरेजी इस समाज के इलीट की सहज संपर्क भाषा है। उसी तरह हिंदी इस समाज के आम आदमी के बात-बर्ताव की भाषा है। उसे आम आदमी ने बनाया है। उसी ने बरता है। जब कोई कहता है कि ये तो रिक्शे वाले की भाषा है। किसानों, मजदूरों या पानवाले की भाषा है, तो मुझे खराब नहीं लगता। उसमें खराब लगने की क्या बात है? अपने समाज के निचले स्तर तक पहुंचने वाली भाषा पर हमें फख्र होना चाहिए। फिर यह अधिकार हमें किसने दिया कि अपने आम आदमी को नीची नजरों से देखें। इसी आम ने उसे खास बनाया है। जब भी हिंदी को खास लोगों ने अपने हाथों में लेने की कोशिश की है, उसका नुक्सान ही हुआ है।
नदी और स्वीमिंग पूल के पानी में बहुत फर्क होता है। एक ओर हम भाषा को बहता नीर के तौर पर देखना चाहते हैं। और जब वह बहने लगती है, तो उसे स्वीमिंग पूल में कैद कर लेना चाहते हैं। वह कैद हो ही नहीं सकती। वह बहेगी तो बहुत कुछ उसके साथ आएगा। हम यह नहीं कर सकते कि ऊपर-ऊपर के साफ पानी को ले लें और बाकी सबको नकार दें। प्रदूषण दूर करना जरूरी है। लेकिन उससे हम नदी को बांध नहीं सकते। अगर हम बहाव की बात करते हैं, तो फिर रोकने या बांधने की बात करना बेकार है।
दुनिया की कोई भाषा हो, उसे अगर जिंदा रहना है, तो बहना होगा। हिंदी तो लोक के कंधे पर सवार हो कर चली है। राज पालकी उसे नसीब ही नहीं हुई। मजेदार बात है जब भी उसे राज पालकी पर बिठाने की कोशिश होती है, उसका विरोध होने लगता है। उस पर राजनीति और कूटनीति शुरू हो जाती है। फिर वह लौट कर लोक के पास आती है, तो उसका सफर तेजी से आगे बढ़ने लगता है।
जन-जन तक तो हिंदी का फैलाव हो गया है। अब हिंदी को बेहतरीन भाषा बनाना है। साहित्य को छोड़कर तमाम विषयों पर हिंदी में बेहतर लेखन नहीं मिलता। एक दौर में तो उसे लेकर कोशिशें भी हुई थीं। उसके लिए एक मुहिम की जरूरत है। हमें हर विषय के विशेषज्ञों से यह काम कराना होगा। अभी जो हिंदी वालों को मिल रहा है, वह बड़ी तादाद में अंगरेजी का ही अनुवाद है। वह भी खराब भाषा में। अनुवाद की भाषा को भी ठीक करना जरूरी है। कभी-कभी तो उसे देख कर लगता है कि उससे तो टूटी-फूटी अंगरेजी जानना ज्यादा बेहतर है। हिंदी को यह मोरचा भी फतह करना होगा।
हिंदी पर सोचता हूं तो इंग्लैंड के प्रोफेसर रुपर्ट स्नेल याद आते हैं। उन्होंने ऐसी बात कही मानो हमारी ही बात कह रहे हों। ‘हिंदी जिंदगी का हिस्सा है। हिंदी जिंदा है। हिंदी किसी एक वर्ग या वर्ण या जाति या धर्म या मजहब या मार्ग या देश या संस्कृति की नहीं है। हिंदी भारत की है। मॉरीशस की है। इंग्लैंड की है। सारी दुनिया की है। हिंदी आपकी है। हिंदी मेरी है।’
- राजीव कटारा







