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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    इजिप्ट में बाबा नानक की निशानियों को सहेजें

    By August 28, 2019 Hot issue 1 Comment6 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    यह गुरु नानक देव के प्रकाशोत्सव का 550वा साल है. अकेले भारत ही नहीं सारी दुनिया के सिख पंथ के अनुयायी गुरु महाराज की स्मृतियों को सहेजने में लगे हैं लेकिन अरब दुनिया के सबसे बड़े देश इजिप्ट या मिस्र में गुरु नानक देव कई दिनों रहे, लेकिन उनकी यादों को संरक्षित रखने में न तो वहां की सरकार की कोई रूचि है और न ही भारत सरकार का ध्यान उस ओर गया . यह सभी जानते हैं कि नानक जी ने सं 1497 से 1521 तक चार बड़ी यात्राएँ कीं – जिन्हें “गुरु नानक देव की उदासियाँ” कहा जाता हैं . उनकी ये यात्राएँ देश-दुनिया के संत-विचारकों से मुलाक़ात करने, जाती-धर्म से ऊपर उठ कर मानवता की सेवा का सन्देश देने के लिए थीं . उनकी चौथी उदासी या यात्रा सन 1518 से 1521 के बीच अर्ब की थी, वे मदीना भी गए थे . उनकी यह यात्रा बलूचिस्तान, कराची, हिंगलाज, काबुल, समरकंद, बुखार, तेहरान सीरिया, तुर्की, रूस , बगदादा, मक्का तक की थी, वे कई कई मील पैदल चले और कुछ यात्रा ऊंट पर भी की .

    उसी उदासी के दौरान गुरु नानक देव काहिरा , मिस्र भी आये थे, लेकिन आज उनकी स्मृति के कोई निशान नहीं हैं. सन 1519 में कर्बला, अजारा होते हुए नानक जी और भाई मर्दाना कैकई नामक आधुनिक शहर में रुके थे, यह मिस्र का आज का काहिरा या कायरो ही है. उस समय यहाँ का राजा सुल्तान माहिरी करू था, जो खुद गुरु जी से मिलने आया था और उन्हें अपने महल में ठहराया था.

    ताजुद्दीन नक्शबंदी एक फ़ारसी/अरबी का लेखक थे। वे गुरु नानक देव कि मध्य-पूर्व यात्रा के दौरान उनके साथ कि दो साल साथ रहे थे। वे हर दिन कि डायरी भी लिखते थे। उनकी वह पांडुलिपि सं 1927 में मदीना की एक लायब्रेरी में मिली थी। ताजुद्दीन कि इस पांडुलिपि को मुश्ताक हुसैन शाह ने सं 1927 में खोजा था। बाद में वे सिख बन गए और प्रसिद्ध सिख गुरु संत सैयद प्रितपाल सिंह (1902-1969 ) के नाम से जाने गए।

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    इस पांडुलिपि में बताया है कि संत नानक दजला नदी के किनारे चलते हुए कुफा होते हुए कैकई शहर में पहुंचे थे। वहां के खलीफा या सुलतान माहिरी करू के आध्यात्मिक सलाहकार पीर जलाल ने सबसे पहले नानकदेव के अरबी में शब्द सुने, फिर उनसे अनुरोध किया कि वे उनके जिद्दी और क्रूर खलीफा कि सही राह बताएं। कहते हैं कि नानक देव की वाणी का खलीफा पर ऐसा असर हुआ कि उसने बाबा नानक को अपने महल में ठहराया।

    नानक जी वहां दो दिन रुके, कायरो से दूर अलेक्स्जेन्द्रिया की सूफी मस्जिद में भी नानक जी एक दिन रुके थे. सन 1885 के आसपास सूडान लड़ने गयी भारतीय फौज की सिख रेजिमेंट के 20 सैनिक उस स्थान पर गए भी थे जहां गुरु महाराज ठहरे थे. वहां उन्होंने अरदास की और प्रसाद भी वितरित किया था . यह स्थान आज के मशहूर पर्यटन स्थल सीटाडेल के भीतर मुहम्मद अली मस्जिद के पास कहीं राज महल में है, इस महल को सुरक्षा की द्रष्टि से आम लोगों के लिए बंद किया हुआ है, इसमें एक चबूतरा है जिसे – “अल-वली-नानक” कहते हैं, यहीं पर गुरु नानक ने अरबी में कीर्तन और प्रवचन किया था . सीटाडेल में इस समय किले के बड़े हिस्से को बंद किया हुआ है. यहाँ पुलिस और फौज के दफ्तर हैं किले के बड़े हिस्से को सेना, पुलिस और जेल के म्यूजियम में बदल दिया गया है.

    इस किले से स्वेज नहर के लिए रास्ता था, अभी भी वहां एक विशाल कुआँ और दरवाजा है , गुरूजी का स्थान _ “अल वली नानक मुकाम” वहीँ कहीं हैं . आज सीटाडेल एक व्यस्त पर्यटन स्थल है। यहां की सुल्तान अल नासिर मुहम्मद मस्जिद की पूरी छत भारत से लाए गए चन्दन से बनी है और निर्माण के कोई आठ सौ साल बाद भी यह खुशबु और ठंडक दे रही है .यह बात वहां के गाइड बताना नहीं भूलते हैं लेकिन इससे बमुश्किल २० मीटर दूर स्थित बाबा नानक की स्मृति के बारे में कोई जानता नहीं, बताता नहीं .

    एक तो लोगों को एस पावन स्थान के महत्व की जानकारी नहीं है दूसरा हमने इजिप्ट सरकार को यह सूचना साझाँ नहीं की . भारत, सिख मत और गुरु नानक देव की स्मृतियों के लिहाज से यह बेहद महत्वपूर्ण स्थान है और भारत सरकार को इस स्थान पर गुरु नानक देव के स्थल पर विशेष प्रदर्शनी के लिए इजिप्ट सरकार से बात करनी ही होगी, जब इजिप्ट सरकार को महसूस होगा कि इससे सिख पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा तो निश्चित ही वह इसके लिए तैयार होगी, क्योंकि इजिप्ट की अर्थ व्यवस्था का आधार पर्यटन ही हैं . काश भारत सरकार इजिप्त सरकार से बात कर इसे सिखों के पवित्र स्थल के रूप में स्थापित करने के लिए कार्यवाही करें .

    यहाँ जानना जरुरी हैं कि इजिप्ट यानि मिस्र की राजधानी काहिरा या कायरो अरब – दुनिया का सबसे बड़ा शहर है, नब्बे लाख से अधिक आबादी का, यहाँ इसाईओं की बड़ी आबादी है, कोई बारह फीसदी, लेकिन हिन्दू-सिख-जैन-बौध अर्थात भारतीय मूल के धर्म अनुयायी दीखते नहीं हैं, या तो नौकरी करने वाले या फिर अस्थायी रूप से लिखने-पढने आये लोग हेई गैर मुस्लिम-ईसाई मिलते हैं , ऐसा नहीं कि वहां हिन्दू धर्म के बारे में अनभिज्ञता है. वहां हिंदी फ़िल्में बेहद लोकप्रिय हैं और हर दूसरा आदमी यह जानने को जिज्ञासु रहता है कि हिन्दू महिलाएं बिंदी या मांग क्यों भारती हैं, भारत का भोजन या संस्कार क्या-क्या हैं . एक युवा ऐसा भी मिलने आया कि उसके परबाबा सिखा थे और काम के सिलसिले में मिस्र आये थे , यहाँ उन्होंने इस्लाम ग्रहण कर लिया . एक युवा ऐसा भी मिला जिसका नाम नेहरु अहमद गांधी है, इसके बाबा का नाम गांधी है और बाबा ने ही भारत के प्रति दीवानगी के चलते अपने पोते का नाम नेहरु रखा.

    इजिप्त की राजधानी कायरो के नए बने उपनगर हेलियोपोलिस में एक हिन्दू मंदिर की संरचना और ग्यारवीं सदी के पुराने सलाउद्दीन के किले यानि सीटा ड़ेल में गुरु नानकदेव के प्रवचन देने और ठहरने की कहानियाँ यहाँ भारतीय धर्म- आध्यात्म के चिन्हों को ज़िंदा रखे हैं .

    हालाँकि कायोर के मौलाना आजाद भारतीय सांस्क्रतिक केंद्र में हिंदी प्रशिक्षण कार्यक्रम और अन्य गतिविधियों के जरिये बहुत से लोग भारत से जुड़े हैं, अल अज़हर यूनिवर्सिटी में भी भारत के सैंकड़ों छात्र हैं , लेकिन अभी यहाँ भारतीयता के लिए कुछ और किया जाना अनिवार्य है, वर्ना मिस्र की नयी पीढ़ी भारत को महज फिल्मों या टीवी सीरियल के माध्यम से अपभ्रंश के रूप में ही पहचानेगी .

    • लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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    1 Comment

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