…अब तो लालच छोड़ दे बंधु!

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भगवान् बुद्ध की तुलना में सभी महान धार्मिंक गुरु बहुत छोटे पड़ जाते हैं। वे तुम्हें अपना अनुयायी बनाना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि तुम एक निश्चित अनुशासन का पालन करो, वे चाहते हैं कि तुम्हारे तौर-तरीके, तुम्हारी नैतिकता, तुम्हारी जीवन शैली एक व्यवस्थित तरीके से हो। वे तुम्हें ढालकर कर एक सुन्दर जेल की कोठरी दे देते हैं। बुद्ध पूरी तरह से स्वतंत्रता के लिए अकेले खड़े हैं। बिना स्वतंत्रता के व्यक्ति अपने परम रहस्य को नहीं जान सकता, जंजीरों में बंधा हुआ वह आकाश में अपने पंख फैला कर उस पार की यात्रा पर नहीं जा सकता।

सभी धर्म व्यक्ति को जंजीरों से बांध कर, किसी तरह लगाम लगाए हुए उन्हें अपने वास्तविक स्वरूप में रहने की इजाजत नहीं देते अपितु वे उसे एक व्यक्तित्व और मुखोटे दे देते हैं- और इसे वे धार्मिंक शिक्षा का नाम दे देते हैं। बुद्ध कोई धार्मिंक शिक्षा नहीं देते। वे केवल चाहते हैं कि जो भी हो, तुम सहज रहो। यही है तुम्हारा धर्म-अपनी सहजता में जीना। किसी मनुष्य ने आज तक स्वतंत्रता से इतना प्रेम नहीं किया। किसी मनुष्य ने आज तक मानवता से इतना प्रेम नहीं किया। वह केवल इसी कारण से अनुयायियों को स्वीकार नहीं करते क्योंकि किसी को अपना अनुयायी स्वीकार करने का अर्थ है उसकी गरिमा को नष्ट करना।

उन्होंने केवल सह यात्रियों को स्वीकार किया। शरीर त्यागने से पहले उनका जो अंतिम वक्तव्य था, ‘मैं यदि कभी दोबारा लौटा तो तुम्हारा मैत्रेय बन कर लौटूंगा।’ मैत्रेय का मतलब होता है मित्र। भारत इस सरल से कारण के लिए गौतम बुद्ध को समझ नहीं पाया। वह समझता है कि मौन बैठना, बस होना मात्र कोई मूल्य नहीं रखता। तुम्हें कुछ करना होगा, तुम्हें प्रार्थना करनी होगी, तुम्हें मंत्रजाप करने होंगे। तुम्हें किसी मंदिर में जा कर इंसान के ही बनाये हुए भगवान की पूजा करनी होगी।

‘‘तुम शांत बैठे-बैठे क्या कर रहे हो?’ और गौतम बुद्ध का सबसे बड़ा योगदान यह है कि तुम अपनी शाश्वतता, अपनी लौकिक सत्ता को प्राप्त कर सकते हो अगर तुम बिना किसी उद्ेदश्य के, बिना किसी इच्छा के, और बिना किसी लालसा के शांत बैठ सको, बस अपने होने का आनंद लेते हुए-उस खाली अंतराल में जहां सहस्त्र कमल खिल उठते हैं। गौतम बुद्ध अपने आप में एक श्रेणी है। सिर्फ कुछ ही लोगों ने उनको समझा है।

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