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    अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस 12 मई: दया व सेवा की प्रतिमूर्ति ‘फ्लोरेंस नाइटिंगेल’

    By May 12, 2019 Current Issues 2 Comments5 Mins Read
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    Post Views: 688

    प्रदीप कुमार सिंह

    ‘अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस’ स्वास्थ्य सेवाओं में नर्सों के योगदान को सम्मानित करने तथा उनसे संबंधित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा के लिए मनाया जाता है। यह दिवस आधुनिक नर्सिंग की शुरूआत करने वाली तथा मानव जाति के लिए दया एवं सेवा की महान नारी फ्लोरेंस नाइटिंगेल के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। एक समृद्ध और उच्चवर्गीय ब्रिटिश परिवार में 12 मई 1820 को जन्मी फ्लोरेंस नाइटिंगेल अपनी सेवा भावना के लिए याद की जाती हैं।

    इंटरनेशनल काउंसिल ऑफ नर्सेस 130 से अधिक देशों के नर्स संघों का एक महासंघ है। इसकी स्थापना
    1899 में हुई थी और यह स्वास्थ्य देखभाल प्रोफेशनल के लिए पहला अंतर्राष्ट्रीय संगठन है। इसका मुख्यालय
    जिनेवा, स्विट्जरलैंड में है। संगठन का लक्ष्य दुनिया भर के नर्सों के संगठनों को एक साथ लाना है, नर्सों की
    सामाजिक-आर्थिक स्थिति और दुनिया भर में नर्सिंग के पवित्र प्रोफेशन को आगे बढ़ाने और वैश्विक और घरेलू
    स्वास्थ्य नीति को प्रभावित करना है।

    “ये बात सच है कि एक मरीज का इलाज डाक्टर करता है, मगर उस मरीज की देखभाल नर्स करती है। वो
    मरीज के सिर्फ बाहरी जख्मों पर ही नहीं बल्कि उसके अंदरूनी जख्मों पर भी मरहम लगाती है। ऐसी मदद की
    जरूरत मरीज को तब और ज्यादा महसूस होती है जब उसे बताया जाता है कि उसे कोई जानलेवा बीमारी है या वह कुछ ही दिनों का मेहमान है। रोगी के लिए एक नर्स को माँ बनना पड़ता है।”

    • जन्म: 12, मई 1820 को इटली के फ्लोरेंस में और जिंदगी इंग्लैंड में गुजरी
    • व्यवसाय: नर्स, निधन: 13 अगस्त, 1910, प्रसिद्ध: आधुनिक नर्सिंग के लिए
    • उपनाम: लेडी विद द लैंप (Lady with the Lamp)
    • निधन: 13 अगस्त, 1910

    Image result for फ्लोरेंस नाइटिंगेल

    सन 1840 में इंग्लैंड में भयंकर अकाल पड़ा और अकाल पीड़ितां की दयनीय स्थिति देखकर फ्लोरेंस
    नाइटिंगेल द्रवित हो गयी। अपने एक पारिवारिक मित्र से उन्होंने नर्स बनने की इच्छा प्रकट की। उनका यह निर्णय सुनकर उनके परिजनों और मित्रों में खलबली मच गयी। इतने प्रबल विरोध के बावजूद फ्लोरेंस नाईटेंगल ने अपना इरादा नही बदला। विभिन्न देशों में अस्पतालों की स्थिति के बारे में उन्होंने जानकारी जुटाई और शयनकक्ष में मोमबत्ती जलाकर उसका अध्ययन किया। उनके दृढ़ संकल्प को देखकर उनके माता-पिता को झुकना पड़ा और उन्हें नर्सिंग की ट्रेनिंग के लिए जाने की अनुमति देनी पड़ी। उन्होंने अभावग्रस्त लोगों की सेवा तथा चिकित्सा सुविधाओं को सुधारने तथा बनाने के कार्यक्रम आरंभ किये।

    नाइटिंगेल एक विलक्षण और बहुमुखी लेखिका थी। अपने जीवनकाल में उनके द्वारा प्रकाशित किए गये
    ज्यादातर लेख में चिकित्सा ज्ञान का समावेश होता था। फ्लोरेंस का सबसे महत्वपूर्ण योगदान 1854 में क्रीमिया के युद्ध में रहा। अक्टूबर 1854 में उन्होंने 38 स्त्रियों का एक दल घायलों की सेवा के लिए तुर्की भेजा। जब चिकित्सक चले जाते तब वह रात के गहन अंधेरे में मोमबत्ती जलाकर घायलों की सेवा के लिए उपस्थित हो जाती।

    फ्लोरेंस नाइटिंगेल ने मरीजों और रोगियों की सेवा पूरे मनोयाग से की। क्रीमिया युद्ध के दौरान लालटेन लेकर
    घायल सैनिकों की प्राणप्रण से सेवा करने के कारण ही उन्हें ‘लेडी बिथ द लैम्प’ (दीपक वाली महिला) कहा गया।

    नर्सिंग में उनके अद्वितीय कार्य के लिए उन्हें 1869 में उन्हें ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने ‘रायल रेड क्रास’ से सम्मानित किया।

    जन समुदाय के अनुसार “वह तो साक्षात देवदूत है दुर्गन्ध और चीख पुकार से भरे इस अस्थायी अस्पतालों में वह एक दालान से दूसरे दालान में जाती है और हर एक मरीज की भावमुद्रा उनके प्रति आभार और स्नेह के कारण द्रवित हो जाती है। रात में जब सभी चिकित्सक और कर्मचारी अपने-अपने कमरों में सो रहे होते हैं

    तब वह अपने हाथां में लैंप लेकर हर बिस्तर तक जाती है और मरीजां की जरूरतों का ध्यान रखती है।”
    इसी बीच उन्होंने नोट्स आन नर्सिग पुस्तक लिखी। उन्होंने 1860 में सेंट टामस अस्पताल और नर्सों के
    लिए नाइटिंगेल प्रशिक्षण स्कूल की स्थापना की थी। जीवन का बाकी समय उन्होंने नर्सिग के कार्य को बढ़ाने व
    इसे आधुनिक रूप देने में बिताया। युद्ध में घायलों की सेवा सुश्रूषा के दौरान मिले गंभीर संक्रमण ने उन्हें जकड़
    लिया था। उनका 90 वर्ष की आयु में 13 अगस्त, 1910 को निधन हो गया।

    नाइटिंगेल के द्वारा किये गए सामाजिक सुधारां में उन्होंने ब्रिटिश सोसाइटी के सभी भागों में हेल्थकेयर
    को काफी हद तक विकसित किया। भारत में बेहतर भूख राहत की वकालत की और जहाँ महिलाआें पर अत्याचार होते हैं वहाँ महिलाआें के हक में लड़ी और देश में महिला कर्मचारियों की संख्या को बढ़ाने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

    अंतर्राष्ट्रीय नर्स दिवस के अवसर पर भारत के महामहिम राष्ट्रपति स्वास्थ्य क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाओं के
    लिए देश भर से चयनित नर्सों को ‘राष्ट्रीय फ्लोरेंस नाइटिंगेल पुरस्कार’ से सम्मानित करते हैं। नर्सों की
    उल्लेखनीय सेवा को मान्यता देने के लिये केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने वर्ष 1973 में यह पुरस्कार शुरू किया था। इस पुरस्कार के तहत प्रत्येक विजेता को पचास हजार रूपये नकद राशि, प्रशस्ति पत्र और एक पदक प्रदान किया जाता है।

    हमारा सुझाव :

    नई महामारियों, संक्रमण और प्राकृतिक आपदाओं जैसे बढ़ते खतरों से उत्पन्न चुनौती से निबटने के
    लिए देश की स्वास्थ्य सेवाओं को और बेहतर बनाने के वास्ते नर्सिंग शिक्षा और प्रशिक्षण में नवाचार तथा उन्नत प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

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    2 Comments

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