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    बिहार में मातम

    By June 20, 2019 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    बिहार का मुजफ्फरपुर बार-बार अखबारी सुर्खियां बन रहा है, और उसकी व्यथा-कथा हमारे रोंगटे खड़े कर देती है। दूर दराज के इलाकों से इलाज कराने आए अपने बच्चों के लोगो को जब इलाज के बदले मौत मिल रही है तो वे परिवार बुरी तरह टूट रहे हैं।

    बता दें कि पिछले ही साल तो, यहीं के एक शेल्टर होम से जाने कितनी बच्चियों के बलात्कार और मौत के घाट उतार दिए जाने की घटना सुर्खियां बनी थीं। सुप्रीम कोर्ट तक ने आक्रोश व्यक्त किया, लेकिन थेथर हुक्मरानों पर कोई असर नहीं हुआ। हुक्मरान जानते हैं, कोर्ट अपना कार्य कर रहा है, हम अपना कर रहे हैं। हम बच्चियों का बलात्कार करेंगे और गला घोंट देंगे। अब इतने पर कोर्ट -कचहरियां गुस्सा भी नहीं करें तो क्या करें। कोर्ट के आदेश दो-चार रोज र्चचा में होते हैं, और फिर ठंडे बस्ते में सो जाते हैं।

    हुक्मरान जानते हैं, जनता बड़ी उदार और नरम-दिल है, थोड़ा सा भला-बुरा कहती है और फिर वोट दे ही देती है। प्रेमचंद की एक कहानी ‘‘कफन’ में घीसू अपने जवान बेटे को यही पाठ पढ़ाता है। लोगों की उदारता पर उसे पूरा भरोसा था। कफन का इंतजाम हर हाल में जनता करती है। घीसू का पाठ माधव से अधिक नेताओं ने समझा है। समझ-बूझ कर वह ऐसी थेथर हो चुकी है कि बड़ी से बड़ी वारदात उसकी संवेदना को नहीं छू पाती। जनता चाहे जितनी बेहाल हो, उसकी मस्ती पर कोई असर नहीं पड़ता। उसी मुजफ्फरपुर से दिल दहलाने वाली खबरें एक बार फिर आ रही हैं।

    एक्यूट इनसफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) से 130 बच्चे मर गए। सैकड़ों अस्पताल में मौत से जूझ रहे हैं। इक्कीसवीं सदी के उन्नीसवें साल से हम गुजर रहे हैं। मुजफ्फरपुर कोई छोटा शहर नहीं है। ऐतिहासिक शहर है। वहां पुराना मेडिकल कॉलेज-अस्पताल है। बावजूद इसके 130 बच्चों की जान नहीं बच सकी। बच्चे मर रहे थे, तब मुल्क के प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे। उनके सहयोगी शपथ ले रहे थे। बिहार के मुख्यमंत्री अपनी पार्टी की आनुपातिक भागीदारी के लिए उलझ रहे थे। जब उदासी हाथ लगी तब बिहार आकर आनन-फानन समानांतर शपथ-उत्सव कराया और दिल्ली का बदला लेने की हास्यास्पद ही सही कोशिश की। और इस बीच बच्चे मरते रहे।

    बिहार के हेल्थ मिनिस्टर इस दौरान विदेशों की सैर कर रहे थे। भीषण तपिश से सौ से अधिक लोग मर गए। इनसफेलाइटिस से सवा सौ से अधिक बच्चे मर गए। लेकिन सरकारें मस्त हैं। उन्हें पांच साल के लिए जनता से समर्थन मिल गया है। उस पर सीधे हमला करना जनतंत्र पर हमला करने जैसा होगा। ऐसे मस्त समय में उन पर कौन करेगा हमला? इसलिए भी वे मस्त हैं, निश्चिन्त हैं। पंक्तियां लिखे जाने तक केंद्रीय स्वास्य मंत्री विदेश दौरे से लौट आए हैं, और जैसा कि अखबारी सूचना है, मुख्यमंत्री ने भी आज मुजफ्फरपुर जाने की कृपा कर डाली है।

    प्रधानमंत्री ने संख्या बल में कमजोर विपक्ष से कहा है कि वह नंबर पर ध्यान नहीं दे। किन्तु स्वयं सरकारें नंबर पर ही ध्यान देती हैं। जब तक मरने वालों का आंकड़ा सौ के पार नहीं हुआ, सरकार सक्रिय नहीं हुई। हमें उस बीमारी के बारे में भी जानना चाहिए, जिससे बच्चे तबाह हैं। एक्यूट इनसफेलाइटिस सिंड्रोम यानी ‘‘एईएस’ नाम की यह बीमारी 15 वर्ष से नीचे के बच्चों को होती है। शून्य से पांच वर्ष के बच्चे इससे अधिक आक्रांत होते हैं। यह वायरल है, और इसके जीवाणु कई स्तर पर बढ़ते हैं। इसे जापानी इनसफेलाइटिस भी कहा जाता है, लेकिन गरीब जनता ने इसका नाम चमकी-बुखार रख दिया है, और इस नाम से इसका भय फैलता जा रहा है। डॉक्टरों के अनुसार यह बीमारी बिहार, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु के कुछ इलाकों में प्राय: होती है। माथे में तेज दर्द और तत्जनित तकलीफ से बच्चे कोमा में चले जाते हैं, और फिर उनका बचना मुश्किल हो जाता है।

    ध्यान देने वाली प्रमुख बात है कि यह बीमारी 1995 से लगभग प्रति वर्ष कुछ न कुछ बच्चों को लील जा रही है, बावजूद इसके इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। पटना के एक प्रतिष्ठित डॉक्टर सीपी ठाकुर, जो केंद्रीय स्वास्य मंत्री भी रह चुके हैं, ने चिंता जाहिर की है कि इस पर ‘‘पर्याप्त शोध की भी जरूरत है, और पहले से हर हाल में सावधान रहना जरूरी है’ बीमारी फैलने पर, उसके महामारी का रूप लेने पर सरकार कुछ समय के लिए हिलती है, और फिर सो जाती है।

    इस बार एक बात यह उजागर हुई कि यह बीमारी लीची खाने से हुई है। लेकिन जिस उम्र के बच्चों को इस बीमारी ने दबोचा है, सब लीची खाने वाले नहीं हैं। दूध पीने वाले बच्चे भला लीची कैसे खाएंगे? और यदि लीची खाने से यह बीमारी होती है, तो यह उन इलाकों और प्रदेशों में कैसे होती है, जहां यह फल नहीं मिलता। जैसे तमिलनाडु में। इस विषय पर पक्की राय तो विशेषज्ञ ही देंगे। लेकिन किसी भी किस्म की अफवाह रोकने की जिम्मेदारी सरकार की है। यदि लीची से इस रोग का कुछ संबंध बनता है, तो तत्काल जांच करा कर इसका प्रचार-विज्ञापन सुनिश्चित करे। अफवाहों को महामारी के रूप में नहीं बढ़ने देना है।

    मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ खबरें बतला रही हैं कि मरने वाले बच्चे गरीब परिवारों के ही क्यों हैं? गरीबी से बीमारी के जुड़ाव का अर्थ है सफाई की कमी यानी गंदगी का इजाफा, इस बीमारी के कारणों में से है। प्रधानमंत्री के स्वच्छता अभियान की इससे पोल-पट्टी खुल जाती है।

    नल-जल योजना तथा दूसरी स्वच्छता योजनाओं की विफलता भी तो इसका आधार हो सकती है। जो भी हो, प्रथम दृष्टया यह सरकार की विफलता कही जाएगी। जब बीमारी प्रति वर्ष हो जाया करती है, तब इसके अनुसंधान और रोक -थाम के लिए पर्याप्त व्यवस्था पहले से ही होनी चाहिए थी। सरकार अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकती।

    विकास के नाम पर सड़कें चौड़ी होती जा रही हैं। पेड़ काट कर सड़कें बीरान कर दी गई हैं। बेजरूरत की अट्टालिकाएं खड़ी हो रही हैं। लेकिन शिक्षा, स्वास्य और रोजगार (उत्पादन) का क्षेत्र पिछड़ता जा रहा है। ऐसा अकारण नहीं है। निर्माण कायरे में कमीशन मिलता है, लेकिन शिक्षा, स्वास्य और उत्पादन जैसे आधारभूत ढांचे को विकसित करने में नहीं। इसलिए भ्रष्ट राजनेता आधारभूत ढांचे को छूना नहीं चाहता। जनता भी वास्तविक विकास का मतलब नहीं समझती। सब मिला कर दुर्दशा की बड़ी कहानी लिखी जा रही है, जिसे हम विकास कह रहे हैं। ऐसे विकास में बच्चियों के साथ बलात्कार होते रहेंगे और अबोध-दुधमुंहे बच्चे अकाल काल-कवलित होते रहेंगे। कम से कम मुजफ्फरपुर हमें यही बतलाना चाहता है।

    • प्रेमकुमार मणि

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