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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    नेपाल में सड़कों पर जनाक्रोश, खतरे में लोकतंत्र

    ShagunBy ShagunApril 24, 2026 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    Public Outrage on the Streets of Nepal; Democracy at Risk.
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    डा. गिरीश

    नेपाल के प्रधान मंत्री श्री बालेन शाह को सत्ता संभाले अभी एक माह भी पूरा नहीं हुआ कि उनके खिलाफ जन आक्रोश की चिनगारियां फूटने लगी हैं। जिस लोकप्रियता के शिखर पर आरुढ हो कर वे नेपाल के प्रधान मंत्री बने थे, वह जल्दी ही दरकने लगेगी, इसकी भविष्यवाणी इन पक्तियों के लेखक ने दो सप्ताह पूर्व ही अपने एक लेख में कर दी थी।

    हालात यह हैं कि पूरे नेपाल के अलग अलग हिस्सों में हज़ारों लोग उनके अव्यवहारिक और जनविरोधी फैसलों के खिलाफ सड़कों पर उतरने लगे हैं। इनमें बड़ी संख्या में वे युवा हैं, जिन्होंने सितंबर माह में विकराल आंदोलन कर तत्कालीन सरकार को अपदस्थ कर दिया था। मार्च महीने में हुये आम चुनावों में अपनी पार्टी को मिले भारी बहुमत के उपरांत श्री बालेन शाह प्रधानमंत्री बने थे। अब हालात यह हैं कि जिस जेन जी के आंदोलन की बदौलत वह पीएम की गद्दी पर बैठे थे, आज उन्ही में सबसे बड़ा आक्रोश दिख रहा है।

    बालेन शाह के खिलाफ उमड़ पड़े इन विरोध प्रदर्शनों में न केवल छात्र, अपितु आम नागरिक, व्यापारी और राजनैतिक दल के लोग राजधानी काठमांडू सहित कई शहरों में सड़कों पर उतर आए हैं। ये प्रदर्शन सिर्फ सड़कों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इन्होने देश के प्रशासनिक केन्द्र ‘सिंह दरबार’ को भी अपनी चपेट में ले लिया है।Nepal has proven it: If the intent is pure, the system can change overnight!

    यह आक्रोश अनायास नहीं है, अपितु इसके पीछे सरकार के कई अतिवादी और जल्दबाजी में लिये गये फैसले हैं।

    इस विरोध का एक बड़ा कारण सरकार का यह फैसला है कि भारत से आयात होने वाले 100 रुपये से अधिक कीमत के सामान पर अनिवार्य कस्टम ड्यूटी लगाई जाएगी। इससे भारत की सीमा से लगे क्षेत्रों के वे तमाम लोग बुरी तरह आहत हैं, जो रोजमर्रा की जरूरत की साज सामग्री भारत के बाजारों से खरीद कर ले जाते हैं।
    खरीद फरोक्त इतनी व्यापक है कि भारतीय भूभाग में लगने वाले लोकल बाजारों में विक्रेता भारत के होते हैं तो खरीददार अधिकतर नेपाल के।

    इतना ही नहीं अभी तक की व्यवस्था में लोगों के वाहनों से आवागमन पर कोई प्रतिबंध नहीं था। अब नई सरकार ने दो पहिया, चार पहिया और अन्य वाहनों पर भारी प्रवेश कर लगा दिया है। इससे दोनों तरफ के नागरिक भारी संकट में आगये हैं। इसका एक कारण यह भी है कि नेपाल और भारत के बीच न सिर्फ लम्बी खुली सीमा है बल्कि दोनों देशों के बीच रोटी और बेटी के रिश्ते हैं। ऐसे में दोनों देशों के लोग न केवल अपनी रिश्तेदारियां निभाने आते जाते हैं, अपितु एक दूसरे की सीमा में जा कर सब्जी और राशन तक खरीदते हैं।

    यही नहीं प्रधान मंत्री बनने के तत्काल बाद बालेन शाह ने छात्र राजनीति पर प्रतिबंध लगा दिया था। राजनीतिक दलों से जुड़े संगठनों को शिक्षण संस्थानों में प्रतिबंधित कर दिया गया। यह फैसला तानाशाही पूर्ण तो है ही इससे संदेश गया कि जिन छात्र और युवाओं के आंदोलन के दम पर वह सत्ता में आये थे, आज उन्हें ही अधिकारविहीन कर रहे हैं।

    बालेन शाह ने सत्ता में आने के तत्काल बाद ही पूर्व प्रधानमंत्री के पी शर्मा ओली और उनके साथ गृह मंत्री रहे रमेश लेखक को गिरफ्तार करा दिया था। इतना ही नहीं उन्हें हथकाड़ियाँ लगा कर जेल भेजा गया। अब श्री शाह दस पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ जांच करा रहे हैं। सन्देश जा रहा है कि श्री शाह विपक्ष को रास्ते से हटाने के लिये काम कर रहे हैं। जो भी हो, हर राजनैतिक दल और नेता के वहां समर्थक हैं और वे प्रतिरोध की कार्यवाहियों का हिस्सा बन रहे हैं।

    अभी हाल में एक आदेश के जरिये पशुपति नाथ मन्दिर परिसर में पूजा -अर्चन संबंधी व्यवसाय से जुड़े कारोबारियों को जबरिया हटा दिया गया। शहरों की शक्ल बदलने के नाम पर फुटपाथियों को उजाड़ा जारहा है। इन सब कार्यवाहियों से शहर भले ही खूबसूरत दिखें लेकिन तमाम लोग रोजी रोटी से वंचित हो रहे हैं। बुलडोजरवादी छवि निर्माण का यह सपना उन्हें महंगा पड़ सकता है।

    अनुभव बताते हैं कि वर्गीय चेतना और विकास के स्पष्ट मॉडल से रहित आंदोलनों के बल पर सत्ता तो प्राप्त की जा सकती है, लोक लुभावन कार्यों के बल पर वह कुछ दिनों तक टिकी भी रह सकती है, पर वह स्थायी नहीं हो सकती।

    इसी उथल पुथल के बीच बालेन शाह ने अपनी सरकार के गृहमंत्री को बाहर का रास्ता दिखा दिया। एक अन्य मंत्री को वह पहले ही हटा चुके हैं। उन दोनों के ऊपर जरूर कुछ आरोप हो सकते हैं। पर बड़ा सवाल यह है कि यदि वे दागी थे तो फिर मात्र चन्द दिन पहले मंत्रिमंडल में लिये ही क्यों गये।

    बालेन शाह के अपरिपक्व और अव्यवहारिक फैसले उनकी सरकार के लिये घातक साबित हो सकते हैं लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण सवाल है कि नेपाल का लोकतंत्र जो अभी शैशवकाल में है, इन करगुजारियों से खतरे में पड़ सकता है।

    Shagun

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