वह मेरा गाँव था। बचपन की अवस्था थी। गाँव के सारे घरों से एक अपनेपन का रिश्ता था। हर बड़े-बूढों में एक आदर्श नज़र आता था। ऐसा था हमारा संस्कार और ऐसी थी हमारी दृष्टि।
गाँव में ही राम करन कलवार का एक घर था। वे मूल रूप से थे तो किसान ही पर एक छोटी सी किराना-परचून की दूकान भी थी उनकी। होली दिवाली के मौकों पर हम बच्चे, फरवार (खलिहान) से ओसाए गए पइया, भूसों से खेल खेल में बचे अनाज के दाने भी ढूँढ निकालते थे। नए नए निकले बाँस करइल के छिलकों से सूप का काम लिया जाता था – पछोरने के लिए। फिर दानों को बटोरते और पहुँच जाते थे करन दादा की दुकान पर। उन्हें बेचकर गुब्बारे, पटाखे या ‘लेबनचूस’ लिए जाते। इन सब में एक दिव्य आनंद था। उन दिनों पटाखे चला कर जो ख़ुशी हासिल होती, वह आज हजारों के क्रैकर्स फूँक देने पर भी नहीं मिलती। आज भी पटाखों के बारूद की ‘खुशबू’ बचपन के उन गुजरे पलों को जीवंत कर जाते हैं। लेबनचूसों का वह स्वाद आज सैकड़ों वाली आइसक्रीम खा कर भी नहीं मिलता।
जेठ-बैशाख की गर्मियों में जब घूरे की खाद खेतों में डालने का मौसम शुरू होता तो करन दादा के घर अपनी बैलगाड़ी लेकर उनके एक रिश्तेदार आते -सीताराम। अधेड़ अवस्था,कुरता धोती में निखरता व्यक्तित्व, चेहरे पर सफ़ेद घनी मूंछें और वैसा ही सर पर बाल। वे अपनी बैलगाड़ी से खेतों तक खाद पहुँचाते और वापसी के समय जब लढ़िया (बैलगाड़ी) खाली हो जाती तो हम बच्चे उस पर लद जाते। ऐसा अनुभव होता जैसे कोई राजकुमार सजीले रथ में सवार हो।बैलगाड़ी सवारी जैसा वह रोमांच तो आज हवाई यात्रा में भी नहीं। ….सो दिन भर वे खेतों में खाद पहुँचाते और रात में खा पीकर जब सारा गाँव बिछौने पर चला जाता तो सीताराम दादा सभी को मनोरंजन की एक और दुनिया में ले जाते। वे एक कुशल किस्सागो थे। लम्बे और गीतमय कहानियों में उन्हें महारत हासिल थी। उनके किस्से सारी रात चल सकते थे। सभी मन्त्र-मुग्ध सुनते रह जाते। मजाल है कि किसी को नींद आ जाय। किस्से के बीच बीच में कभी हमारे पड़ोस के काका सीताराम दादा पर चुटकी भी लेते –
नदिया किनारे झुराय मुरई।
यस मन कहै सीतारमवा क चुरई।।
वह एक सुहाना सफ़र था। धीरे धीरे सफ़र के सारे मुसाफिर बिछड़ते जा रहे हैं। अब न रहे रामकरन दादा, न सीताराम और न ही पड़ोस के काका। आने वाली पीढ़ियों ने भी वह विरासत नहीं सँभाला। हम तो घटती मिटती परम्परा के केवल साक्षी भर रह गए हैं। कहाँ गए वो लोग !!!
– अरुण कुमार तिवारी की वॉल से







