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    सावधान सुलग रहा है असम

    By July 18, 2018 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    बहुप्रतिक्षित राष्ट्रीय नागरिक पंजी यानि एनआरसी का पहला ड्राफ्ट आते ही सीमावर्ती राज्य असम में तनाव बढ़ गया है। सूची में घोषित आतंकी व लंबे समय से विदेश में रहे परेश बरूआ, अरूणोदय दहोटिया का नाम तो है लेकिन दो सांसद सहित कई विधायकों का नाम इसमें है ही नहीं। होजाई से भाजपा विधायक शिलादित्य देव, गोलकगंज विधायक अश्विनी राय सरकार रूपालीहाट से कांग्रस विधायक नूरूल हूदा, अंगूरलता डेका, बदरूद्दीन अजमल सहित कई ऐसे नामों को राज्य या देश की नागरिकता सूची में स्थान नहीं मिला है जोकि पीढ़ियों से राज्य में रह रहे हैं। अपना नाम देखने के लिए केंद्रों पर भीड़ है तो वेबसाईट ठप्प हो गई। इस बीच सिल्चर में एक व्यक्ति ने अपना नाम ना होने के कारण आत्महत्या कर ली। हजारों मामले ऐसे हैं जहां परिवार के आधे लेागों को तो नागरिक माना गया और आधों को नहीं। हालांकि प्रशासन कह रहा है कि यह पहला ड्राफ्ट है और उसके बाद भी सूचियों आएंगी। फिर भी कोई दिक्कत हो तो प्राधिकरण में अपील की जा सकती है। यह सच है कि यह दुनिया का अपने आप में ऐसा पहला प्रयोग है जब साढ़े तीन करोड़ से अधिक लोगों की नागरिकता की जांच की जा रही है। लेकिन इसको ले कर बीते कई दिनों से राज्य के सभी कामकाज ठप्प हैं। पूरे राज्य में सेना लगा दी गई है।

    असम समझौते के पूरे 38 साल बाद असम से अवैध बांग्लादेशियों को निकालने की जो कवायद शुरू हुई, उसमें राज्य सरकार ने सांप्रदायिक तड़का दे दिया, जिससे आशंकाएं, भय और अविश्वास का महौल विकसित हो रहा है। असम के मूल निवासियों की बीते कई दशकों से मांग है कि बांग्लादेश से अवैध तरीके से घुसपैठ कर आए लोगों की पहचान कर उन्हें वहां से वापिस भेजा जाए। इस मांग को ले कर आल असम स्टुडंेट यूनियन(आसू) की अगुवाई में सन 1979 में एक अहिंसक आंदोलन शुरू हुआ था, जिसमें सत्याग्रह, बहिष्कार, धरना और गिरफ्तारियां दी गई थीं। आंदोलनकारियों पर पुलिसिया कार्यवाही के बाद हालात और बिगड़े। 1983 में हुए चुनावों का इस आंदोलन के नेताओं ने विरोध किया।

    चुनाव के बाद जम कर हिंसा शुरू हो गई। इस हिंसा का अंत केंद्र सरकार के साथ 15 अगस्त 1985 को हुए एक समझौते (जिसे असम समझौता कहा जाता है) के साथ हुआ। इस समझौते के अनुसार जनवरी-1966 से मार्च- 1971 के बीच प्रदेश में आए लोगों को यहां रहने की इजाजत तो थी, लेकिन उन्हें आगामी दस साल तक वोट देने का अधिकार नहीं था। समझौते में केंद्र सरकार ने यह भी स्वीकार किया था कि सन 1971 के बाद राज्य में घुसे बांग्लादेशियों को वापिस अपने देश जाना होगा। इसके बाद आसू की सरकार भी बनीं। लेकिन इस समझौते को पूरे 38 साल बीत गए हैं और विदेशियों- बांग्लादेशी व म्यांमार से अवैध घुसपैठ जारी है। यही नहीं ये विदेशी बाकायदा अपनी भारतीय नागरिकता के दस्तावेज भी बनवा रहे हैं।

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    सन 2009 में मामला सुप्रीम केार्ट पहुचा। जब सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर एनआरसी बनाने का काम शुरू हुआ तो जाहिर है कि अवैध घुसपैठियों में भय तो होगा ही। लेकिन असल तनाव शुरू होने जब राज्य शासन ने नागरिकता कानून संशोधन विधेयक को विधान सभा में पेश किया। इस कानून के तहत बांग्लादेश से अवैध तरीके से आए हिंदू शरर्णाथियों को नागरिकता दिए जाने का प्रावधान है। यही नहीं घुसपैठियों की पहचान का आधार वर्ष 1971 की जगह 2014 किया जा रहा है। जाहिर है कि इससे अवैध घुसपैठियों की पहचान करने का असल मकसद तो भटक ही जाएगा। हालांकि राज्य सरकार के सहयोगी दल असम गण परिषद ने इसे असम समर्झाते की मूल भावना के विपरीत बताते हुए सरकार से अलग होने की धमकी भी दे दी है। हिरेन गोहाईं, हरेकृष्ण डेका, इंदीबर देउरी, अखिल गोर्गो जैसे हजारों सामाजिक कार्यकर्ता भी इसके विरेध में सड़कों पर हैं, लेकिन राज्य सरकार अपने कदम पीदे खींचने को राजी नहीं है ।

    यह एक विडंबना है कि बांग्लादेश को छूती हमारी 170 किलोमीटर की जमीनी और 92 किमी की जल-सीमा लगभग खुली पड़ी है। इसी का फायदा उठा कर बांग्लादेश के लोग बेखौफ यहां आ रहे हैं, बस रहे हैं और अपराध भी कर रहे हैं। हमारा कानून इतना लचर है कि अदालत किसी व्यक्ति को गैरकानूनी बांग्लादेशी घोशित कर देती है, लेकिन बांग्लादेश की सरकार यह कह कर उसे वापिस लेने से इंकार कर देती है कि भारत के साथ उसका इस तरह का कोई द्विपक्षीय समझौता नहीं हैं। असम में बाहरी घुसपैठ एक सदी से पुरानी समस्या है।  सन 1901 से 1941 के बीच भारत(संयुक्त) की आबादी में बृद्धि की दर जहां 33.67 प्रतिशत थी, वहीं असम में यह दर 103.51 फीसदी दर्ज की गई थी। सन 1921 में विदेशी सेना द्वारा गोलपाड़ा पर कब्जा करने के बाद ही असम के कामरूप, दरांग, सिबसागर जिलो में म्यांमार व अन्य देशों से लोगों की भीड़ आना षुरू हो गया था। सन 1931 की जनगणना में साफ लिखा था कि आगामी 30 सालों में असम में केवल सिवसागर ऐसा जिला होगा, जहां असम मूल के लोगों की बहुसंख्यक आबादी होगी।

    असम में विदेशियों के शरणार्थी बन कर आने को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है – 1971 की लड़ाई या बांग्लादेश बनने से पहले और उसके बाद। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि सन 1951 से 1971 के बीच 37 लाख सत्तावन हजार बांग्लादेशी , जिनमें अधिकांश मुसलमान हैं, अवैध रूप से अंसम में घुसे व यहीं बस गए। सन 70 के आसपास अवैध षरणार्थियों को भगाने के कुछ कदम उठाए गए तो राज्य के 33 मुस्लिम विधायाकें ने देवकांत बरूआ की अगवाई में मुख्यमंत्री विमल प्रसाद चालिहा के खिलाफ ही आवाज उठा दी। उसके बाद कभी किसी भी सरकार ने इतने बड़े वोट-बैंक पर टिप्पणी करने की हिम्मत नहीं जुटाई। शुरू में कहा गया कि असम में ऐसी जमीन बहुत सी है, जिस पर ख्ेाती नहीं होती है और ये घुसपैठिये इस पर हल चला कर हमारे ही देश का भला कर रहे हैं। लेकिन आज हालात इतने बदतर है कि कांजीरंगा नेशनल पार्क को छूती कई सौ किलोमीटर के नेशनल हाईवे पर दोनों ओर केवल झुग्गियां दिखती हैं, जिनमें ये बिन बुलाए मेहमान डेरा डाले हुए हैं। इनके कारण राज्य में संसाधनों का टोटा तो पड़ ही रहा है, वहां की पारंपरिक संस्कृति, संगीत, लोकचार, सभी कुछ प्रभावित हो रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि कोई आठ साल पहले राज्य के राज्यपाल व पूर्व सैन्य अधिकारी रहे ले.ज. एस.के. सिन्हा ने राश्ट्रपति को भेजी एक रिपोर्ट में साफ लिखा था कि राज्य में बांग्लादेशियों की इतनी बड़ी संख्या बसी है कि उसे तलाशना व फिर वापिस भेजने के लायक हमारे पास मशीनरी नहीं है।

    एनआरसी के पहले मसौदे के करण लेागों में बैचेनी की बानगी केवल एक जिले नगांव के आंकड़ों से भांपी जा सकती है। यहां कुल 20,64,124 लेागों ने खुद को भारत का नागरिक बताने वाले दस्तावेज जमा किए थे। इसमें से पहली सूची में केवल 9,11,604 लेागों के नाम शामिल हैं। यानि कुल आवेदन के 55.84 प्रतिशत लोगों की नागरिकता फिलहाल संदिग्ध है। राज्य में केवल 1.9 करोड़ लेाग ही इस सूची में हैं जबकि नागरिकता का दावा करने वाले 1.39 करोड़ लेागों के नाम इसमें नदारत हैं। ऐसे ही हालत कई जिलों के हैं। इनमें कई सौ लेाग तो वे हैं जो सेना या पुलिस में तीस साल नौकरी कर रिटायर हुए, लेकिन उन्हें  इस सूची में नागरिकता के काबिल नहीं माना गया। भले ही राज्य सरकार संयम रखने व अगली सूची में नाम होने का वास्ता दे रही हो, लेकिन राज्य में बेहद तनाव, अनिश्तिता का माहौल है। ऐसे में कुछ लेाग अफवाहे फैला कर भी माहौल खराब कर रहे हैं।

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