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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    नथ पहनने से पड़ा नाम नाथूराम गोडसे

    By November 15, 2018 Hot issue 1 Comment4 Mins Read
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    भारत की आज़ादी के बाद पहली फांसी और पहले आतंकी नाथूराम गोडसे को नाथू राम गोडसे को सजा सुनाने के बाद अंबाला के सेंट्रल जेल में रखा गया था। वैसे नाथूराम का असली नाम रामचंद्र गोडसे था। गोडसे का नाम नाथूराम पड़ने के पीछे भी एक कहनी है कि नाथूराम को बचपन में उनके माता पिता ने किसी अंधविश्वास के चलते नथ पहना दी थी जिसके बाद से ही उनका नाम नाथूराम पड़ गया।
    यह तो सभी जानते हैं कि मुकदमा लाल किले में बनी विशेष अदालत में चला था । हाईवे के किनारे बनी अम्बाला सेंट्रल जेल ठीक वैसी ही थी, जैसे अंडमान निकोबार की जेल। कई जाने-माने स्वतंत्रता सेनानियों को इस जेल में रखा गया था। इसी जेल में 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को फांसी दी गई थी। एक अन्य षडयंत्रकारी नारायण आप्टे को भी उसके साथ ही फांसी दी गई। हालांकि उस वक्‍त के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गांधीजी के दो बेटों ने उसकी फांसी की सज़ा रद्द करने की अपील की थी।
     नाथूराम गोडसे का शव सरकार ने परिजनों को नहीं दिया था। जेल के अधिकारियों ने घग्घर नदी के किनारे उसका अंतिम संस्कार कर दिया था। जब शव को जेल के एक वाहन में रखकर घग्घर नदी ले जाया जा रहा था, तो उस वाहन के पीछे-पीछे चुपके से हिन्दू महासभा का एक कार्यकर्ता भी चला गया और चिता के ठंडी होने पर उसने एक डिब्बे में अस्थियां रख ली थीं। गोडसे की अस्थियां आज भी परिजनों के पास सुरक्षित रखी हैं।
    गोडसे ने गांधी जी की ह्त्या के पहले ही एक बीमा करवाया था ताकि उसके परिवार को पैसा मिल सके लेकिन बीमा कम्पनी ने क्लेम को अस्वीकार कर कोई भुगतान नहीं किया था, अपनी वसीयत में गोडसे ने अपने बीमा के पैसों को भाई दत्तात्रेय गोडसे, उनकी पत्नी और उनके दूसरे भाई की पत्नी को देने को कहा था।
    पुणे के जिस इमारत में गोडसे की अस्थियां रखी हैं वहां एक रियल एस्टेट, वकालत और बीमा क्षेत्र से जुड़े ऑफिस है।
    शीशे के एक केस में गोडसे के कुछ कपड़े और हाथ से लिखे नोट्स भी संभालकर रखे गए हैं।
    गोडसे से जुड़ी यह निशानियां शिवाजी नगर इलाके में बने जिस कमरे में रखी हैं वह अजिंक्य डेवलपर्स का दफ्तर है।
    इसके मालिक और नाथूराम गोडसे के भाई गोपाल गोडसे के पोते अजिंक्य गोडसे ने बताया कि, “इन अस्थियों का विसर्जन सिंधु नदी में ही होगा और तभी होगा जब उनका अखंड भारत का सपना पूरा हो जाएगा।”
    “मेरे दादाजी की अंतिम इच्छा यही थी, इसमें कई पीढ़ियां लग सकती है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि वह एक दिन जरुर पूरी होगी।
    उधर महात्मा गाँधी के पुत्र देवदास ने नथूराम को एक पत्र लिखा था, ‘आपने मेरे पिता की नाशवान देह का ही अंत किया है और कुछ नहीं. इसका ज्ञान आपको एक दिन होगा क्योंकि मुझ पर ही नहीं संपूर्ण संसार के लाखों लोगों के दिलों में उनके विचार अभी तक विद्यमान हैं और हमेशा रहेंगे।'”
    गांधीजी की हत्‍या के बाद संघ परिवार बार-बार गोडसे से अपने को सीधे-सीधे जोड़ने से बचता रहा है. यही नहीं उसके साथ किसी भी तरह के रिश्‍ते से नकारता रहा है।
    आरएसएस के साथ नाथूराम का रिश्‍ता था या नहीं, यह उसके भाई गोपाल गोडसे से बेहतर कौन बता सकता है. गोपाल गोडसे गांधीजी की हत्‍या का सह-अभियुक्‍त था, एक इंटरव्‍यू के दौरान फ्रंटलाइन पत्रिका ने गोपाल गोडसे से इस बारे में कुछ सवाल किए थे। गोपाल गोडसे का जवाब कुछ यों था, ‘हम सभी भाई आरएसएस में थे। नाथूराम, दत्‍तात्रेय, मैं और गोविंद। आप कह सकते हैं कि हम अपने घर में बड़े होने की बजाय आरएसएस में पले-बढ़े थे. यह हमारे लिए परिवार जैसा था। नाथूराम आरएसएस में बौद्धिक कार्यवाह बन गया था। उसने अपने बयान में यह कहा था कि उसने आरएसएस छोड़ दी थी। उसने ऐसा इसलिए कहा क्‍योंकि गांधी की हत्‍या के बाद गोलवलकर और आरएसएस काफी मुसीबत में पड़ गए थे, लेकिन उसने आरएसएस नहीं छोड़ी थी।1944 में नाथूराम ने हिन्‍दू महासभा का काम करना शुरू किया था। उस वक्‍त वह आरएसएस में बौद्धिक कार्यवाह हुआ करता था।
    – पंकज चतुर्वेदी की वॉल से

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    1 Comment

    1. tlover tonet on December 17, 2023 4:34 am

      Hello are using WordPress for your blog platform? I’m new to the blog world but I’m trying to get started and set up my own. Do you need any coding knowledge to make your own blog? Any help would be really appreciated!

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