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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    क्यों ना छट को पर्यावरण पर्व के रूप में मनाएं

    By November 16, 2018 Current Issues No Comments9 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    दीपावली के ठीक बाद में बिहार व पूर्वी राज्यों में मनाया जाने वाला छठ पर्व अब प्रवासी बिहारियों के साथ-साथ सारे देष में फैल गया है। गोवा से लेकर मुंबई और भोपाल से ले कर बंगलूरू तक, जहां भी पूर्वांचल के लोग बसे हैं, कठिन तप के पर्व छठ को हरसंभव उपलब्ध जल-निधि के तट पर मनाना नहीं भूलते है। वास्तविकता यह भी है कि छट को भले ही प्रकृति पूजा और पर्यावरण का पर्व बताया जा रहा हो, लेकिन इसकी हकीकत से दो चार होना तब पड़ता है जब उगते सूर्य को अर्ध्य दे कर पर्व का समापन होता है और श्रद्धालु घर लौट जाते हैं। पटना की गंगा हो या दिल्ली की यमुना या भोपाल का षाहपुरा तालाब या दूरस्थ अंचल की कोई भी जल-निधि, सभी जगह एक जैसा दृष्य होता है- पूरे तट पर गंदगी, बिखरी पॉलीथीन, उपेक्षित-गंदला रह जाता है वह तट जिसका एक किनारा पाने के लिए अभी कुछ देर पहले तक मारा-मार मची थी।

    देष के सबसे आधुनिक नगर का दावा करने वाले दिल्ली से सटे ग्रेटर नोएडा की तरफ सरपट दौड़ती चौड़ी सडक के किनारे बसे कुलेसरा व लखरावनी गांव पूरी तरह हिंडन नदी के तट पर हैं। हिंडन यमूुना की सहायक नदी है लेकिन अपने उद्गम के तत्काल बाद ही सहारनपुर जिले से इसका जल जहरीला होना जो षुरू होता है तो अपने यमुना में मिलन स्थल, ग्रेटर नोएडा तक हर कदम पर दूशित होता जाता है। ऐसी ही मटमैली हिंडन के किनारे बसे इन दो गांवों की आबादी दो लाख पहुंच गई है। अधिकांश वाषिंदे सुदूर इलाकों से आए मेहनत-मजदूरी करने वाले हैं। उनको हिंडन घाट की याद केवल दीपावली के बाद छट पूजा के समय आती है। वैसे तो घाट  के आसपास का इलाका एक तरह से सार्वजनिक षौचालय बना रहता है, लेकिन दीपावली के बाद अचानक ही गांव वाले घाटों की सफाई, रंगाई-पुताई करने लगते हैं।

    राजनीतिक वजन लगाया जाता है तो इस नाबदान बनी नदी का गंदा बहाव रोक कर इसमें गंगा जल भर दिया जाता है। छठ के छत्तीस घंटे बड़ी रौनक होती है यहां और उसके बाद षेश 361 दिन वहीं गंदगी, बीड़ी-षराब पीने वालों का जमावड़ा । पर्व समाप्ति के अगले ही दिन उसी घाट पर लोग षौच जाते हैं जहां अभी भी प्रसाद के अंष पड़े होते हैं। जिस नदी में भक्त खड़े थे, वह देखते ही देखते काला-बदबूदार नाला बन जाती है, पूरे गांव का गंदा पानी का निस्तार भी इसी में होता है।

    फोटो साभार: आशुतोष त्रिपाठी

    छट पर्व लोक आस्था का प्रमुख सोपान है- प्रकृति ने अन्न दिया, जल दिया, दिवाकर का ताप दिया, सभी को धन्यवाद और ‘तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा’ का भाव। असल में यह दो ऋतुओं के संक्रमण-काल में षरीर को पित्त-कफ और वात की व्याधियों से निरापद रखने के लिए गढ़ा गया अवसर था। कार्तिक मास के प्रवेश के साथ छठ की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। भोजन में प्याज-लहसुन का प्रयोग पूरी तरह बंद हो जाता है। छठ के दौरान छह दिनों तक दिनचर्या पूरी तरह बदल जाती है। दीवाली के सुबह से ही छठ व्रतियों के घर में खान-पान में बहुत सारी चीजें वर्जित हो जाती है, यहां तक कि सेंधा नमक का प्रयोग होने लगता है।

    सनातन धर्म में छट एक ऐसा पर्व है जिसमें किसी मूर्ति-प्रतिमा या मंदिर की नहीं, बल्कि प्रकृति यानि सूर्य, धरती और जल की पूजा होती है।  धरती पर जीवन के लिए, पृथ्वीवासियों के स्वास्थ्य की कामना और भास्कर के प्रताप से धरतीवासियों की समृद्धि के लिए भक्तगण सूर्य के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं। बदलते मौसम में जल्दी सुबह उठना और सूर्य की पहली किरण को जलाषय से टकरा कर अपने षरीर पर लेना, वास्तव में एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है। वृत करने वाली महिलाओं के भेाजन में कैल्ष्यिम की प्रचुर मात्रा होती है, जोकि महिलाओं की हड्डियों की सुदृढता के लिए अनिवाय भी है। वहीं सूर्य की किरणों से महिलओं को साल भर के लिए जरूरी विटामिन डी मिल जाता है। यह विटामिन डी कैल्ष्यिम को पचाने में भी मदद करता है। तप-वृत से रक्तचाप नियंत्रित होता है और सतत ध्यान से नकारात्मक विचार मन-मस्तिश्क से दूर रहते हैं।

    वास्तव में यह बरसात के बाद नदी-तालाब व अन्य जल निधियों के तटों ंपर बह कर आए कूड़े को साफ करने, अपने प्रयोग में आने वाले पानी को इतना स्वच्छ करने कि घर की महिलाएं भी उसमें घंटों खड़ी हो सके, दीपावली पर मनमाफिक खाने के बाद पेट को नैसर्गिक उत्पादों से पोशित करने और विटामिन के स्त्रोत सूर्य के समक्ष खड़े होने का वैज्ञानिक पर्व है।  पर्व में इस्तेमाल प्रत्येक वस्तु पर्यावरण को पपित्र रखने का उपक्रम होती है- बांस का बना सूप, दौरा, टोकरी, मउनी व सूपती तथा मिट्टी से बना दीप, चौमुख व पंचमुखी दीया, हाथी और कंद-मूल व फल जैसे ईख, सेव, केला, संतरा, नींबू, नारियल, अदरक, हल्दी, सूथनी, पानी फल सिंघाड़ा, चना, चावल (अक्षत), ठेकुआ, खाजा इत्यादि।

    इसकी जगह ले ली- आधुनिक और कहीं-कहीं अपसंसकृति वाले गीतों ने, आतिषबाजी,घाटों की दिखावटी सफाई, नेातागिरी, गंदगी, प्लास्टिक-पॉलीथीन जैसी प्रकृति-हंता वस्तुओं और बाजारवाद ने। अस्थाई जल-कुंड या सोसायटी के स्वीमिग पुल में छट पूजा की औपचारिकता पूरा करना असल में इस पर्व का मर्म नहीं है। लोग नैसर्गिक जल-संसाधनों तक जाएं, वहां घाट व तटों की सफाई करें और फिर पूजा करें , इसके बनिस्पत अपने घर के पास एक गड्ढे में पानी भर कर पूजा के बाद उसके गंदा, बदबूदार छोड़ देना तो इसकी आत्मा को मारना ही है। यही नहीं जिस जल में वृत करने वाली महिलाएं खड़ी रहती हैं, वह भी इतना दूशित होता है कि उनके पैरों और यहां तक कि गुप्तांगों में संक्रमण की संभावना बनी रहती है।

    गंदी-जहरीली पोलीथीन में खाद्य  सामग्री ले जाने से उसकी पवित्रता प्रभावित होती है। यही नहीं जो काल षांत तप-आत्ममंथन और ध्यान का होता है, उसमें भौंडे गीत और फिल्मी पैरोडी पर भजनों का सांस्कृतिक व ध्वनि प्रदूशण अलग से होता है। जबकि पारंपरिक रूप से ढोलक या मंजीरा बजा कर गीत गाने से महिलाओं के संपूर्ण षरीर का व्यायाम , अपने पारंपरिक गीतों या मौखिक ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का उपक्रम होता था। उसका स्थान बाजार ने ले लिया । पर्व समाप्त होते ही चारों तरफ फैली पूजा सामग्री में मुंह मारते मवेषी और उसमें से कुछ अपने लिए कीमती तलाषते गरीब बच्चे, आस्था की औपचारिकता को उजागर करते हैं।

    काष, छठ पर्व की वैज्ञानिकता, मूल-मंत्र और आस्था के पीछे तर्क को भलीभांति समाज तक प्रचारित-प्रसारित किया जाए। जल-निधियों की पवित्रता, सव्च्छता के संदेष को आस्था के साथ व्याहवारिक पक्षों के साथ लोक-रंग में पिरोया जाए, लोक को अपनी जड़ो की ओर लौटने को प्रेरित किया जाए तो यह पर्व अपने आधुनिक रंग में धरती का जीवन कुछ और साल बढ़ाने का कारगर उपाय हो सकता है। हर साल छट पर्व पर यदि देष भर में हजार तालाब खोदने और उन्हें संरक्षित करने का संकल्प  हो, दस हजार पुराने तालाबों में गंदगी जाने से रोकने का उपक्रम हो , नदियों के घाट पर साबुन, प्लास्टिक  और अन्य गंदगी ना ले जाने की षपथ हो तो छट के असली प्रताप और प्रभाव को देखा जा सकेगा।

    यदि छट के तीन दिनों को जल-संरक्षण दिवस, स्वच्छता दिवस जैसे नए रंग के साथ प्रस्तुत किया जाए और आस्था के नाम पर एकत्र हुई विषाल भीड़ को भौंडे गीतों के बनिस्पत इन्हीं सदेषों से जुड़े सांस्कृतिक अरयोजनों से षिशित किया जाए, छट के संकल्प को साल में दो या तीन बार उन्ही जल-घाटों पर आ कर दुहराने का प्रकल्प किया जाए तो वास्तव में सूर्य का ताप, जल की पवित्रता और खेतों से आई नई फसल की पौश्टिकता समाज को निरापद कर सकेगी।

    यदि परंपरा और पद्धति को बारिकी से देखें तो छठ पर्व पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाने का सामुदायिक पर्व है। पूरी तरह से पर्यावरण मित्र लोकपर्व है। तमाम प्रसाद- चाहे ठेकुआ हो या कसार, घर में बनाया जाता है। यह आटा और चावल के आटे का बनता है और घी का इस्तेमाल होता है। ये सामान बाजार से नहीं खरीदा जाता। इसके अलावा, तमाम तरह की सब्जी और फलों का प्रसाद होता है। नींबू, हल्दी और अदरक का पौधा, अरबी, शरीफा, आरता का पत्ता, लौंग, इलायची, छुहारा और नारियल का इस्तेमाल होता है। साठी के चावल का भी इस्तेमाल होता है। साठी का चावल तैयार करने में 60 दिन का वक्त लगता है। लोग खुद ही यह चावल उगाते हैं या फिर गांव से मंगवाते हैं। ये तमाम चीजें दउरा (बांस से तैयार बड़ी टोकरी) में रखकर लोग खुद घाट पर ले जाते हैं। घाट पर पूजा के बाद अपने दउरा का एक भी सामान वहां नहीं छोड़ा जाता, क्योंकि यह अत्यंत पवित्र होता है। हर सामान घर लाया जाता है। छठ के लिए पूजा करने वाले लोग नदियों और घाटों की सफाई करते हैं। इस तरह साल में एक बार खुद ब खुद नदी और तालाब की सफाई हो जाती है। इस तरह प्रकृति की पूजा के इस पर्व में सफाई का विशेष ध्यान होता है।

    छठ पूजा के दौरान जो भी प्रसाद होता है उससे सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और फिर सबकुछ लेकर व्रत करने वाले वापस आ जाते हैं। सामान अगर नदीं में छूटता है तो वह फूल-पत्ती होती है, जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाती। इस तरह देखा जाए तो प्रकृति की पूजा का ये महापर्व पूरी तरह से प्रकृति-पूजा है।

    छठ पूजा के अनुष्ठान के दौरान गाए जाने वाले- ‘केरवा जे फरले घवध से ओह पर सुग्गा मंडराय, सुगवा जे मरवो धनुष से सुगा जइहे मुरझाए। सुगनी जे रोवेली वियोग से आदित होख ना सहाय.., जैसे गीत इस बात को दर्शाता हैं कि लोग पशु पक्षियों के संरक्षण की याचना कर उनके अस्तित्व को कायम रखना चाहते हैं। इसी तरह इस अनुष्ठान के क्रम में कोसी भरने के समय मिट्टी के वर्तन पर हाथी की आकृति बनाने की परंपरा भी जैव संरक्षण की प्रेरणा प्रदान करता है।

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