एक महर्षि ने ऐसे किया अद्भुत तर्क शास्त्र का निर्माण!

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एक समय की बात है महर्षि उतथ्य अपने आश्रम में वेदमंत्रों का उच्चारण करते हुए सामने स्थित हवनकुंड में घी की आहुति रहे थे कि एक हिरन भागता हुआ वहां आया और उनकी कुटिया में जा घुसा। थोड़ी ही देर में छुपे हुए हिरन को खोजते हुए एक शेर भी वहां आया और उसने महर्षि से पूछा, ‘गुरुदेव, क्या आपने मेरे शिकार को यहां से जाते हुए देखा है?’ महर्षि उतथ्य बड़े ही असमंजस में पड़ गए। वे सत्यवादी थे तथा उन्होंने अपने जीवन में किसी से असत्य वचन कभी न कहे थे। लेकिन आज की घटना के पश्चात उनके सामने एक विकट समस्या उपस्थित हो गई।

असत्य बोलना उनकी दृष्टि में महान अपराध था और सत्य बोलने से शरण में आए एक निर्दोष प्राणी को जानबूझकर उसके भक्षक को सौंपने से उनके द्वारा महापातकी कर्म होने वाला था। उनकी समझ में ही न आ रहा था कि उसे क्या जवाब दें। उस शेर ने पुन: प्रश्न किया, ‘गुरुवर, वह हिरन किस दिशा की ओर गया है, आप मुझे यह दिखा दें तो मैं आपके प्रति कृतज्ञ रहूंगा।’

महर्षि ने कहा, ‘हे वनराज, मैं तुझे कैसे और किस तरह दिखाऊं क्योंकि देखने का कार्य आंखें करती हैं, जबकि बोलने का कार्य मुख द्वारा होता है। आंखें बोल नहीं सकतीं और मुख देख नहीं सकता। तू बोलने वाली इंद्रिय से प्रश्न कर रहा है कि क्या उसने तेरा शिकार देखा है? जो देख नहीं सकता, वह इसका क्या जवाब दे सकता है। इसी तरह जिसने देखा है वह भला बोल कैसे सकता है। ऐसी परिस्थिति में मैं तेरे प्रश्न का जवाब देने में असमर्थ हूं।’

उस शेर को शिकार का सही-सही ठौर ठिकाना न मालूम होने से वह तो लौट गया, किंतु महर्षि के मुख से निकले शब्दों से एक नए शास्त्र का प्रादुर्भाव हुआ, जिसका नाम है तर्क शास्त्र। आज भी मानवता की भलाई के लिए दुनिया भर में लोग इसी शास्त्र से आगे का रास्ता तलाश करते हैं।

संकलन: सुभाष शर्मा

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