नफरत की राजनीति से ऊपर उठना होगा

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नफरत की राजनीति को नकार दिया जनता ने

पहले राजनीति वास्तव में जन सेवा का माध्यम होती थी लेकिन इसे जबसे स्वार्थसिद्धि का जरिया बनाया गया, तबसे इसका स्तर धीरे-धीरे गिरता ही गया। अब आम जनता को फटाफट प्रभावित करके उसका समर्थन प्राप्त करना मुख्य उद्देश्य होता जा रहा है जिसके लिये सबसे कामयाब फार्मूला उसे भावनात्मक रूप से उत्तेजित करके मुद्दों से ध्यान भटकाकर अपनी ओर आकर्षित करना हो गया है। इसीलिये लंबे समय से राजनेताओं के मुख से अनाप-शनाप व बेसिरपैर की बातें सुनाई देना आम बात हो गई है। इसके लिये किसी भी तरह का लिहाज बरतने की भी जरूरत नहीं समझी जाती। यही कारण है कि देश के सर्वोच्च सदन यानी संसद में उत्तेजनात्मक बातों का किया जाना आम बात होती जा रही है।

बीते सोमवार को इसे लेकर संसद में जबर्दस्त हंगामा भी हुआ। अव्यावहारिक, अतार्किक, अवांछित बातों से छोटे-बड़े समूह का समर्थन तो प्राप्त हो सकता है पर वह अल्पकालिक ही होता है। विडम्बना यह है कि जितने बेतुके बोल होते हैं, उतने ही बेतुके उनको सही बताने वाले बयान भी होते हैं। पहले जब इस तरह की बातें होती थीं तो वक्ता नेता यह कहकर पल्ला झाड़ लेता था कि मीडिया ने उसकी बातों को तोड़-मरोड़कर पेश किया है। अब यह तो कहा ही जाता है, साथ में अपने मूल बयान को सही बताने की कोशिश भी की जाती है।

ये बातें अक्सर चुनावों के समय खासतौर पर सुनाई देती हैं और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में विधानसभा चुनावों का दौर चलने के कारण इस समय एक बार फिर इस तरह के बयान मीडिया में आएं, संसद में सुनाई दिए हैं, मीडिया में आग ऊगली जा रही है। मकसद केवल एक है कि किसी तरह से अपने पक्ष में वोट डालने के लिये मतदाता को प्रभावित किया जा सके।

ऐसी कोशिश करने वाले तथाकथित नेतागण ये सोचना ही नहीं चाहते कि उनकी इस कारस्तानी का असर समाज पर क्या पड़ेगा, सौहार्द पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा, कानून-व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। हालांकि सच ये है कि अगर इस तरफ सोच होती तो वे उल्टी बात या बिगड़े बोल अपने मुखारविन्द से निकालते ही क्यों। अचरज तब होता है जब ऐसा करने वालों के वरिष्ठ नेतागण मौन साधे रहते हैं।

बात बहुत ज्यादा बढ़ जाने पर ही वे हल्का सा कोई बयान देने को तैयार होते हैं लेकिन वह भी आलोचना कतई नहीं होता। यह राजनीति में गिरावट की स्थिति है जो समाज में गलत संदेश देती है जिसका प्रभाव भी निश्चित रूप से गलत ही पड़ना है। जरूरत यह है कि बिगड़े बोल बोलने की इस प्रतियोगिता को खत्म किया जाय तथा मुद्दे पर आधारित बातें की जायें जिससे राजनीति को सार्थक रूप दिया जा सके।

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