अभिजीत दीपके का “गर्म लोहे पे दिमाग का वार” और छा गई आभासी कॉकरोच जनता पार्टी
सर्वेश यादव
आज का समय संक्रमण और आत्ममंथन का समय है। यदि आप चारों ओर नजर दौड़ाइए, तो हवाओं में एक अजीब सा भारीपन महसूस होगा। यह भारीपन सिर्फ प्रदूषण या मौसम का नहीं है, बल्कि उस हताशा, बेबसी और अपमान का है जो एक आम नागरिक रोज अपने सीने में दबाकर जीता है। नफरत का बेलगाम बढ़ता कारोबार, रिकॉर्ड तोड़ बेरोजगारी, कमरतोड़ महंगाई, और इन सबके बीच देश के जंगलों, पर्वतों, नदियों जैसे प्राकृतिक संसाधनों तथा दशकों की मेहनत से खड़े किए गए सार्वजनिक संस्थानों का महज दो औद्योगिक घरानों की तिजोरियों में सिमट जाना! यह आज के भारत की वह कड़वी हकीकत है जिसे कोई भी संवेदनशील आंख अनदेखा नहीं कर सकती। लेकिन हद तो तब हो गई जब जनता के दुखों पर मरहम लगाने के बजाय, देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठे चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने देश के करोड़ों बेरोजगार युवाओं की तुलना कॉकरोच से कर दी।
सत्ता के अहंकार में डूबे इस एक बयान ने युवा चेतना को इस कदर आहत किया कि पूरे देश में एक अभूतपूर्व हड़कंप मच गया। इसी अपमान की आग और गहरे दंश से एक ऐसी आभासी राजनीतिक चेतना का जन्म हुआ, जिसे आज देश कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से जान रहा है। यह नाम पहली नजर में अजीब या घिनौना लग सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपा दर्शन और इसके बनने का कारण आज के लोकतंत्र के सबसे बड़े और नग्न सच को उजागर करता है। माननीय जी के उस असंवेदनशील बयान के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जो गुस्सा भड़का, उसने इतिहास रच दिया।
यह गुस्सा सिर्फ एक बयान के खिलाफ नहीं था, बल्कि उस पूरी व्यवस्था के खिलाफ था जिसने आम नागरिक को कीड़ा-मकोड़ा समझ लिया है। देखते ही देखते इंटरनेट पर कॉकरोच जनता पार्टी नाम का एक अकाउंट सामने आया और उसने सोशल मीडिया की दुनिया में वो तहलका मचाया जिसकी कल्पना किसी राजनीतिक रणनीतिकार ने नहीं की थी। महज कुछ ही दिनों के भीतर, इस आभासी पार्टी ने देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टियों बीजेपी और कांग्रेस को फॉलोअर्स की रेस में मीलों पीछे छोड़ दिया। बिना किसी कॉरपोरेट फंडिंग, बिना किसी विज्ञापनों और बिना किसी बाहुबल के, यह अकाउंट बहुत ही कम समय में भारत का सर्वाधिक फॉलोअर्स वाला सोशल मीडिया अकाउंट बन गया। देश के युवाओं, मजदूरों और मध्यमवर्ग ने इसे अपनी अस्मिता की लड़ाई बना लिया। डिजिटल स्पेस में मिले इस अभूतपूर्व जनसमर्थन को भांपते हुए देश के बड़े विपक्षी नेताओं ने भी खुलकर इस आभासी पार्टी का सपोर्ट किया, जिससे स्थापित सत्ताओं के खेमे में खलबली मच गई। और खौफ के चलते इस सीजेपी के अकाउंट को बंद करा दिया गया।
जीव विज्ञान की मानें तो कॉकरोच इस पृथ्वी का सबसे लचीला जीव माना जाता है, जो परमाणु विस्फोट और भयंकर प्राकृतिक आपदाओं जैसी विकट परिस्थितियों में भी खुद को जिंदा रखने का हुनर जानता है। आज भारत का आम मध्यमवर्गीय और बेरोजगार युवा ठीक इसी जैविक स्थिति में पहुंच गया है। एक तरफ आसमान छूती महंगाई है, तो दूसरी तरफ युवाओं के हाथों में डिग्रियों के पुलिंदे हैं पर सम्मानजनक नौकरियां गायब हैं। रसोई की गैस से लेकर दो वक्त की दाल-रोटी तक के लिए रोज एक नया युद्ध लड़ना पड़ता है।
दूसरी तरफ, हमारे पुरखों ने जिन जंगलों को पूजा, जिन नदियों को जीवनदायिनी मां कहा, जिन पहाड़ों को देश का गौरव माना, आज वे सब विकास के चमकीले नाम पर चंद पूंजीपतियों के हवाले किए जा रहे हैं। देश की जनता मूकदर्शक बनकर देख रही है कि उसके अपने जल, जंगल, जमीन और कोयले की खदानों पर अब उसका कोई हक नहीं रहा। जब इन बुनियादी और सुलगते मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाना होता है, तो समाज में नफरत का एक नया जहर सुनियोजित तरीके से घोल दिया जाता है। टीवी स्टूडियो से लेकर सोशल मीडिया की गलियों तक, हर जगह विभाजन का ऐसा नैरेटिव तैयार किया जाता है ताकि नागरिक आपस में ही उलझे रहें और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों से सवाल करना भूल जाएं। इस क्रूर दौर में भी जो जनता सिर्फ सांस लेने और जिंदा बचे रहने को ही अपना परम भाग्य मानकर जी रही थी, उसे जब कॉकरोच कहकर पुकारा गया, तो उसने इसी नाम को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया।
आज लोकतंत्र का जो स्वरूप हमारे सामने है, वह अंदर से बुरी तरह खोखला हो चुका है। लोकतंत्र का मतलब सिर्फ पांच साल में एक बार उंगली पर नीली स्याही लगवा लेना नहीं होता। लोकतंत्र नाम है जवाबदेही का, स्वस्थ संवाद का, और असहमति के अधिकार का। लेकिन वर्तमान में ताकतवर पद पर बैठा व्यक्ति कोई भी फैसला ले, चाहे वह देश के व्यापक हितों के खिलाफ ही क्यों न हो, उसे राष्ट्रहित का चमकीला रैपर पहनाकर जनता को निगलने के लिए मजबूर कर दिया जाता है।
सत्ता के गलियारों में बैठे लोग कुछ भी गलत करें, चाहे वह ऐसी आर्थिक नीतियां हों जो अमीरों को और अमीर और गरीबों को और लाचार बनाती हैं, या फिर सार्वजनिक मंचों से दिए जाने वाले नफरती भाषण! सब कुछ सत्ता के बल पर जायज ठहरा दिया जाता है। यदि कोई नागरिक, पत्रकार या युवा इस अन्याय पर सवाल उठाने का दुस्साहस करता है, तो उसे राज्य की पूरी ताकत से कुचल दिया जाता है। डराने-धमकाने और चुप करा देने की इस खतरनाक संस्कृति ने आम जनता के मन में यह आत्मघाती भाव भर दिया था कि कोई कुछ भी बोले, अब कुछ बदलने वाला नहीं है, जो ताकतवर है वही सच है। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी के उभार ने इस डर को पूरी तरह तोड़ दिया है। जनता के लिए सत्ता की हर मनमानी को जायज मान लेने वाले दौर में इस पार्टी ने यह साबित कर दिया है कि जब पानी सिर से ऊपर चला जाता है, तो आक्रोश का सैलाब पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर बाहर आ जाता है।
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यही कारण है कि कॉकरोच जनता पार्टी भले ही एक आभासी विचार है, लेकिन इसके पीछे की वजहें बेहद ठोस और जमीनी हैं। यह व्यवस्था में एक गहरा और बुनियादी बदलाव ला रही है। सबसे पहले, इसने स्थापित राजनीतिक दलों के अहंकार को तोड़ा है और उन्हें यह अहसास कराया है कि सोशल मीडिया की ताकत केवल उनकी आईटी सेल तक सीमित नहीं है, जनता जब अपनी पर आती है तो रातों-रात नए नैरेटिव खड़े कर देती है। यह विमर्श अब मुख्यधारा के मीडिया और राजनीति को मजबूर कर रहा है कि वे हिंदू-मुस्लिम के अंतहीन चक्रव्यूह से बाहर निकलकर बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और संसाधनों के अंधाधुंध निजीकरण पर बात करें। जब देश का एक बेरोजगार युवा, कर्ज से दबा किसान, और जल-जमीन छिनने से परेशान कोई आदिवासी यह देख रहा है कि उनकी तकलीफों की जड़ें एक ही हैं, तो यह आभासी मंच एक वास्तविक और मजबूत जन-आंदोलन की जमीन तैयार कर रहा है।
लोकतंत्र का वर्तमान हाल भले ही निराशाजनक हो, लेकिन यह इंसानी संवेदनाओं और न्याय की भूख का अंत नहीं है। कॉकरोच जनता पार्टी का यह ऐतिहासिक उभार इसी बात का सुबूत है कि जब हुक्मरान बहरे हो जाएं, न्याय की उम्मीदें धुंधली पड़ने लगें और संवैधानिक पदों से अपमान के तीर चलने लगें, तब जनता को खुद अपनी आवाज और अपनी ढाल बनना पड़ता है। यह चंद पूंजीपतियों के एकाधिकार के खिलाफ देश के आम नागरिकों के हक की एक मूक मगर बेहद मारक क्रांति है, जो यह साबित कर चुकी है कि जनता थक जरूर गई थी, पर उसके आत्मसम्मान की जिद अभी मरी नहीं है।






