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    Home»ब्लॉग

    ‘जियो और जीने दो’ का सिद्धांत जैव विविधता के लिए वरदान

    ShagunBy ShagunMay 21, 2026 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    रत्नेश कुमार

    हम अकसर भूल जाते हैं कि इस पूरी कायनात में हमारी पृथ्वी कोई निर्जीव चट्टान नहीं, बल्कि एक जीती-जागती, सांस लेती हुई व्यवस्था है। सुबह की पहली किरण के साथ जब कोई कली चटकती है, ओस की बूंदें घास पर चमकती हैं, या कोई चिड़िया अपने बच्चों के लिए तिनका चुनती है, तो वह केवल एक दृश्य नहीं होता, वह जीवन का उत्सव होता है। इसी उत्सव को जब वैज्ञानिक अपनी भाषा में बांधते हैं, तो उसे जैव विविधता कहते हैं। यह जैव विविधता कुछ और नहीं, बल्कि ईश्वर या प्रकृति का वह सुंदर ताना-बाना है, जिसमें हर छोटा-बड़ा जीव एक-दूसरे का हाथ थामे खड़ा है। मिट्टी के भीतर अंधेरे में काम करने वाले केंचुए से लेकर आसमान को छूते बरगद के पेड़ तक, सब इस धरती की धड़कन को चालू रखने के लिए चौबीसों घंटे काम कर रहे हैं। लेकिन आज का इंसान इस सुंदर संगीत के बीच एक शोर की तरह दाखिल हुआ है। उसने अपनी सुख-सुविधाओं, बड़ी गाड़ियों, गगनचुंबी इमारतों और तात्कालिक मुनाफे के लिए उस व्यवस्था की जड़ें काटनी शुरू कर दी हैं, जिसने उसे गोद में लेकर बड़ा किया था।

    इंसान का स्वार्थ बहुत छोटा और बहुत संकीर्ण होता है। वह आज के फायदे को देखता है और कल की तबाही से आंखें मूंद लेता है। जब हम किसी घने जंगल को काटकर वहाँ एक बड़ी फैक्ट्री खड़ी करते हैं, तो हमें लगता है कि हमने तरक्की की एक नई इबारत लिख दी। लेकिन उस वक्त हम यह भूल जाते हैं कि हमने केवल पेड़ नहीं काटे, बल्कि हमने उस शुद्ध हवा का स्रोत बंद कर दिया जो हमारे बच्चों के फेफड़ों में जानी थी। हमने उन अनगिनत पक्षियों और छोटे जीवों का आशियाना उजाड़ दिया, जो चुपचाप इस पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने का काम करते थे। आज समंदरों में इंसानी लालच का प्लास्टिक इस कदर तैर रहा है कि व्हेल मछलियों से लेकर नन्हें कछुए तक उसे निगलकर तड़प-तड़प कर मर रहे हैं। नदियों को हमने गंदे नालों में बदल दिया है और फिर हम ताज्जुब करते हैं कि इंसानों में नई-नई बीमारियां कहाँ से आ रही हैं। प्रकृति का नियम सीधा और सरल है। आप जो देंगे, वही लौटकर आपके पास आएगा। जब हम प्रकृति को जहर देते हैं, तो वही जहर हवा, पानी और भोजन के रास्ते घूमकर हमारी थाली तक वापस पहुँच जाता है।

    अगर हम इसके नुकसानों को तथ्यों की कसौटी पर कसें, तो आज दुनिया के बड़े-बड़े वैज्ञानिक परेशान हैं। वे कह रहे हैं कि इंसान के इस रवैये के कारण पृथ्वी अपने इतिहास के सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। जीव-जंतुओं के लुप्त होने की रफ्तार इतनी ज्यादा बढ़ चुकी है कि आने वाले कुछ दशकों में हमारी अगली पीढ़ी बहुत से सुंदर जीवों को सिर्फ किताबों या कंप्यूटर स्क्रीन पर ही देख पाएगी। इस अंधाधुंध दोहन का नतीजा हमारे सामने मौसम के बदले हुए मिजाज के रूप में आ रहा है। कभी भीषण गर्मी पड़ती है तो कभी बेमौसम की बरसात किसानों की साल भर की मेहनत को पानी में बहा ले जाती है। ग्लेशियर पिघल रहे हैं, समंदर का जलस्तर बढ़ रहा है और जंगलों में ऐसी आग लग रही है जिसे बुझा पाना इंसानी तकनीक के बस से बाहर हो जाता है। सबसे डरावनी बात यह है कि जब हम जंगली जानवरों के घरों को नष्ट करते हैं, तो उनके भीतर रहने वाले वायरस इंसानी बस्तियों की तरफ रुख करते हैं, जिससे ऐसी महामारियां जन्म लेती हैं जो पूरी दुनिया को घरों में कैद होने पर मजबूर कर देती हैं।

    इसके विपरीत, यदि हम अपने छोटे स्वार्थों को छोड़कर प्रकृति के इस खजाने को संजोने का प्रयास करें, तो इसके फायदे इतने महान हैं कि उनकी गिनती रुपयों-पैसों में नहीं की जा सकती। प्रकृति हमें जो सेवाएं बिल्कुल मुफ्त में देती है, उसकी कीमत कोई भी सरकार नहीं चुका सकती। उदाहरण के लिए, हमारे खेतों में जो फसलें लहलहाती हैं, वे सिर्फ खाद और पानी से नहीं पकतीं। मधुमक्खियां, तितलियां और छोटे-छोटे कीट जब एक फूल से दूसरे फूल पर बैठते हैं, तो वे परागण करते हैं। अगर ये नन्हें जीव हड़ताल कर दें या हमारे कीटनाशकों के कारण मर जाएं, तो दुनिया का एक-तिहाई अनाज पैदा होना बंद हो जाएगा। इसी तरह, हमारी बहुत सी जीवनरक्षक दवाइयां इन्हीं जंगलों की जड़ी-बूटियों से बनती हैं। आयुर्वेद से लेकर आधुनिक विज्ञान तक, सब इसी वनस्पति जगत के ऋणी हैं। जब हम पर्यावरण को बचाते हैं, तो हम आने वाली नस्लों के लिए अस्पताल के बिल कम कर रहे होते हैं और उनके लिए एक स्वस्थ और लंबी उम्र का इंतजाम कर रहे होते हैं।

    प्रकृति को बचाने का मतलब यह कतई नहीं है कि हम विकास को रोक दें या आदिम युग में लौट जाएं। इसका सीधा सा मतलब यह है कि हमारा विकास ऐसा हो जो जीवन को नष्ट न करे, बल्कि उसे सहारा दे। हमें ‘सह-अस्तित्व’ के सिद्धांत को समझना होगा, यानी जियो और जीने दो। अगर चींटी को जीने का हक है, तो हाथी को भी है और इंसान को भी। हम इस धरती के मालिक नहीं हैं, सिर्फ एक हिस्सेदार हैं। जब हम इस सच को स्वीकार कर लेते हैं, तो हमारे भीतर प्रकृति के प्रति एक संवेदनशीलता, एक सम्मान का भाव जाग उठता है। तब हम पेड़ सिर्फ काटने के लिए नहीं देखते, बल्कि उसकी छाँव की कीमत समझते हैं।

    यह बात हमारे दिलो-दिमाग पर साफ होनी चाहिए कि प्रकृति को इंसान की जरूरत नहीं है, इंसान को प्रकृति की जरूरत है। अगर कल को मनुष्य इस धरती से गायब हो जाए, तो पेड़-पौधे और जीव-जंतु और ज्यादा फलेंगे-फूलेंगे। लेकिन अगर प्रकृति रूठ गई, तो इंसान का नामोनिशान मिटने में देर नहीं लगेगी। यह खूबसूरत धरती हमें अपने पूर्वजों से मिली हुई कोई ऐसी जायदाद नहीं है जिसे हम जैसे चाहें उजाड़ दें। यह तो एक अमानत है, जो हमें अपनी आने वाली संतानों को सौंपनी है। जब हमारी संतानें हमसे पूछेंगी कि आपने हमें कैसी दुनिया दी? एक सूखी, बीमार और कंक्रीट से भरी पृथ्वी या एक हरी-भरी, साफ और जीवन से लबालब धरती? उस वक्त हमारे पास क्या जवाब होगा, यह आज हमारे द्वारा उठाए गए कदमों पर निर्भर करता है। तात्कालिक स्वार्थ के इस अंधे चश्मे को उतारिए और उस जीवन की पुकार को सुनिए जो इस मिट्टी के हर जर्रे में धड़क रहा है।

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