चंद्रकांत शिवहरे “बबलू भैया”
मैं बबेरू! पिछड़े बुंदेलखंड के पिछड़े इलाकों में शुमार! मैं आज तपता हुआ, सूखा और प्यासा पड़ा हूं। तपती गर्मी में छाया और वातावरण को नम और प्राण वायु देने वाले धरा के अनमोल रतन..”वृक्षों” को मेरे हृदय स्थल से कब और कैसे ऑपरेट कर दिया गया? इस घटना पर बहुत दुःखी और स्तब्ध हूं। यह दुःख मुझे मेरे लिए नहीं बल्कि अपने बाशिंदों के लिए है। वही बाशिंदे जिन्होंने मेरे आभूषण और अपने लिए पर्यावरणीय शुकून को खुद से जाने अनजाने में छीन लिया है। यहां के मेरे ही बाशिंदों ने अपनी तात्कालिक स्वार्थ पूर्ति और आधुनिकता के लिए वृक्षों को नींव से उखाड़ एक दुखद भविष्य की नींव रख दी है। मैं बबेरू! अपने इन्हीं बाशिंदों के वर्तमान और भविष्य के लिए दुःखी हूं।
अभी चैत्र और वैशाख की धूप का ही ये आलम है कि आसमान से बरस रही आग मेरे सपाट सीने में खड़े कंक्रीट के जंगलों में आकर दावनल का रूप ले कर और भी प्रचंड हो जाती है। वजह आसमान से बरसती आग की प्रचंडता को कम करने वाले धरा के रतन बबेरू की पूरी बस्ती से गायब से हैं। ऐसा लगता है उत्तर भारत में मैं ही अभागा एक कस्बा हूं जिसके हिस्से में कुछ दशकों से वृक्ष और उद्यान आदि कुछ नहीं है। कुछ बड़े विद्यालयों में, गल्ला मंडी में, नई तहसील रोड और अस्पताल परिसर में कुछ वृक्ष जरूर लगे हैं जिन्हें संख्या में न औसत कह सकते न अधिक बस बहुत कम ही हैं जिन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता है। यहां के मुख्य मार्गों में तो वृक्ष हैं ही नहीं मानो मेरे मुख्य मार्ग वृक्षारि हैं। मैं अपने बाशिंदों से क्या विनती उनकी ही खुशी और सुखमय भविष्य के लिए करूं जिससे यह भी ग्रीन क्लीन कस्बे में अपना नाम दर्ज करा कर, तपती गर्मियों में राहगीरों को छांव भी दे सके। गर्मियों में बरसती आग की तीव्रता को ढाल की तरह रोक सके या कम कर सके। शुद्ध प्राणवायु यहां के वातावरण में बह सके, और यहां की शुष्क वायु में पर्याप्त नमी रह सके जिससे मेरे बाशिंदों के अंदर जो शुष्कता है वह नमी में और बोली में जो ठेठपन है उसमें नम्रता का भी समावेश हो सके।
मेरे बाशिंदे दिल के बहुत भोले हैं वो अपनों में से कोई अपना प्रतिनिधि भी चुनता है लेकिन उनसे भी कोई अपेक्षा नहीं रखता, मात्र उन्हें चुनकर उनका सम्मान करता है। उनके चुनने की प्रक्रिया भी बहुत आम सी है, जाति और दल देखकर प्रतिनिधि का चुनाव हो जाता है। उनके अंदर खूबियों को देखे जाने की परम्परा यहां कभी नहीं थी। यहां यह परंपरा कई दशकों से कायम है। इसे देखकर मन में खुशी भी होती है कि मेरे बाशिंदे भले कुछ ही सही किसी परम्परा को निभा तो रहे हैं!
प्रतिवर्ष बढ़ती गर्मी तपते चैत्र बैसाख में चढ़ता पारा यहां के बाशिंदों के प्रति मेरी चिंता का विषय है। ज्येष्ठ की आग तो अभी बाकी है! आने वाले वर्षों में बढ़ता पारा यहां की स्थिति को कहीं और दयनीय और दुखप्रद न कर दे। मेरे बाशिंदों द्वारा चुने गए उनके प्रतिनिधि जो मेरे बाशिंदों जैसे मेरे ही अपने हैं, उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठता और अपने शानदार अधिकारों की जानकारी के चलते वो मेरे बाशिंदों और मेरे प्रति भी अपना कर्ज उतार सकते हैं। भविष्य की इस दुखद परिस्थिति से बचने के लिए धरातल पर बहुत से कार्य और योजनाएं तैयार करनी होगी।
वर्तमान की बरसती आग से बचाने के लिए पानी टैंकरों से सभी मार्गों पर फव्वारे द्वारा वातावरण में कुछ कुछ समयांतराल पर पानी फैलाया जा सकता है, जिससे वातावरण में कुछ नमी और शीतलता बनी रह सके, और तपती सड़कें थोड़ा राहत ले सकें। जब तक मेरे सभी मुख्य मार्ग वृक्ष विहीन हैं तब तक इन तपते महीनों में राहगीरों को हीट वेब से बचाने के लिए मुख्य मार्गों में सड़क किनारे ग्रीन नेट से बनी अस्थाई छायादार स्थान बनाया जा सकता है। ऐसे बहुत से अधिकार जनप्रतिनिधियों के तरकश में भरे पड़े हैं। बस इच्छा उन्हें तरकश से निकालने और चलाने की हो। मैं बबेरू! आज रो भी रहा हूं और एक उम्मीद भी लिए बैठा हूं कि मेरे बाशिंदे मेरे हिस्से का दर्द जरूर अनुभव करेंगे। और वृक्षारि (वृक्षों के शत्रु) उपनाम के दाग से मुझे मुक्त करेंगे, और वर्तमान तथा भविष्य में आसमान से बरसती आग से बचने के लिए मेरे शक्तिसंपन्न और अधिकार संपन्न बाशिंदे शायद कुछ बेहतर करने की अब चेष्टा करेंगे।







