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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    प्रकृति हम पर इतना क्रोधित क्यों?

    By January 3, 2020Updated:January 3, 2020 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    पूरी दुनिया मे जलवायु परिवर्तन (क्लाइमेट चेंज) होने से मौसम की बेरुखी के साथ हम और हमारी पृथ्वी के जीव जंतुओं पर भी इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है।

    जहां भीषण गर्मी पड़ती थी वहां ठंडक ज्यादा पड़ने लगी और जहां नदी नालों से लेकर तालाबों झील नदी तक की जलस्तर कम होने से हमारे प्रकति के तमामो जीव-जंतुओं के इससे प्रभावित होना लाजमी हैं। मौसम के इस बेतुकी रवैये के कारण प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि होते चले जाने से जहां पिघलते ग्लेशियर, समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी, भयावह बाढ़, असहनीय गर्मी और जंगलों की भीषण आग की खबरें हम आये दिन सुनाई देती हैं।

    इस तरह के प्रकृति द्वारा उटपटांग हरकते हमें बार-बार यह चेतावनी दे रही है कि यदि हम इस समस्या पर अभी समय रहते ध्यान नही दिये तो आने वाले समय में इसका खामियाजा हम सभी पृथ्वी वासियों को मिलकर चुकाना पड़ेगा।

    अभी हाल ही में सम्पन्न हुए संयुक्त राष्ट्र की बैठक में विश्व जयवायु परिवर्तन पर पर्यावरण विशेषज्ञों ने दुनियां के विकासशील देशों को वर्ष 2020 तक अपने-अपने देश मे कार्बन उत्सर्जन को सबसे निम्न स्तर पर लाने का आवाह्नन किया गया था लेकिन ज्यादा तर देशों के इस विषय को गंभीरता से न लेने से विशेष कर पोलैंड में जलवायु परिवर्तन पर इस बैठक में फिर से इस देश को पुनः आगाह किया है कि यदि वैश्विक स्तर पर सभी देशों की साझेदारी में मौजूदा संकट से निपटने के उपाय तुरंत नहीं किये गये तो मानव सभ्यता का ही विनाश होना निश्चित है। हमारा देश भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है, जो मौजूदा दौर में हुये मौसम परिवर्तन से सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं या होने वाले हैं। कुछ रिपोर्टों में तो यहां तक आशंका जतायी गयी है कि आने वाले कुछ ही वर्षों में भारत को अपने यहां पीने के पानी की कमी से जूझना पड़ सकता है।

    वर्ल्ड बैंक का एक आंकलन यह दर्शाता है कि वर्ष 2050 तक यदि इसी क्रम से तापमान बढ़ते चले जाने से और मॉनसून की अनियमितताओं से भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी छति पहुँच सकती है। भारत यदि वर्ष 2030 तक अपने यहां CO2 कार्बन उत्सर्जन में 30 से 35 प्रतिशत तक कि कमी लाने एवं 40 प्रतिशत तक की बिजली स्वच्छ स्रोतों से उत्पादित करने की दिशा में कामियाब हो जाता है और सौर ऊर्जा के भी क्षेत्र में दूसरे देशों के साथ मिलकर ठोस कदम उठाता है तो यह एक बहुत बड़ी कामयाबी होगी।

    इस सम्मेलन में भारत देश की ओर से यह भरोसा दिलाया गया है कि लक्ष्यों को निर्धारित समय से पहले पूरा कर लिया जायेगा। कार्बन उत्सर्जन के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार विकसित देश ही हैं लेकिन इस समस्या के समाधान की दिशा में अपेक्षित सहयोग के मामले में अमेरिका का रवैया बेहद निराशा जनक एवं नकारात्मक है।

    हमारे सामने चुनौतियां बड़ी हैं और समय बहुत कम है ऐसी स्थिति में एक ओर मौजूदा ऊर्जा तथा बुनियादी ढांचे के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के उपाय बहुत आवश्यक हैं, तो दूसरी ओर भविष्य की योजनाओं में भी इस बात का ध्यान रखना होगा। अगले एक-डेढ़ दशक में बुनियादी ढांचे में दुनियाभर में 90 ट्रिलियन डॉलर का निवेश संभावित है वहीं भारत में 2030 तक जिस बुनियादी संरचना की आवश्यकता है, उसके 70-80 फीसदी हिस्से का निर्माण होना अभी शेष है लेकिन एक संतोषजनक बात यह है कि यदि वैश्विक स्तर पर पेरिस समझौते पर अमल हो, तो वर्ष 2030 तक 26 ट्रिलियन डॉलर के आर्थिक लाभ भी हो सकते हैं।

    इस अवधि तक वायु प्रदूषण से होनेवाली सात लाख सालाना मौतों को भी रोकने में हमे कामियाबी मिल सकती है। वर्ष 2030 तक हमारे देश की 70 प्रतिशत राष्ट्रीय आय एवं रोजगार का स्रोत शहर होंगे, ऐसे में भारत को बहुत बड़ा लाभ मिल सकता है जिसके लिये यह जरूरी है कि आपदाओं को रोकने तथा मौसम के बदलाव के अनुरूप प्रबंधन पर हम समुचित ध्यान रख पायें।

    • जी के चक्रवर्ती

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