व्यंग्य: अंशुमाली रस्तोगी
भारत एक सीडी प्रधान मुल्क है! यहां हर रोज हर विषय पर तरह-तरह की सीडीयां बनती हैं। फ्लॉपी डिस्क के विलुप्त होने के बाद लोगों ने सीडी कल्चर में खुद को आराम से ढाल लिया है। हालांकि सीडी कल्चर की डिमांड भी अब धीरे-धीरे कर घटने लगी है। क्योंकि पैन-ड्राइव ने इसे टेक-ओवर कर लिया है। फिर भी परांपरावादी लोगों का मन सीडी में ही रमता है।
खबरों में बने रहने के लिए अक्सर ही किसी न किसी नेता या सेलिब्रिटी की सीडी वायरल हो जाती है। वायरल हुई सीडी पर खूब हंगामा कटता है। तरह-तरह से लोग उस पर मौज लेते हैं। सोशल मीडिया पर तो बकायदा उक्त सीडी में रोल निभा रहे शख्स को जमकर ट्रोल किया जाता है। एक प्रकार से सीडी हम लोगों के लिए मुफ्त का मनोरंजन लेके आती है।
सीडी के वायरल होते ही उस पल तो उक्त सज्जन की अच्छी-खासी बदनामी हो लेती है परंतु बाद में इसका उन्हें घणा फायदा भी मिलता है। आधुनिक कहावत है, सोशल मीडिया से मिली बदनामी जीवन में राजनीतिक एवं सिनेमाई भविष्य का सुनहरा रास्ता खोलती है।
सीडी एक प्रकार से हिट होने का अजब-गजब फॉर्मूला बन गई है। सीडी में अगर कुछ अश्लीलताएं हों फिर तो बात ही क्या! अश्लीलता पर हमारे सामाजिक व आदर्शवादी लोगों की भृकुटी वैसे ही तन जाती है जैसे किसी जमाने में देवताओं और भगवानों की तना करती थी। तुरंत से पहले उनका संस्कृतिक ताना-बाना चरमरा जाता है। सीडी के नायक या नायिका को जमकर गरियाया जाता है। तरह-तरह की तोहमतें चस्पा की जाती हैं। ऐसा कहने में वे लोग सबसे आगे रहते हैं, जिनके मोबाइल फोन की गैलरी पर अघोषित ताला ठुका रहता है।
चर्चा में बना रहना वक़्त की डिमांड है। सोशल मीडिया के सहारे मिली चर्चा बहुत दूर तलक जाती है। सीडी हो या बयान साहित्य और राजनीति के मैदान में यही श्रीवृद्धि करवाते हैं। राजनीति में तो तमाम वरिष्ठ और युवा नेताओं का इतिहास सीडी के चमत्कारों से भरा पड़ा है। इसमें गलत भी क्या है? वक़्त के साथ नेता और राजनीति के मायने बदल गए हैं पियारे।
सीडी में छुपी कहानियां अब कौतुहल का विषय न रह गईं हैं। बाजार में सबके लिए जगह है। दुकानें सबकी चल रहीं हैं। शर्म की छाया अब हमारे आंगनों से लगभग सिमट चुकी है। जो अंदर दिख रहा है वही बाहर भी। अभद्र जैसा अब कुछ भी नहीं। क्लिप या एमएमस बीते जमाने की बातें हुईं।
तब ही तो जो नेता उक्त सीडी में नजर आए हैं वे बेफिक्र हो अपने चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं। जिन्हें जो कहना है वे कहें- उनके ठेंगे से।
फिलहाल दिमाग पर अतिरिक्त लोड न लीजिए। यहां न मेरे कहने न आपके चीखने से कुछ नहीं बदलेगा। हर कोई अपने साथ-साथ दूसरों की छीछालेदर को एन्जॉय करने में व्यस्त हैं। आप भी व्यस्त रहें। पर मस्त रहें।







