।। चाणक्य नीति ।।
गुणो भूषयते रुपं शीलं भूषयते कुलम्।
सिद्धिर्भूषयते विद्यां भोगो भूषयते धनम्।
रूप की शोभा गुणों से होती है, कुल की शोभा शील से होती है, विद्या की शोभा सिद्धि, अर्थात धन-प्राप्ति से होती है और धन की शोभा उसके भोगने से होती है।
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निर्गुणस्य हतं रूपं दुःशीलस्य हतं कुलम्।
असिद्धस्य हता विद्या ह्यभोगेन हतं धनम्।।
गुणहीन पुरुष की सुन्दरता, दुराचारी पुरुष का उच्च कुल में उत्पन्न होना, आजीविका सुलभ न कराने वाली विद्या और उपभोग में न आने वाला धन व्यर्थ ही हैं। इनकी न कोई उपयोगिता है और न ही कोई महत्व है।
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शुद्धं भूमिगतं तोयं शुद्ध नारी पतिव्रता।
शुचिः क्षेमकरो राजा सन्तोषी ब्राह्मणः शुचिः।।
धरती से निकलने वाला जल शुद्ध होता है, पतिव्रता स्त्री सदा शुद्ध होती है, प्रजा का कल्याण करने वाला राजा पवित्र होता है और सन्तोषी ब्राह्मण भी शुद्ध होता है।
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असन्तुष्टाः द्विजाः नष्टाः सन्तुष्टाश्च महीभृतः।
सलज्जा गणिका नष्टाः निर्लज्जा च कुलाङ्गना।।
जिस प्रकार असन्तष्ट ब्राह्मण और सन्तोषी राजा नष्ट हो जाते हैं. उसी प्रकार लज्जा करने वाली वेश्या तथा लज्जा न करने वाली कुलीन स्त्री भी नष्ट हो जाती हैं।







