अरुणोदय होते सूर्य को अर्ध्य दे महिलाओ ने पूरा किया व्रत

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छठ के मेले मे बांसुरी व सीटियों की मधुर ध्वनि सुनने को मिल रही थी वही हुरका के नाच झाल और ढोलक के स्वर लहरियां मिलकर अजीबो गरीब माहौल बना दिया था। ईधर बच्चे और परिजन खिलौनो और मिठाईयो मे मशगुंल थे

लखनऊ 28 अक्टूबर 2017, पूर्वांचल मे महत्वपुर्ण लोकप्रिय त्योहारो मे शूमार छठ व्रत को श्रद्वालु महिलाओ ने अरूणोदय होते सूर्य को अर्ध्य दे सुखी, समृद्वि एवं अच्छय सुहाग की कामना की। सूर्य उपासना का पर्व छठ जो आज महाँ पर्व का रूप ले चुका है। यह पर्व लगातार चार दिनों तक चलता है जिसमे व्रती महिलाएं नहाय खाय के साथ इस व्रत की शुरुआत करती हैं और एक दिन खरना करने के बाद एक दिन निर्जला व्रत रहकर डूबते हुवे सूर्य को अर्घ देती हैं और अगले दिन सुबह भगवान सूर्य को अर्घ देकर अपना निर्जला व्रत तोड़ने के साथ इस पर्व को श्रद्घा के साथ मनाती हैं। इस पर्व में नदी, पोखर के किनारे छठ माता की वेदिया बनाकर छठ मईया की पूजा करती हैं। इस पूजा में व्रती महिलाएं सभी मौसमी फलों के साथ ही घर में बनने वाले ठेकुआ के द्वारा छठ मईया की पूजा करती हैं और परिवार व समाज की मंगल की कामना करती है।

जनपद के सभी ऐतिहासिक शिव पोखरे पर छठ पर्व के तीसरे दिन हजारों महिलाओं ने अपनी-अपनी वेदियों पर पूजन करने के बाद डूबते हुवे सूर्य को अर्घ दिया तथा चौथे दिन उगते हुये सूर्य की उपासना किया। इस अवसर पर इस ऐतिहासिक पोखरे पर मेले जैसा समां हो गया था। व्रती महिलाओं एवं उनके साथ आने वाले श्रद्घालुओं को किसी प्रकार की कठिनाई न हो और इस व्रत को सकुशल संपन्न कराने के लिए प्रशासन द्वारा महिलाओं की सुरक्षा के लिए पर्याप्त मात्रा में पुरुष एवं महिला पुलिस का प्रबंध किया गया था।

शुक्रवार को जनपद के सभी तहसीलो व विकास खण्डो सहित ग्रामीण अंचलो के सभी नदी घाटो व पोखरो पर छठ व्रत की महिलाए मध्यरात्रि के बाद ही घाटो पर पहुंचने लगी और छठ माता का विधिवत पूजन, अर्चन और कथा आदि कहकर बड़े श्रद्वा के साथ मनाया। महिलाओ के साथ घर के बच्चे और पुरूष भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेते नजर आये और सभी घाटो और तलाबो को जगमग दियो के प्रकाशो ने अद्भुत समां बांध दी और सुन्दर मनोहर भक्तिमय गीतो के द्वारा महिलाओ ने भक्ति मे चार चाँद लगा दिया। हर घाटो पर मेले जैसा दृश्य लग गया और मेलो मे दुकानदार अपनी अपनी दुकाने सजाकर बैठ गये। इस दौरान बच्चे व उनके परिजन मिठाईयां, खिलौने खरीदते नजर आये तो वही मेले मे लगे झुलो पर झुलना नही भूले। छठ व्रत के दौरान कुछ महिलाये जो मनौती मानी थी उनकी मनौती पुरी होने पर आंचल मे हुरका का नाच करवाने का संकल्प लिया था उसको आंचल मे नाच करवाती नजर आयी। छठ के मेले मे बांसुरी व सिटीयो की मधुर ध्वनि सुनने को मिल रही थी वही हुरका के नाच झाल और ढोलक के स्वर लहरियां मिलकर अजीबो गरीब माहौल बना दिया था। ईधर बच्चे और परिजन खिलौनो और मिठाईयो मे मशगुंल थे वहीं श्रद्वालु महिलाए नदी और तालाब के जल मे खड़े हो कर अरूणोदय होते सुर्य को अर्ध्य प्रदान करते हुये अक्षय सुहाग, स्थिर लक्ष्मी और लम्बे जीवन की कामना भगवान सुर्य और माँ छठ से की।

इस मौके पर जनपद के रामधान घाट पोखरा, सिधुआ स्थान, रामकोला, फाजिलनगर, तमकुहीराज, हाटा, के अलावा मोतीचक विकास खण्ड के मथौली बाजार ,खैरेटवा, बेलवा सुदामा, मुहम्मदा सिकटिया, लोहेपार, रगड़गंज, देवड़ार पिपरा, दुबौली आदि जगहो पर गुरूवार की शाम अस्तांचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्नती महिलाएं अपने घर पहुंच छठ मईया की कोसी भरने के काम जुट गई। पूरी रात जग कर कोसी के पास जल रही अखण्ड ज्योति की रक्षा करते हुए बूझने नहीं दी। वहीं शुक्रवार की भोर में ही लगभग तीन बजे से ही छठ माता का व्नत रखी महिलाएं अपने घरों से निकल पोखरों के घाटों पर जा पहुंची तथा भगवान सूर्य की अराधना करने लगी। आसमान में सूर्य की लाली आने के पहले ही सूर्य को अर्घ्य देने के लिए महिलाएं सूप में सजाये गये फल फूल व अपने द्वारा बनाये गये पकवानों को अपने हाथों में लेकर पोखरे की पानी में उतर भगवान भाष्कर के उदय होने की प्रतीक्षा करने लगी। आसमान में जब लालिमा दिखने लगी और ज्यों ही ऊर्जा के स्त्रोत भगवान सूर्य ने इन्हें दर्शन दिया व्नती महिलाएं उन्हें अर्ध्य देना शुरु कर दिया। इनका पूजन करने के बाद छठ माता की वेदी पर चढाये गये चावल को प्रसाद के रुप में उसे ग्रहण कर अपना व्नत तोड़ा तथा व्नत के दौरान जो त्रुटियां हुई हैं उसके लिए महिलाओं छठ माता व भगवान सूर्य से क्षमा मागते हुए अपने परिवार के लिए इनसे सुख समृद्घि मांगी। इस पर्व के दौरान क्षेत्र में शान्ति रही तथा लोगों ने बढ चढ कर अपनी हिस्सेदारी निभाई।

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