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    Home»धर्म»धर्म-कर्म

    महापर्व छठ: तीज-त्योहार व संस्कृति का झरोखा है सारनी

    By October 25, 2017 धर्म-कर्म No Comments4 Mins Read
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    भारत के चारों छोर के मध्य में सतपुड़ा की वादियों-कन्दराओं में भी महापर्व छट का उत्साह वही होता है जैसा बिहार में। भोजपुरी भाषी लोगों द्वारा मनाया जाने वाला ये परम पावन पर्व पूजा-पाठ की पवित्रता, कठिनता और परंपरा के लिए जाना जाता है। नर्मदा की सहायक तवा नदी का उद्गम इसी सारनी और मठारदेव बाबा पहाड़ी शृंखला से खाइयों से होता है। इसी तवा नदी पर बना सतपुड़ा बांध, सारनी की एक मात्र वॉटर-बॉडी है। इसी बांध के कैचमेंट एरिया के किनारों पर दशकों से प्रतिवर्ष छठ महापर्व मनाया जाता है।
    देशभर के लोगों और उनके तीज-त्योहार व संस्कृति का झरोखा सा है सारनी। और यूँ कहे तो मानो यूपी-बिहार का छोटा एक्सटेंशन भी है। बचपन में मोहल्ले के भोजपुरी भाषी पड़ोसियों और दोस्तों के साथ मनाते हुई ये त्योहार अपना सा लगने लगा है। याद आते हैं स्कूल पढ़ने का वो दौर जब तड़के 5 बजे नींद खुली तो ‘बहंगी घाटए पहुचाये…’ जैसे कई गीत सुनाई पड़ रहे। गीतों का मिश्री सा। इनमें मेरी अपनी ऑल टाइम फेवरिट शारदा सिन्हा के छठ गीत भी शामिल हैं। उनका गया ‘बहंगी…’ गीत मेरा बचपन से फेवरिट है। अभी सुनाई पड़ रहे छठ गीतों की मिश्री में ये भी शामिल है। पाथाखेड़ा के गली-मोहल्लों में तेज बजते छठ गीतों की वजह से मेरी तड़के नींद नहीं खुली।
    हमारा बचपन यूपी-बिहार मूल के परिवारों और दोस्तों के साथ बीता है, जहाँ उन्हें हमारी कढ़ी पसंद थी तो हमें उनका ठेकुआ। मुंबईकर और भोजपुरी वाली रार नहीं। बिहारी हमारी गोवर्धन पूजा का उतना ही सम्मान करते जितना हम छठ पर्व का। सामाजिक समरसता और सौहार्द का अद्भुत व सुखद मिलन। हम लोगों का टारगेट दीपावली रहता तो उनका छठ। उनका अनाज सुखाना और कपड़े सिलने डालना जैसी तैयारियां होते देखना। मोहल्ले में शारदा सिन्हा के गीत सुनाई पड़ना। मुझे समझ न आना लेकिन आवाज़, धुन और लय का आनंद। छठ के लिए घाट जाने का खूब मन करता। लेकिन जब तक हम यायावर हुए थे नहीं जा पाए। काहे-कि नदी के डर से घर से मनाही होती।
    बड़े होते ही मनाही को मनमानी में बदला गई, सो हम छठ पे हमारी तवा मैया के तट पर छठी मइया पूजने/घूमने जाते। मोहल्ले के बिहारी पड़ोसियों के साथ वहां जाते-जाते छठ से आत्मीय लगाव सा हो गया। 4-5 साल भोर में उठकर छठ घाट गया। घाट तक उनको लेकर जाना, पूजा का सामान ले जाने में हाथ बँटाना और पानी में गन्ने का घट लगाना। आहुति डालना। उनकी फ़ोटो खिंचना। उनके बच्चों संग घाट घूमना और वहाँ पठाखे फोड़ना। प्रसाद बाँटना और दिन चढ़ते उनके साथ लौटना। बिहारियों के साथ ये महापर्व अपना सा लगने लगा। छठ की सुबह आदतन नींद तड़के खुल जाती है। छठ के नहाए-खाए की खीर ख़ूब खाई भी है और बाँटी भी है। आज भी उसका स्वाद ज़ुबान पर ताज़ा हो जाता है। और छठ के कई दिनों बाद तक तो मेरे फेवरिट ठेकुआ खाए हैं।
    छठ के कठिन नियम के अलावा इक और वजह से ये मेरे पसंदीदा पर्वों में से एक है। वो है सूरज। कहते है कि ‘चढ़ते सूरज को हर कोई सलाम करता है।’ लेकिन छठ में पहले डूबते अर्ध्य दिया जाता है फिर अगले दिन चढ़ते सूरज को अर्क देकर पूजा जाता है। बहरहाल, सारनी के साथ छठ से भी दूर हुआ। अब तो दिवाली पे ही जैसे-तैसे, तत्काल के वेटिंग टिकट से घर पहुंच जाए तो बहुत। 4-5 साल उनके साथ छठ मनाया है तो वहां भाभी जी पूछती हैं, ‘का रे सन्नी, इस साल रुकेगा नअअ छठ तअअक…? के दिवाली मना के भाग जायेगा नौकरी…?’ मैं सदाबहार और बहुअवसर उपयोगी जवाब देता। इत्ता ही कि ‘का करे नौकरी।’ लेकिन आई मिस यू सारनी वाली छठ।
    अमित

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