बच्चों की कहानी: कानाफूसी और ब्लूटूथ

0
407

अरविंद कुमार ‘साहू: 7007190413 

कानाफूसी एक साधारण फोन था। इसके साफ्टवेयर और पुर्जे परिवार की तरह थे। इस परिवार मे सभी खुश रहते थ। एक – दूसरे की खबर व संदेश पहुंचाना , गाने सुनाना , दिमागी कसरत के खेल से मनोरंजन कराना , उनका सीधा सा काम था। सब अपने काम मे ईमानदारी से लगे रहते थे। किसी को किसी दूसरे की चीज का लालच न था। सब अपने हुनर से खुश था। लेकिन इधर कानाफूसी परिवार मे कुछ अति आधुनिक पड़ोसियों की घुस पैठ हो गई था।

वैसे तो इन पड़ोसियों की पूरी मंडली थी। जैसे ब्लूटूथ , शेरिट , एम्मी एडमिन आदि। इनमे से अधिकांश सिर्फ विशेष जरूरत पर उठते। मिलजुल कर एक दूसरे के काम मे हाथ बंटाते । बाकी समय चुपचाप मस्त पड़े रहते। लेकिन इनमे ब्लूटूथ कुछ ज्यादा ही शातिर था। वह पड़ोसियों की जो चीज पसंद आ जाती , उसे मांगे बिना नहीं रहता था। जब तक वह उसकी हूबहू नकल नहीं प्राप्त कर लेता था , तब तक उसको चैन नहीं पड़ता था। वह माँगी हुई चीजों की न तो कोई कीमत देता था, न धन्यवाद बोलता था। कोई कुछ कहता भी तो घमंड से जवाब देता – “अरे मुझसे भी ले लेना कभी , जो चाहिए हो तुम्हे। मैं भी बड़े दिल वाला हूँ। ”

हमेशा दूसरों से मांगने वाले के पास भला नया क्या हो सकता था ? उसके लिए जो भी नया जैसा रहता , वह भी किसी और से मांगा हुआ ही होता। लोग उसकी खिल्ली उड़ाते थे। देखते ही कहते – “लो भाई ! अपना मंगू आ गया। ” लेकिन ब्लूटूथ की सेहत पर कुछ असर नहीं पड़ता था। वह फिस्स से हँस देता और माँगी हुई चीज लेकर खिसक जाता। उसकी इस आदत से कानाफूसी परिवार दुखी था। सब समझाते – “ देख भाई ! हर किसी के पास कोई भी नई चीज देखकर लालच करना ठीक नहीं होता। जरूरी नहीं कि दूसरे की हर चीज तेरे भी पेट मे पच जाये। किसी दिन तुझे कोई नुकसान भी पहुँच सकता है। ”

लेकिन ब्लूटूथ के कानों पर जूं तक न रेंगती। उल्टे सबको हड़काता फिरता – “अपनी चीज पर किसी को इतना घमंड नहीं करना चाहिए। अरे दूसरों को देने से तो अपनी चीज और बढ़ती है। क्या बुजुर्गों से तुमने ऐसा नहीं सुना ?”

– “वह तो ठीक है भाई ! किन्तु एक ही कहावत हर चीज पर लागू नहीं होती। तुम्हें अपने लालच को नियंत्रण मे रखना चाहिए। ”

– “ठीक है ठीक है , मैं देख लूँगा , बाद मे सोचूंगा। ” ब्लूटूथ लापरवाही से कंधे उचकाता हुआ निकल जाता।

कुछ दिनों बाद की बात है। पड़ोसी शहर से एक स्मार्ट परिवार उनके मुहल्ले मे रहने आया। उसके पास कई तरह की नई सामग्री थ। नए – नए फोटो , गाने – फिल्मे व थ्रीडी गेम थे। देखकर ब्लूटूथ का दिल मचलने लग। उसने स्मार्ट परिवार के अपने जैसे एक सदस्य से दोस्ती बढ़ा ल। फिर उससे भी कुछ न कुछ मांगने लगा। बेचारा स्मार्ट परिवार संकोच मे दे तो देता। लेकिन उसने प्यार से समझाया भी – “अपनी चादर मे ही पाँव फैलाना सीख। दूसरे के ऊंचे दरवाजे मे सिर फोड़ना अच्छी बात नहीं होती। तुम दूसरों की सारी चीजों को आत्मसात नहीं कर सकता। पता नहीं कौन सी चीज तुम्हें नुकसान पहुंचा दे। ” लेकिन ब्लूटूथ हमेशा की तरह अनसुनी कर देता।

फिर एक दिन की बात है कुछ नए वीडियो क्लिप आए स्मार्ट परिवार के पास । ब्लूटूथ ने चिरौरी करके उसे भी मांग लिया । वो देना तो नहीं चाहता था , पर सोचा ‘पड़ोसी बुरा मान जाएगा’ सो उसने दे दिय। एक इशारा करते ही सब ट्रांसफर होने लग। सामग्री भारी थी , कानाफूसी की मेमोरी कम। उसका पेट जल्दी भर गया। उसे बीच मे ही लेन – देन बंद करना पड़। स्मार्ट परिवार हँस कर चला गय। उसके जाते ही कानाफूसी के पेट मे कुछ गड़बड़ होने लग। शरीर भारी हो गय। फिर दर्द से दोहरा होने लगा, टूटने लग। एक – दो दिन मे ही परिवार के सभी सदस्य अपना संतुलन खोकर बेचैनी से छटपटाने लग। नया जो कुछ भी पड़ोसी के द्वारा आया था , वह परिवार के सभी सदस्यों पर असर डालने लगा था ।

पड़ोसी द्वारा लाये नए वीडियो क्लिपों मे जाने ऐसा क्या था कि कानाफूसी का पहले का खाया पिया भी सब हराम हो गय। मानो किसी ने उसको जमालगोटा खिला दिया हो। दस्त पेचिस जैसी बीमारी लग गई थी। पुरानी फाइलों मे कुतरन होने लगी थी। जैसे पेट मे भूखे चूहे दौड़ रहे हो। धीरे – धीरे कानाफूसी की हालत खराब हो गई। खबरें आती तो ठीक से सुनाई न पड़ती। संदेशों के अक्षर तितर – बितर दिखत। वीडियो लंगड़ा कर चलता । कानाफूसी परिवार बुरी तरह बीमार होकर बिस्तर पर गिर पड़। अब उसको अस्पताल ले जाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था। शुभचिंतकों की बुलाई एंबुलेंस कानफाड़ू आवाज मे हूटर बजाते हुए आयी और कानाफूसी को ले जाकर आपरेशन थियेटर मे धकेल गया।

डॉक्टर ने जांच किया तो पता चला कि कैंसर जैसा एक खतरनाक वायरस वहाँ तबाही मचा रहा थ। ये पड़ोसी द्वारा माँगे गये वीडियो क्लिपों के जरिये ही कानाफूसी परिवार मे आया था। बड़ी मुश्किल से एक्सरे और स्कैनिंग करके उसको तलाशा गया। आपरेशन करके बाहर निकाला गया। किन्तु इस प्रक्रिया मे उसकी पुरानी याददाश्त कमजोर पड़ गई और फाइलों मे रखी अनेक सामग्री बेकार हो ग। इलाज मे भारी खर्च हुआ सो अलग। बहरहाल , ठीक होने के बाद भी कानाफूसी पुरानी हालत मे नहीं आ सका था । इस पूरे हालात से गुजरने के बाद कानाफूसी की पुरानी इज्जत चली गई थ। अब उसके शुभचिंतक उसकी जगह नये स्मार्ट पड़ोसी को ही घर लाने की सोचने लगे थ। बेचारा कानाफूसी , …….इस ब्लूटूथ जैसे लंपट दोस्त के चक्कर मे अपना सब कुछ खोने जा रहा थ। सबसे यही कहता फिर रहा था – “भैया ! मुफ्त की चीजों को पाने का ऐसा लालच मत करना। ”

E.mail– aksahu2008@rediffmail.com

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here