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    अंधविश्वासों की चोटियां

    By August 11, 2017Updated:August 11, 2017 ब्लॉग No Comments4 Mins Read
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    Post Views: 836
     
     अंशुमाली रस्तोगी
     

    चोटियां काटी जा रही हैं। कौन काट रहा है? क्यों काट रहा है? किस उद्देश्य के लिए काट रहा है? इन प्रश्नों के जवाब किसी के पास नहीं। फिर भी, खबरें निरंतर चोटियां काटे जाने की आ रही हैं।

    समाज में जितने मुंह, उतनी बातें हैं। चोटी काटने को कोई कोरी अफवाह करार दे रहा है। तो कोई टोने-टोटके का दुष्प्रभाव बता रहा है। मनोवैज्ञानिक कह रहे हैं कि यह ‘दिमागी फोबिया’ है। टोटल अंधविश्वास है। मानसिक संतुलन न खोएं।

    जो भी हो, चोटियां तो निरंतर काटी ही जा रही हैं। चोटी कटना इतना ‘वायरल’ हो चुका है कि हर रोज अखबारों के पहले पन्ने पर प्रमुख खबर यही होती है। चूंकि खबर ‘मसालेदार’ है तो सोशल मीडिया पर भी लोग जमकर चोटी कटने के ‘चटकारे’ ले रहे हैं। कई ‘फोटोशॉप’ तो ऐसे भी देखे हैं, जिनमें महिलाओं की चोटियों में ‘नींबू-मिर्ची’ बंधी हुई है। यहां तक कि लोगों ने अपने घरों के दरवाजों पर नीम की डालियां और गोबर की थाप लगाई हुई है।

    यों, हमारे देश में अफवाहों के पसरते और अंधविश्वासों के परवान चढ़ते जरा भी देर नहीं लगती। हर अफवाह और अंधविश्वास हमारे तईं किसी ‘वरदान’ से कम नहीं होता। देखिए न, जब भक्तगण एक साथ गणेशजी को टनों दूध पीला सकते हैं। जब नमक सौ रुपये किलो बिक सकता है। जब आलू-भिंडी में देवता नजर आ सकते हैं। जब राह चलते भूत दिख-मिल सकता है। फिर चोटियों का काटा जाना कोई बहुत बड़ी खबर नहीं! यहां कुछ भी हो सकता है। बस अफवाह या अंधविश्वास को जरा-सा हवा देने की जरूरत है।

    चोटी कटने से जुडीं जो खबरें अखबारों में पढ़ने को मिल रही हैं, वो अधिकतर गांव-देहात से ही हैं। शहरों में या किसी शहरी महिला के साथ ऐसा हुआ हो ऐसी कोई खबर कम से कम मेरी निगाह से तो नहीं गुजरी। फिर भी थोड़ी-बहुत ‘दहशत’ शहरी महिलाओं के दिलो-दिमाग में भी धीरे-धीरे कर घर करने लगी है। स्वाभाविक है, इतनी तदाद में एक साथ खबरों का आना किसी को भी बेचैन कर सकता है।

    सच यह भी है कि अफवाह और अंधविश्वास का सबसे ‘सॉफ्ट टरगेट’ भोले-भाले गांव-देहात के लोग ज्यादा होते हैं। उनका ध्यान भी ऐसी खबरों पर अधिक रहता है। किसी भी अंधविश्वास के सहारे उन्हें बरगलाया जा सकता है। यहां भी लगभग वही हो रहा है।

    यह प्रायः देखा गया है कि देश या समाज तरक्की चाहे कितना ही कर ले मगर अंधविश्वासों पर यकीन करना नहीं छोड़ पाता। ऐसा नहीं है कि अंधविश्वास का शिकार केवल बे-पढ़े लिखे ही होते हैं। मैंने तमाम ऐसे पढ़े-लिखों को अंधविश्वास की चक्की में पिसते देखा है। अपना सबकुछ लुटाते देखा है। टोने-टोटकों, तांत्रिकों-मुल्लाओं के समक्ष घुटने टेकते देखा है। और तो और विज्ञान के अध्यापक को घोर अ-वैज्ञानिक बातें करते सुना है।

    हां, यह सही है कि समाज में बदलाव बहुत तेजी से हो रहे हैं किंतु इंसानी दिमागों में बदलाव अभी भी उस तेजी से नहीं हो पा रहा। अफवाहें हमें आज भी डरा देती हैं। अंधविश्वास आज भी हमें अंधश्रद्धालू होने को मजबूर किए रहते हैं। प्रगतिशील समाज बनने से हम अभी भी बहुत दूर हैं।

    हां, कहने को आप-हम चोटी काटने वाले को ‘महिला-विरोधी’ कहकर ‘गलिया’ सकते हैं। मगर महज गलियाने से तो न महिलाओं का चोटी कटना बंद होगा, न अंधविश्वास पर लगाम लग पाना।
    पुलिस, प्रशासन, सरकार की मदद लेने से कहीं ज्यादा आवश्यक है हमें हमारे मनोवैज्ञानिक स्तर को चुस्त करना। दिमाग के दरवाजों को निरंतर खुला रखना। सच की तह में बिना जाए, अफवाहों-अंधविश्वासों पर आंखें मूंद कर विश्वास कर लेना।

    अपने विश्वासों को अगर हम यों ही डिगाते रहे तो आज चोटियां काटी जा रही हैं हो, सकता है, कल को हमारे चेहरों पर कालिख पोती जाए।

    (साभार) 

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