प्रकृति के अंधाधुंध दोहन पर लगाओ लगाम।
तभी इतिहास करेगा मानव जाति को प्रणाम।।
40 दिनों से भारत में तीखी और भारी मानवीय हलचल बंद हैं या कहें कि हलचल पैदा करने वाला मानव अब घरों में बंद हैं। मानो प्रकृति कुछ पलों के लिये साँस लेने के लिये स्वतंत्र हुई हो। नदियाँ, पर्वत, हवाएं, मिट्टी, पेड़-पौधे यहाँ तक की पूरी पृथ्वी ने मानवीय कोलाहल से खुद को कुछ दिनों के लिये दूरकर जैसे प्रकृति ने खुद को रिचार्ज कर लिया हो। आगे आने वाले कल के लिये! कई सीखें भी मानव समुदाय को इस महाविपदा ने दी है। किसी एक देश द्वारा ही लगभग अरबों रूपयों की योजनाएं, पर्यावरण शुद्ध रखने के लिये अपनायी जाती हैं किंतु परिणाम ढाक के तीन पात के बराबर निकल कर सामने आता है। पूरे विश्व ने देख लिया है कि कुछ दिन के लॉकडाउन से प्रकृति ने खुद को कैसे रिचार्ज कर लिया है। मानव समुदाय के शत्रु लेकिन प्रकृति के इस संभावित मित्र कोविड-19 ने तबाही मचा रखी है।
विश्व के इतिहास में यह वैश्विक महामारी, यह महादुःखद घटना पहली बार ही घटी है। क्योंकि यह घटना जान भी ले रही है, आजीविका भी ले रही है। यह घटना वर्तमान के साथ भविष्य के प्रति भी लोगों में भय उत्पन्न कर रही है। यह महाविषाणु समूची दुनिया को एक बड़े परिवर्तन की ओर ले जाने की ओर भी इंगित कर रहा है। अब यह निर्णय विश्व व देशों को लेना है कि ऐसे महाविषाणुओं से मानवीय सभ्यता को बचाने के लिये उन्हें कौन-कौन से कदम उठाने पड़ेंगे। हमारे सीनियर कॉपी एडीटर राहुल कुमार ने इस विषय के संबंध में कई प्रबुद्ध व चिंतनशील लोगों से ऑनलाईन सुझाव व विचार साझा किये हैं। यह इस कड़ी का तीसरा क्रम है। इस क्रम में एक बेहतरीन वरिष्ठ पत्रकार और न्यूज एंकर आलोक शुक्ला के सुझाव व विचारों को दर्शाया गया है।

उन्होंने अपने चिर-परचित अंदाज में इस विषय से संबंधित विचारों का आगाज किया-
यूँ हमारे बढ़ते कदमों पर पड़ी हैं बेड़ियाँ।
जैसे धरा को मिटाने की सजा मिली हो।।
उन्होंने कहा कि आज पूरा विश्व घरों में कैद है, प्रगति का वो मानव रूपी मशीनी पहिया, बिना थके बिना रुके निरंतर कोलाहल करते हुए दौड़ रहा था, लेकिन इस महाविषाणु ने एक बड़ा परिवर्तन विश्व के समक्ष रख दिया है। प्रकृति साफ-सुथरी हो चुकी है, मानव को कुछ नया सोचने और अब नया करने की बारी है। खुद को बदल कर ही हम इस धरा में इन अदृश्य महाशत्रुओं के खिलाफ जंग जीत सकते हैं, भविष्य में निर्भय रह सकते हैं। एक बड़े परिवर्तन के बारे में पहले क्रम में समाजशास्त्री अलका जी ने काफी विस्तृत वर्णन कर ही दिया है जो वाकई अब व्यवहारिक रूप से प्रयोग में लाने योग्य है। इसके अलावा एक अन्य विषय पर ध्यान केंद्रित करना चाहूँगा, जिसकी तरफ अब सबको ध्यान देना ज़रूरी है।
कारखानों, कई उद्योग धंधों का कचरा तथा सीवर का पानी नदियों में गिराने की परंपरा पूर्णतः बंद कर अब नयी परंपराओं को गढ़ना पड़ेगा। जिस कारखाने या उद्योग धंधे से ये वेस्टप्रोडक्ट निकलते हैं, उन्हें उत्पादनकर्ता अपने या किसी सहयोग के माध्यम से रीसाईकिल कराकर उसका पानी खुद के लिये पुनः इस्तेमाल कर सकते हैं। एक विकल्प यह भी कि नदियों या तालाबों में इस पानी को भेज सकते हैं या सूखे कूड़े का उपयोग भी किसी न किसी काम में आता ही है उसका भंडारण करके उसके उपयोग पर वैज्ञानिक चर्चाएं की जा सकती हैं। सीवर के पानी को नदियों व तालाबों में गिरने से बचाने के लिये सरकार को आगे आना चाहिए। इसके पानी को रिसाईकिल कराकर ही नदियों या तालाबों में भेजना चाहिए। पर्यावरण शुद्ध करने के लिये यह भी जमीनी कार्रवाई का सबसे अहम् हिस्सा है। नदियाँ, तालाब स्वस्थ होंगे तो बहुत सी चीजें प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से स्वस्थ होंगी। यह कार्य भी सख्ती पूर्वक कराने होंगे। मानव स्वास्थ्य से संबंधित जो भी चीजें हैं, चाहे वो खाद्य हों, पर्यावरण, खेती आदि, इन सबकी बेहतरी के लिये सख्त नीतियाँ बनानी व अपनानी होंगी। कैंसर के मरीजों की संख्या का ग्राफ अचानक कैसे बढ़ता चला गया और न जाने कितनी मौतें इसी के चलते हो जाती हैं, हो रही हैं। यह रोग इतना महँगा है कि इसमें गरीबों की ही अधिकतर जान जाती है व मध्य वर्ग के सदस्यों की जान और जीवन भर एकत्रित किया गया धन दोनों चले जाते हैं जिससे कई कर्जदार पैदा हो जाते हैं। 90 प्रतिशत कैंसर के मरीज अपना ईलाज नहीं करा पाते। इस रोग से तो कई बड़ी-बड़ी दिग्गज हस्तियाँ भी करोड़ों रूपये खर्च कर खुद को बचा नहीं पातीं। इरफान ख़ान और ऋषि कपूर की दुखद मृत्यु इसका ताज़ा उदाहरण है।
कैंसर की तरफ भी सरकार का ध्यान कब गया? विज्ञापन में अरबों रूपये बर्बाद कर दिये जाते हैं कि गुटखा, तंबाकू व सिगरेट से कैंसर होता है। किंतु इसके उत्पादन को बंद करने की किसी ने कोई संवेदना नहीं दिखाई क्योंकि इससे उनके राजस्व में प्रत्यक्ष लाभ दिखाई देता है। लेकिन परोक्ष रूप से होने वाली महाहानि न किसी सरकार को दिखती और न ही हमारे माननीय न्यायालय को! यूपी में बहुत पहले तंबाकू गुटखा बंद हुआ, तो कंपनी ने तुरंत ही गुटखा सादा बनाकर तंबाकू अलग से देने की प्रक्रिया अपनायी और तंबाकू गुटखा न्यायालय को मुँह चिढ़ाते हुए बाजार में खिलखिलाने लगा। आईसीएमआर के आंकड़ों के अनुसार तंबाकू से होने वाले रोगों के कारण प्रतिदिन 3500 जानें जाती हैं।
कैंसर रोगियों की संख्या भारत में ही 25 लाख से ऊपर हो चुकी है। प्रतिवर्ष 7 लाख से अधिक नये मरीज कैंसर के तैयार होते हैं और लगभग साढ़े पाँच लाख से अधिक मरीजों की जान चली जाती है। बमुश्किल ही ईलाज के बाद भाग्य भरोसे कैंसर का मरीज बच गया तो बच गया। भारतीय मेडिकल काउंसिल का अनुमान है कि 2020 में कैंसर से प्रभावित लोगों की संख्या में 25 प्रतिशत का इज़ाफा हो जाएगा। एक बेहतर भारत के लिये सरकार को कोरोना के जैसे ही इन तमाम असाधारण बीमारियों के प्रति भी सक्रियता व संवेदनशीलता दिखानी होगी।
कैंसर के सबसे बड़े कारण हैं- तंबाकू, शराब, जंक फूड, शारीरिक गतिविधियों में कमी, दूषित पर्यावरण, ट्यूमर या कैंसर से जुड़े संक्रमण आदि। ये सभी कारण हमारे यहाँ बहुत फल-फूल रहे हैं। यही कारण लोगों में प्रतिरक्षा तंत्र के भी सबसे बड़े दुश्मन भी हैं। प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर हुआ तो शरीर में सभी रोगों के आमंत्रण का आगाज़ हो जाता है।
मिलावटख़ोरी बाज़ारों में सिर उठाकर बोलती है लेकिन कानून बने होने के बावज़ूद मिलावटख़ोरों का कुछ नहीं होता। यहाँ तक दूध, घी और खाद्य सामग्रियों में मिलावट का कोई विरोध नहीं होता। फलों में हानिकारक केमिकल का प्रयोग लगभग एक-दो दशक से हो रहा है पर इन मिलावटख़ोरों को किसी का भय नहीं। इनसे न जाने कितनी पीढ़ियाँ बर्बाद हो रही हैं। इस पर शायद ही कोई व्यवहारिक रूप से संवेदनशील दिख रहा हो।
कोरोना जैसी विश्वव्यापी महामारी के चलते अब सरकार को चिकित्सीय सुविधाओं की ओर अधिक ध्यान देना पड़ेगा। हाईस्कूल स्तर से प्राथमिक चिकित्सा की व्यवहारिक जानकारी सबके लिये अनिवार्य कर देनी चाहिए। कोरोना की वैक्सीन आने के बाद भी सामान्य हालात होने में कुछ साल तो ज़रूर लग जायेंगे लेकिन इसके लिये हमें ख़ुद को सचेत रखते हुए बहुत से परिवर्तन करने पड़ सकते हैं। समय-समय पर जारी सरकारी गाईडलाईन का पालन सर्वहित के लिये करना ज़रूरी होगा। ऑनलाईन मार्केटिंग व डिजिटलाईजेशन के प्रयोग में सक्रियता की बहुत ज़रूरत है। अस्पतालों, उच्च शिक्षा व उद्योगों के केंद्रीकरण से बचाव की ज़रूरत है। अब कोई एक शहर इनका हब न बनने पाये।
लगभग-लगभग सभी ज़िलों में ऐसी व्यवस्थाएं तैयार करनी होंगी। जिससे भविष्य में आने वाले ख़तरे से भी निपट सकें और कई अन्य समस्याओं से भी बच सकते हैं। यह जो दौर है , उसमें साधारण सा फ़्लू भी लोगों को इतना भय दे देगा कि अपने और अपनों के बीच संदेह की स्थिति बनी रहेगी। कोरोना का भय कोरोना के जाने के बाद भी बना रहेगा क्योंकि कोई भी वायरस मरता नहीं है। हाँ! निष्क्रिय ज़रूर हो जाता है। इस वजह से लोगों में भय का वातावरण सदा बना रहेगा क्योंकि साधारण फ्लू तो हर सीज़न में हर किसी को होता ही रहता है। अब ज़िन्दगी सामान्य सी नहीं होगी। भय का भूत सदा साथ रहेगा जब तक कि ये वायरस पूरे विश्व से जड़ से समाप्त नही हो जाता है। ऐसे में लोगों को अपना प्रतिरक्षा तंत्र मज़बूत करने के लिये हर विकल्प अपनाने होंगे।
उन्होंने कहा कि अंत में यही कहना चाहता हूं कि कोरोना वायरस ने हमें एक अच्छा अवसर दिया है कि हम कही किसी जगह, किसी विचार पर एक साथ अब सहमत हो जाए। अब सारी मानव सभ्यता को ये मान लेना चाहिए कि अगर हमारी धरती की सांस मे ज़हरीली हवा ना होके सिर्फ ऑक्सीजन बनी रहेगी तभी हम भी बने रहेंगे। ये सृष्टि है और इसके पास दोनों तरह की खूबियां हैं – सृजन भी और विनाश भी। चुनाव अब आप ही कीजिए कि आपको अपनी आने वाली पीढ़ियां खुले आसमान और हरे-भरे मैदानों के बीच चाहिए या शीत युग की तरह किसी एकांत छोटे से कमरे में सिमटी हुई ज़िदंगी चाहिए। अब आप ही फ़ैसला कीजिए।
जारी…..
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