सनातन धर्म की पावन परंपरा में कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थान एकादशी के रूप में मनाया जाता है, जब भगवान विष्णु चार माह की चतुर्मास निद्रा से जागृत होते हैं। पुराणों के अनुसार भाद्रपद शुक्ल एकादशी को शंखासुर वध के बाद थके भगवान क्षीरसागर में शेषनाग शय्या पर विश्राम को चले गए थे और ठीक चार माह बाद इसी तिथि को वे गहन निद्रा से उठते हैं। इस अवधि में कोई मांगलिक कार्य नहीं होता, लेकिन देवोत्थान के साथ ही विवाह, गृहप्रवेश जैसे शुभ कार्यों का श्रीगणेश हो जाता है। मान्यता है कि इस दिन से गृहस्थों के घरों में सुख-संपन्नता और खलिहानों में नई फसल की बहार लौट आती है। इसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहते हैं और यह भगवान विष्णु को पूर्णतः समर्पित होती है।

इस पवित्र व्रत का विधान अत्यंत फलदायी माना गया है। शास्त्र कहते हैं कि देवोत्थान एकादशी का व्रत हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञों के बराबर पुण्य देता है। इससे पाप नाश होते हैं, पितृदोष दूर होता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। प्रातः संकल्प लेकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पंचोपचार या षोडशोपचार पूजा की जाती है। पीले पुष्प, तुलसी दल और नैवेद्य अर्पित कर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र जप या विष्णु सहस्रनाम पाठ शुभ फल देता है। रात्रि में आरती के बाद दीपदान होता है और अगले दिन पारण से व्रत पूर्ण होता है।
देवोत्थान के अगले दिन शालिग्राम-तुलसी विवाह की अनूठी परंपरा निभाई जाती है। पुराण कथा के अनुसार राक्षस जालंधर की पत्नी वृंदा के पतिव्रत धर्म से वह अजेय था। देवताओं की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने उसका रूप धारण कर वृंदा के सतीत्व को भंग किया, जिससे जालंधर मारा गया। क्रोधित वृंदा ने विष्णु को पत्थर बनने का शाप दिया और स्वयं सती हो गई। भगवान ने वृंदा को तुलसी रूप में जन्म का वरदान दिया और स्वयं शालिग्राम बने। तभी से यह विवाह संपन्न होता है। निःसंतान दंपत्ति को कम से कम एक बार यह पुण्य अवश्य करना चाहिए, क्योंकि इससे कन्यादान का फल मिलता है।
विवाह विधि में शंख-घंटी-मृदंग के मंगल ध्वनियों के बीच भगवान को जगाने हेतु यह श्लोक पढ़ा जाता है, उत्तिष्ठो उत्तिष्ठ गोविंदो, उत्तिष्ठ गरुड़ध्वज, उत्तिष्ठ कमलाकांत, जगताम मंगलम कुरु। सनातन आराधना में बंधन नहीं, इसलिए क्षेत्रीय भाषाओं में मंगल गीत गाए जाते हैं। कहीं गाया जाता है, उठो हे देव, बैठो हे देव, उंगलियां चटकाओ देव, पर भाव एक ही, जागो हे भगवान, जगत का कल्याण करो।
इस वर्ष पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि 1 नवंबर शनिवार सुबह 9 बजकर 11 मिनट से प्रारंभ होकर 2 नवंबर रविवार सुबह 7 बजकर 31 मिनट तक रहेगी। चूंकि 1 नवंबर को पूर्ण दिवस एकादशी है, इसलिए व्रत-पूजन इसी दिन श्रेष्ठ माना गया है। घरों में तुलसी पूजन, दीपदान और मंगल गायन की तैयारियां जोरों पर हैं, क्योंकि इसी दिन से शुभ कार्यों का नव सत्र प्रारंभ होता है।
प्रस्तुति : नीतू सिंह






