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    Home»धर्म

    ईस्टर : मृत्युंजयी येसु अर्थात पुनरुत्थान पर्व और भारतीय सनातन धर्म

    By April 1, 2018Updated:April 1, 2018 धर्म No Comments12 Mins Read
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    लालबाग़ एपीफेनी चर्च से रविवार को निकाला गया ईस्टर का जुलूस।
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    ख्रीस्तीय विश्वास का सबसे उच्च बिंदु मृत्युंजयी येसु की आराधना है। इसलिय ईस्टर पर्व का महत्त्व मसिहियों के लिए क्रिसमस से कही अधिक है। यद्यपि यहूदी  धर्म ग्रन्थ मसीह के विषय स्पष्ट  भविष्यवाणी करते हैं और येसु एवं उनके आरम्भ के सभी अनुयायी यहूदी थे, फिर भी यहूदी येसु को मसीह या मुक्तिदाता नहीं मानते। वहीँ इस्लाम येसु मसीह के क्रूस पर बलिदान, उनके पुनरुत्थान और परमेश्वर के पुत्र होने के तीन बिन्दुओं के अलावा बाकी सभी बातों में ख्रीस्तीय आस्था से सहमत है।

    प्राचीन भारतीय ख्रीस्तीय परंपरा

    भारत का ख्रीस्तीय इतिहास लगभग उतना ही प्राचीन है जितना कि ख्रीस्तीय विश्वास है। येसु ख्रिस्त के चुने हुए 12 शिष्यों में से एक संत थोमा भारत में आये। उस समय दक्षिण-पश्चिम भारत के तटीय नगरों में यहूदियों की बस्तियां थीं जो मूलतः व्यापार में संलग्न थे। वे संत थोमा के संपर्क एवं माध्यम बने। संत थोमा कोई लिखित धर्मपुस्तक लेकर नहीं आये थे। संत थोमा  ने कभी भी धर्म परिवर्तन  के लिए किसी को नहीं कहा, उन्होंने केवल येसु मसीह के उपदेशों, अदभुत दैवीय शक्ति और करुणा, येसु के जन्म, जीवन, बलिदान और पुनरुत्थान, पापों से मुक्ति, और पुनः आगमन का प्रचार किया। इस प्रेम और मुक्ति के सन्देश को, निरंतर नया सीखने और उचित को आत्मसात करने संस्कृति के अनुरूप आरम्भ में अनेक पंडितों एवं सामंतीय वर्ग के कुछ सुजनों ने उनके सन्देश को स्वीकार किया। कुछ अतिवादी व्यक्तियों ने सत्य से भिज्ञ न होने की अवस्था में संत थोमा पर प्राणघातक हमला किया और संत थोमा ने अपनी प्राण आहुति मैलापोर में दी. उनकी कब्र आज भी चेन्नई में स्थित है. उनके शहादत के पश्चात उनके अनुयायियों ने उनके संदेशों को स्मरण और संकलन का प्रयास किया। तत्पशात संत बर्थोल्मेओ, मत्ती की गोस्पेल को लेकर आये और लगभग 300 वर्षों तक भारत के मसीहियों  के पास मत्ती  की गोस्पेल और संत थोमा के उपदेशों के संकलन ही ख्रीस्तीय विश्वास  के आधार थे।

    संत थोमा के भारत आगमन, शिव उपासना के केंद्र दक्षिण भारत को अपना कार्य क्षेत्र  चुनने के पीछे एक परंपरा येसु मसीह के अपने जीवन के 13 से 30 वर्ष के मध्य व्यापारी कारवां के साथ भारत आगमन और यहाँ  के धार्मिक गुरुओं के साथ साहचर्य और उत्तर भारत बताता तिब्बत में भ्रमण के दौरान भारतीय दर्शन और धर्म के ज्ञान की है, जिसे खोजी लेखक गत 200 वर्षों से उठाते रहे हैं. यद्धपि यह अवधारणा पूर्णतः प्रमाणिक नहीं है, फिर भी प्रस्तुत साक्ष्यों एवं येसु के कथनों की तुलनात्मक विवेचना के सन्दर्भ में इसे पूरी तरह मनगढ़ंत कहना भी न्यायोचित नहीं होगा। “येसु के भारतीय संबंध” रिसर्च का एक उचित विषय बनता है. हमें गर्व है की भारत की प्राचीन ख्रीस्तीय  परम्परा यूरोप  के कई देशों से अधिक पुरानी और शुद्ध है जिसमे ग्रीक और लैटिन दर्शन का न्यूनतम मिश्रण है।

    भारतीय ख्रीस्तीय परंपरा और ऑर्थोडॉक्स चर्च

    325 इसवी में काउन्सिल ऑफ़ निकिया ने संत थोमा  से जुड़े गोस्पेल और ऐसे 800 से भी अधिक पुस्तकों को रिजेक्ट करते हुए 27 प्रमाणिक पुस्तकों को चुना जो बाइबिल के नए नियम या न्यू टेस्टामेंट के रूप में संकलित हैं। परन्तु इसके बाद भी संत थोमा से जुडी कुछ पुस्तकें भारतीय मसीहियों में आंशिक रूप से प्रसारित होती रहीं।

    आदि भारतीय मसीही मूलतः केरल और तमिलनाडु एवं मुम्बई के आसपास के क्षेत्र तक सीमित थे और उनमे कुछ यहूदी , ग्रीक और बाकी शिव भक्त सनातनी थे जिन्हें येसु ख्रीस्त को अराध्य देव स्वीकार करने में कुछ संकोच नहीं था। क्यूंकि उनके लिए येसु ख्रीस्त महादेव या बलिराजा के मानव रूप में पूज्य प्रकाशन थे। परन्तु जैसे जैसे येसु आराधकों की संख्या दिनोदिन बढती गयी उनमे आवश्यकता के अनुरूप संस्कार, उपासना विधि और संगठन विकसित हुए और उनके सम्बन्ध ईशा पश्चात चौथी शताब्दी में पर्सियन क्रिस्टियन्स के साथ औपचारिक रूप से जुड़ गए और कालांतर में भारतीय ख्रीस्तीय  समूह सीरिया, अलेक्सेन्ड्रिया के ऑर्थोडॉक्स क्रिस्तिंयंस साथ जो  रोमन कैथोलिक या पाश्चात्य चर्च से पृथक हो गए थे का अभिन्न भाग हो गए। भारतीय ख्रीस्तीय  समूह बाहर के क्रिस्टियन्स से सम्बन्ध का असर संस्कारिक और प्रशासनिक और धर्म सिद्धातों के पालन पर हुआ. ऑर्थोडॉक्स चर्च में धर्म सिद्धांत के भिन्न भिन्न व्याख्याओं  के आधार पर कलीसियाई  विभाजन का दुष्प्रभाव  भारत के मसीह विश्वासियों  पर भी पड़ा और एक से अधिक ओर्थोदोक्स चर्चेस भारत में भी हो गए।

    येसु भक्ति जो एक विश्वास  मात्र था वो एक अलग धर्म में परिवर्तित होता गया जिसके फलस्वरूप ख्रीस्तीय  समाज और उनके आस पास रहने वालों  के मध्य वैचारिक और धार्मिक दूरियाँ भी बढ़ने लगीं. फिर भी प्रथम यूरोपीय पुर्तगाली कैथोलिक क्रिस्टियन्स के आने तक अर्थात पहिले 1400 वर्षों तक भारतीय ख्रीस्तीय बिश्वासी भारत के मूल समाज के निकट बने रहे। उनमे आपस में शादी विवाह और सामाजिक अवसरों पर मेलजोल, उपासना पद्धति, पहनावा, खान पान, भाषा,  रीती रिवाज में समानता और सामजस्य बना रहा. उनकी उपासना पद्धति और संस्कार अपने पूर्वजों के रीती रिवाजों के एवं विभिन ऑर्थोडॉक्स ख्रीस्तीय  परम्पराओं का रुचिकर मिश्रण थे. आज भी दक्षिण भारतीय ख्रीस्तीय  अपने पड़ोसियों से सांस्कृतिक एवं रहन सहन में उत्तर भारतीय क्रिस्टियन्स से अधिक निकट हैं।

    पशिमी ख्रीस्तीय परंपरा एवं मिशनरी सेवा

    भारतीय मसीहियत का रूप पश्चिमी देशों के धर्म प्रचारकों के आगमन से तेजी से बदला.  मिशनरीज ज़रूरी नहीं की वे ब्रिटिश हुकूमत के पक्षधर हों; वस्तुतः अनेक मिशनरी भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में कांग्रेस के साथ खड़े थे. मिशनरीज सिर्फ धर्म प्रचार में ही नहीं बल्कि उन्होंने पाया की अंग्रेजी हुकूमत आम भारतीय के शिक्षा और स्वास्थ्य और विकास के प्रति उदासीन थी. इसीलिए उन्होंने शिक्षा और स्वास्थ्य का बीड़ा उठाया. इस दृष्टि से उनका योगदान सराहनीय है. परन्तु चाहे कैथोलिक या प्रोटेस्टेंट दोनों ही समूह के मिशनरीज पाश्चात्य सभ्यता की श्रेष्ठता की धारणा से प्रभावित थे. अधिकाँश मिशनरीज ने धर्म परिवर्तन के बाद ही किसी को ख्रीस्तीय या चर्च की सदस्यता के योग्य माना। यह धारणा आरंभिक भारतीय ख्रीस्तीय  प्रचार से भिन्न थी, जिसमे हृदय परिवर्तन और प्रभु येसु  में आस्था पर ही जोर था। इस तरह बप्तिस्मा अर्थात स्नान या प्रक्षालन जो मूल रूप से पापों की क्षमा और येसु को प्रभु स्वीकार करने का सरल संस्कार था, जैसा की भारतीय परंपरा में निहित है वह धर्म परिवर्तन का प्रतीक बन गया. पश्चिमी धर्म वैज्ञानिक तथा कलीसिया के संगठित सोच में कोई अन्य धर्मावलम्बी के अपने ही धर्म में रहते हुए येसु के अनुयायी होने की संभावना को सामान्यतः नकारते हैं।

    यह सोच चर्च के विस्तार में रुकावट रहा है, क्यूंकि मसीह पर विश्वास सामाजिक पृथक्कीकरण से जोड़ दिया जाता है। पश्चिम मसीही सोच में मसीह में आस्था के साथ ही साथ चर्च के नियमों के परिपालन को महत्त्व दिया जाता है। यद्यपि  आरंभिक मसीहियों ने यहूदी धर्म शास्त्र को अपनाया और ख्रीस्तीय बनने के बाद भी उसे अपना धर्म शास्त्र माना परन्तु भारतीय मसीही सामान्य तौर से अन्य धर्मों के धर्म पुस्तक से अनिभिज्ञ हैं। प्राचीन मसीहियों ने यहूदी और रोमन त्योहारों को अपना लिया और उन्हें मसीही बिश्वास से जोड़ दिया जिनमे, क्रिसमस और ईस्टर प्रमुख हैं। परन्तु भारतीय सन्दर्भ में इस दिशा में अब तक कोई ठोस पहल होना बाकी है।

    आज भारतीय मसिहियत मूलतः 4 धाराओं में पायी जाती है। पहली ऑर्थोडॉक्स विचारधारा जो पुर्वीय है और भारत में प्राचीनतम है, जिसका ऊपर उल्लेख है। दूसरी कैथोलिक विचारधारा है जो मूलतः यूरोपियन है और बाइबिल के सैद्धांतिक व्याख्या में यूनानी दर्शन व चर्च की लातिनी परम्परा का विशेष प्रभाव है। यह प्रभाव रीती रिवाज़, धार्मिक कला, अनुष्ठान और त्योहारों के मनाने के तौर तरीकों में स्पष्ट तौर से झलकती है। कैथोलिक चर्च के प्रमुख  धर्मपिता वेटिकेन के बिशप पोप हैं. तीसरी धारा में प्रोटोस्टेंट चर्चेस  हैं, जो मूल रूप में कैथोलिक चर्च में सुधार आन्दोलन से उत्पन्न स्वतंत्र समूह हैं. ये आपस में संस्थागत स्वत्रंत होते हुए भी अधिकान्स्तः विश्वास  की एकरूपता में हैं. दक्षिण में चर्च ऑफ़ साउथ इंडिया और उत्तर में चर्च ऑफ़ नार्थ इंडिया क्रमश: सन 1948 और 1070 में 6-7 कलिसियायें के एकीकरण से अस्तीत्व में आये। इन दो यूनाइटेड चुर्चेस के अलावा, मेथोडिस्ट चर्च इन इंडिया, लूथारन, बैप्टिस्ट तथा प्रेस्ब्रेतारियां चुर्चेस प्रमुख हैं. उपरोक्त तीनो ख्रीस्तीय  धाराओं में धर्म विज्ञान के अध्ययन और चर्च के संगठनात्मक रूप तथा निर्धारित अराधना विधि के उपयोग को महत्व दिया जाता है।

    चौथी ख्रीस्तीय धारा वास्तव में प्रोतास्तंत की ही उप शाखा हैं जिन्हें पेंतिकोस्तल या कैरिस्माटिक कहा जाता है। संगीतमय स्वतंत्र आराधना एवं पवित्र आत्मा के लक्षण एवं वरदानों पर जोर  रोगियों की चंगाई, दुस्तात्माओं से मुक्ति और अन्यान्य भाषाओँ में बोलने तथा गवाही देने और अपनी आस्था के निर्भीक प्रचार के फल्सस्वरूप ये चर्चेस अतिवादी हिन्दुओं के विरोध के ज्यादा निशाने पर रहते हैं। असेंबली ऑफ़ गाड जैसे कुछ चर्चेस को छोड़ अधिकांश कलिसियायें स्थानीय स्वतंत्रता को पसंद करती हैं।

    ख्रीस्तीय बिश्वास और सनातन धर्म

    वास्तव में एक सच्चे सनातनी को इस बात से कोई परेशानी नहीं होना चाहिए की ख्रीस्तीय लोग चाहे वे किसी भी ख्रीस्तीय  डेनोमिनेशन से हों, और वे क्या विश्वास  करते हैं. क्योंकि सनातन विचारधारा मुक्ति के किसी एक मार्ग को नहीं, बल्कि परस्पर विरोधाभासी विचार जैसे की, दक्षिण में शैविय और उत्तर में वैष्णव, निर्गुण या सगुन, त्रिदेव या अनेक देवी और देवता, द्वैत या अद्वैत, बुधिस्म, जैनिज़्म, कबीरपंथी, रामाक्रिशन मिशन, हरे कृष्णा, ब्रह्मा समाज और आर्य समाज, सिख और यहाँ  तक की साईं और सत्य साईं आदि को अपने में समेटे हुए है।

    ख्रीस्तीय विश्वास का विरोध इसलिए भी अनुचित है क्योंकि ख्रीस्तीय  विश्वास  में ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी न किसी रूप में सनातन परम्परा में पाहिले से ही विद्यमान न हो। अनेक मसीही भारतीय धर्म विज्ञानिकों  ने ख्रीस्तीय विश्वास  को हिन्दुत्व की पूर्णता कहा है. पहिले 1400 वर्षों में जब ख्रीस्तीय  विश्वासियों  को उनके पड़ोसियों ने मुख्यधारा का ही अंग माना तो अब उस मूल विचार में बदलाव क्यों? इस विषय में मेरा अपना सोच है की जब तक पशिमी देशों के लोगों का भारत में आगमन नहीं हुआ उस समय तक भारत की ख्रीस्तीय मण्डली का स्वरुप भारतीय संस्कृति  के समरूप होने से ख्रीस्तीय लोग भारतीय इन्द्रधनुषीय समाज का ही अभिन्न अंग बने रहे। लेकिन यूरोपीय  व्यापारिओं ने भारत में आकर व्यापार के साथ जब धर्म प्रचार करना और उससे भी अधिक भारत पर राज्य करने का इरादे से बसना आरम्भ किया, तब क्रिश्चियनिटी स्वदेशी से विदेशी का प्रतीक बन गयी।

    भारत में सकारात्मक सोच के इस विपरीत बदलाव की एक वज़ह क्रिश्चियनिटी को पश्चिम्परत मानना है। यूरोपीय आक्रान्ताओं के प्रति घृणा की चपेट में भारतीय क्रिस्तिय भी आ जाते हैं। भारतीय क्रिस्टियन्स को परेशां करने वाले यह भूल जाते हैं की वे जिन्हें नुक्सान पहुंचा रहे हैं वे भी उसी माँ की औलाद हैं। क्या एक मा के 4 संताने हैं तो वे सब एक ही से दिखते हैं? या एक ही रंग व डिजाईन  की पोशाक पहनते और एक ही किताब पढ़ते और एक ही सा व्यसाय करते हैं? यदि ऐसा नहीं तो जब परिवार में ही विविधता होती है  और वो स्वीकार्य है तो फिर भारत माँ के बेटे बेटियों को यह आजादी क्यों नहीं?

    जब सनातन धर्म की परंपरा में ही विभिन्न मतों और आस्थाओं को स्थान दिया गया है तो फिर उदारता में संकोच कैसा? क्या संकीर्णता सनातन परम्परा का उपहास नहीं? इस गलत अवधारणा को हवा देने में कुछ लोग स्वार्थवश धर्म और जाती के नाम पे बाँट कर देश की सहिष्णुता  को कमज़ोर करने से नहीं चूकते। ऐसे लोग विकृत सोच और स्वार्थसिद्धि के गुलाम हैं। ये ही लोग चुर्चेस में तोड़फोड़ करते हैं और धर्म्सेव्कों को मारते हैं। इन्हें कानून का भय  नहीं होता क्योंकि कई बार क़ानून के रखवालों का भी वो ही दूषित सोच होता है जो कानून के तोड़नेवालों का होता है. सत्य को दमन करके दबाया नहीं जा सकता. मसीही विश्वास  सत्य का ही प्रकाशन है..चाहे वो प्रत्यक्ष रूप में बाकी से भिन्न दिखे..पर वो भिन्नता भी सत्य की पूर्णता का अंश है।

    दूसरा कारण मूल भारतीय ख्रीस्तीय परम्परा से आधुनिक क्रिश्चियनिटी की भिन्नता है। जब तक ख्रीस्तीय अपने पड़ोसियों के मध्य मुख्यधारा के अंग बने रहे, तब तक उन्हें विरोध का न्यूनतम सामना करना पड़ा; परन्तु जब धर्म प्रतिद्वंदिता का प्रश्न बना तो सनातन धर्म पंथियों में से कुछ अतिरेक से ग्रसित आंदोलित हो गए। जैसा आरम्भ में लिखा गया की प्राचीन भारतीय ख्रीस्तीयओं के लिए ख्रिस्त पर विश्वास  एक धर्म नहीं पर आस्था का रूप था और बप्तिस्मा उन्हें समाज से अलग नहीं करता था। वो पहिले जैसे ही मूल समाज के अंग बने रहते थे, बस अराध्य देव और आराधना का स्वरुप परिवर्तन था।

    परन्तु पश्चिमी मसिहियत समराज्यवादी सोच के साथ प्रचारित हुई जिसका लक्ष्य  एक रिलिजन की अन्य स्थापित धर्म पर विजय है और परम्पराओं को चुनोती देते हुए और उन्हें मिथ्या घोषित करता है. यद्यपि बीच बीच  में कई स्वदेशी और मिशनरी  ने भी खुले मन से भारतीय संस्कृति और दर्शन के महत्त्व को माना और ख्रीस्तीय विश्वास  को उसी के अनुरूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया, परन्तु ऐसे अधिकाँश प्रयास  बहु प्रचारित सोच में दब के रह गये. भारत के ख्रीस्तीय  धर्म्विगानिको को इस समस्या का समाधान ढूँढना  नितांत ज़रूरी है. ख्रीस्तीय  विश्वास  को एक रिलिजन की क़ैद से मुक्त कर जीवंत और जीवित विश्वास  और उस पर आधारित जीवन शैली के रूप में स्थापित करना है।

    सनाथन धर्म के प्रवक्ताओं में सर्वश्रेष्ठ, स्वामी विवेकानंद के संदेशों के निष्पक्ष अध्ययन से यह साफ़ है की स्वामीजी नए नियम में वर्णित येसु मसीह के जीवन एवं  शिक्षाओं को तथा उन्हें येसु  को उद्धारकर्ता और ईश्वर पुत्र कहने में कुछ भी असंगत प्रतीत नहीं होता.  क्यूंकि भारतीय सनातन धर्म एक सीमित धारना नहीं बल्कि मुक्ति के अनेकानेक मार्गों का संगम है. इसकी येही विशेषता इसे सहिष्णु और खुले मन से सबका स्वागत करनेवाला समाज बनाती है। सृष्टिकर्ता परमेश्वर, ईश्वर पुत्र  के देह्धारण और जगत के पापों की क्षमा हेतु बलिदान होने के पश्चात मृत्युंजयी  होने, पवित्रात्मा के मानव मन में निवास, मुक्ति, अनंत जीवन और ईश्वर के त्रिएकतव पर विश्वास  यही सार संक्षेप में मसीही विश्वास  है; जिसमे सबसे बड़ी आज्ञा सम्पूर्ण मन से परमेश्वर की भक्ति और अपने पडोसी से प्रेम है। ये सभी तत्व सनातन परंपरा में किसी न किसी रूप में पहिले से ही विद्यमान हैं।

    ईस्टर पर्व हमें पापों की क्षमा, अनंत जीवन की आशा, कभी न हार माननेवाली इच्छाशक्ति और विपरीत परिस्थितिओं में भी ईश्वर पर आस्था का सन्देश देता है, जिससे बड़ी से बड़ी पराजय को विजय में परिवर्तित होने की संभावना बनती है. ईस्टर हमें भौतिकता से ऊपर उठकर सोचने, न्यायोचित आचरण और जवाबदेही की सत्यता तथा सबसे बढ़कर प्रभु येसु  के विराट रूप को बिश्वास से अपने मन में समेत लेने का अवसर प्रदान करता है। ख्रीस्तीय  बिश्वास मात्र एक एतिहासिक व्यक्ति पर नहीं, परन्तु परमेश्वर के करुणामयी प्रकाशन पर है अर्थात अनादी और अनंत प्रभु जो समस्त ब्रह्मांड का स्वामी पाप्मोक्षक प्रेमी मुक्तिदाता है। वोह मृतक नहीं पर सर्वदा जीवित है।

    -सत्यमित्र   

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