मनुष्य का हृदय पवित्र है हम यह कैसे माने?

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वह व्यक्ति धन्य है जिसका मन कलुषित विचारों से शून्य हो। जिसके हृदय में कभी बुरी वासना का प्रवेश नहीं होता, जिसकी वाणी शुद्ध और निर्मल भावों से सदा सनी रहती है।

सचमुच उस पुरुष की कीर्ति महान है। जिसके ओठों से कभी अपवित्र शब्द न निकला हो, जिसकी मानसिक तरंगें सदा दैवीय-ज्योति के समुद्र में लहर मारती रहें, जिसने स्वप्न में भी अश्लील भावना का विचार न किया हो।

आओ, संसार में उस मनुष्य या स्त्री की तलाश करें जो बुराई से बिल्कुल अनभिज्ञ है, जिसके वार्तालाप में पवित्रता का मधुर रस हो, जिसके चेहरे पर दुर्विकारों का एक भी चिह्न न हो, जो सिर से पैर तक पवित्रता की मूर्ति हो। यदि ऐसा पुरुष या स्त्री मिल जाय तो उसके चरणों में सिर धर कर प्रणाम करो। ऐसी ही आत्माओं में ईश्वरीय शक्ति की विभूति है, उन्हीं के विमल प्रकाश से संसार प्रकाशित होता है।

पवित्रता, जीवनादर्श की प्राप्ति का सबसे श्रेष्ठ साधन है। वह मनुष्यत्व का सबसे बड़ा उच्च लक्षण है।

कभी भी अश्लील, गंदे, अपवित्र विचारों को अपने अन्दर स्थान न देना चाहिये। वे विचार उस विषैले साँप की तरह हैं जो यमराज के दूत हैं। जिसके कान में वे पड़ जाते हैं, जहाँ उनका प्रवेश हो जाता है, वहीं तबाही आ जाती है। इसलिए सदा निरोग, शुद्ध, भावों को अपनाना उचित है।

दुर्व्यसनों की आग से बचने के लिये सर्वोत्तम मार्ग यह है कि मनुष्य का हृदय पवित्र हो। यदि हृदय में अश्लीलता भरी हुई है तो वाणी और कर्म से अश्लीलता दूर हो नहीं सकती। हम अंदर की गंदगी को बाहर सुगंधित पदार्थों द्वारा छिपा नहीं सकते। बाहर से यदि कितनी ही लीपापोती कीजिए तो भी अंदर की दुर्गंध फूट कर निकल ही आएगी। कभी न कभी, आप जब सावधान हों, जब आप अकेले में बैठें हुए हों और समझते हों कि वहाँ कोई आपको नहीं देखता हो, रात को स्वप्न में कभी न कभी वह पाप का भूत अपनी डरावनी सूरत दिखला ही देगा।

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