डॉल मेकिंग आर्ट को शिखर तक ले जाने की ज़िम्मेदारी अब युवाओं की होगी: कुसुम गुप्ता

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2002
  • 1982 में मिल चुका है स्टेट अवार्ड 
  • महिलाओं और गरीब घर की लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाया
  • युवा कला के क्षेत्र में अब बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं

लखनऊ, कुसुम जी ने मोतीझील के मालवीय पल्ली में एक छोटे से आशियाने से अपनी कला के सपनों को उड़ान के पंख लगाकर एक कला का म्यूजियम बना डाला, लोग आज भी दूर दूर से इस कला को देखने और सीखने के लिए उनके पास आते हैं। अपने बचपन के इस शौक को कुसुम जी ने एक अलग पहचान दी, डॉल मेकिंग की इस विधा को उन्होंने सेल्फ इम्लॉयमेंट के रूप में विकसित किया। उनके इस प्रयास से कई महिलाएं और गरीब घर की लड़कियां आत्मनिर्भर बनी और इसके माध्यम से कला को नई दिशा मिली, उनकी इस कला को देश नहीं, विदेश तक सराहा गया, कुसुम जी ने इस कला को कलात्मकता से सजीव चित्रित किया और वह आज भी डॉल मेकिंग की इस कला को आधुनिक मूर्त रूप बड़ी खूबसूरती भी दे रही हैं।

हर कला में माहिर हैं कुसुम गुप्ता: 

बचपन से ही कला के प्रति लगाव होने की वजह से उन्हें कई तरह की कला सीखने का मौका प्राप्त हुआ अपनी प्रिय दादी के हाथो बनी कपडे की गुड़िया और मिटटी की गुड़िया बनते देख कर बेहद प्रभावित हुई जिससे उन्हें यह कला प्राप्त हुयी इसके साथ ही उन्हें संगीत के प्रति भी काफी लगाव था इसके बाद लखनऊ आर्ट कालेज से फाइन आर्ट और लखनऊ भातखण्डे से संगीत की शिक्षा ली और इसके बाद भरतनाट्यम में विशारद भी किया लेकिन जो सबसे अच्छा लगा उसे व्यवसायिक तौर पर लिया उनकी बनाई डॉल्स शहर के प्रतिष्ठित शोरूम में आज भी अपनी चमक बिखेर रहीं हैं।

जो भी सीखना चाहे स्वागत है:

डॉल मेकिंग पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने के लिए हर युवा पीढ़ी का स्वागत है बशर्ते वह इस कला को आगे नये आयाम दें। कुसुम जी का मानना है कि प्रत्येक छात्र-छात्रा को अब बहुत धैर्य रखने की आवश्यकता है क्योंकि इसमें भी डॉल सीखने के लिए जीरो से शुरूआत करनी पड़ती है और बाद में सारी चीजें धीरे-धीरे प्रयास करने से आती है यानि डॉल बनाने की खूबसूरती व चमक बाद में निखर कर सामने आ जाती है इस बारे उनका कहना है कि डॉल के परिधान का भी इस बारे में विशेष ध्यान रखना पड़ता है जिसके बाद डॉल सीखने की कला में निपुड़ता आ जाती हैं।

दादी से सीखा हुनर: 

मैंने यह कला अपनी दादी नथिया देवी से सीखी, तब मैंने यह सोचा भी नही था कि एक दिन यही कला मेरे लिए ही नहीं वरन अन्य महिलाओं के लिए शशक्तिकरण का माध्यम बनेगी। लोग इसको सिख कर अपना जीवन यापन भी कर रही है इसके साथ महिलायें एवं अन्य छात्राएं डॉल बनाने की कला सीखकर इसका लाभ ले रही हैं। और अब मै नई पीढ़ी से यही कहना चाहती हुई कि वह इस कला को सीख कर घर न बैठे इसे परस्पर आगे बढ़ाते रहे और इसमें नए प्रयोग करते रहे ताकि यह डॉल आधुनिक जीवन शैली में भी अपनी पहचान बयाये रखें।