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    Home»इंडिया

    यूपी में उभरती नयी ताकत

    jetendra GuptaBy jetendra GuptaMay 9, 2019Updated:June 1, 2025 इंडिया No Comments6 Mins Read
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    Post Views: 1,210
    राहुल कुमार
    दिल्ली के सिहांसन में अहम भूमिका निभाने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में इस बार के लोकसभा चुनाव में स्थितियाँ बड़ी रोचक बन रही है। बड़े-बड़े मीडिया की नजर बड़े-बड़े दल की ओर इनायत है किन्तु यहाँ कुछ ऐसा भी है जो कई सर्वे को चौंकाने वाला साबित हो सकता है। हाँ! बिहारी लाल जी का एक दोहा यहाँ चरित्रार्थ होने वाला है। “…देखन में छोटन लगत घाव करे गंभीर..”।
    इस चुनावी महासमर के दो चक्रव्यूह और बचे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में जहाँ मोदी लहर के चक्रवात में सब दल धराशायी हो गये वहीं मिशन 2019 में मोदी लहर का जादू भी जुमलों की भेंट चढ़ रहा है। इस महासमर में जातिवाद ही पुनः एक बड़े अस्त्र के रूप में कार्य कर रहा है। राजनीतिक दल इससे भली-भाँति वाक़िफ हैं। प्रदेश में जातियों के गणित और समीकरण की क्लासेज बहुत पहले से शुरू हो गयी थी। हर राजनीतिक दलों में चाणक्यों की महती भूमिका भी रहती है। पर किसी एक को ही चन्द्रगुप्त मौर्य मिल पाता है, जो सत्ता पर काबिज होता है।
    उत्तर प्रदेश में पिछड़ी और अतिपिछड़ी जातियों की संख्या सर्वाधिक है जिनमें कुशवाहा, मौर्य, शाक्य, सैनी समाज का प्रतिशत सर्वाधिक है, लगभग 14 प्रतिशत। यादव 9 प्रतिशत फिर पटेल, निषाद, प्रजापति, सविता, पाल आदि। उसके बाद दलित 21 प्रतिशत और मुस्लिम 18 प्रतिशत हैं। भारत की आजादी के बाद से नब्बे दशक के पहले तक उत्तर प्रदेश में यह सब कांग्रेस के मूलभूत वोट थे।
    अस्सी-नब्बे के दशक में एक नायक उभर कर प्रदेश की जनता के सामने आया। जिसने प्रदेश में धरतीपुत्र मुलायम सिंह के नाम से ख्याति पायी। किसानों, मजदूरों, व्यापारियों, शिक्षकों का वो नायक कहलाया जाने लगा।
    धीरे-धीरे इनके द्वारा स्थापित दल सपा को परिवारवाद और एक विशेष जाति के वर्चस्व के लिये ही जाना जाने लगा। इसी के समानानंतर  प्रदेश में एक और राजनीतिक दल मजबूती की ओर अग्रसर था जिसमें दलितों और अतिपिछड़ों ने महती भूमिका निभाई। यह राजनीतिक दल था बसपा। किन्तु जब यह दल पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता में आया तब से बसपा में भी मनुवादी ताकतों का वर्चस्व हो गया और यह वंचितों, शोषितों, पिछड़ों और दलितों के हक की लड़ाई से इसने खुद को अघोषित रूप से बाहर कर लिया।
    अब अतिपिछड़ी जातियों का मोह बसपा से भी भंग हो चुका है। पिछले लोकसभा में करारी शिकस्त के बाद बसपा सुप्रीमो ने प्रेस कान्फ्रेंस में भावावेश में आकर पूरे मुस्लिम समुदाय के लिये यह कह दिया कि “वो विश्वास के पात्र नहीं हैं। गद्दार हैं।”
     मुस्लिम समुदाय शायद ही इस बात को भूल पाया हो, वो तैयार है अपने मत के हथियार से अपने अपमान का बदला लेने के लिये!
    वहीं सपा शासन में मुस्लिमों की बेहतरी के लिये कई योजनायें बनीं किन्तु बेहतर तरीके से वो आम मुस्लिम तक नहीं पहुंच पायीं। केवल मंत्रियों व विधायकों के खास लोगों को ही कुछ लाभ मिल पाया। इस शासन में कई स्थानों में एक खास बिरादरी की गुंडागर्दी से मुस्लिम भी त्रस्त रहे। अतः मुस्लिम भी एक नये विकल्प की तलाश में है।
    यूपी में काँग्रेस के साथ जन अधिकार पार्टी व अपना दल (कृष्णा पटेल )का जो गठबंधन तैयार हुआ है उससे काँग्रेस में मजबूती आ चुकी है और इस मजबूती को प्रियंका गाँधी के तूफानी दौरों ने और मजबूत किया है।
    जिससे वंचितों, शोषितों, अतिपिछड़ों, दलितों और मुस्लिमों में पुनः अपने पुराने घर की ओर आकर्षण बढ़ने लगा है।
    अपनी कमियों को जनता की नजरों से नजरअंदाज करने के लिये सपा-बसपा को गठबंधन का सहारा लेना पड़ा। लेकिन मुस्लिम और अतिपिछड़ा जाग चुका है अपने सम्मान और अधिकार के लिये।
    यूपी की राजनीति में लाल रंग जहां राजनीतिक गलियारों व राजनीतिक पंडितों के लिये रोचक बना है, वहीं गरीबों, पिछड़ों, मजदूरों, किसानों, अल्पसंख्यकों और दलितों के दिलों में उम्मीदें भी जगा रहा है, पुनः हक व सम्मान के साथ जीने के लिये।
    आजादी और आपातकाल के बाद यूपी में पहली बार ऐसा नजारा है कि एक बेमिसाल जनसमुदाय भावुकता के साथ ‘जाप’ के लाल रंग में सराबोर हो रहा है। भावुकता इसलिये भी कि कहीं न कहीं इस सौम्य लाल क्रांति के जनक को पिछड़ा होने का मूल्य चुकाना पड़ा। सामंतवाद के चलते राजनीतिक षडयंत्र का शिकार होना पड़ा और चार साल तक जेल की सलाखों में न्याय व्यवस्था पर विश्वास करते हुए खामोशी के साथ सिर्फ वक्त का इंतजार करना पड़ा।
    लेकिन प्रदेश के वंचितों, शोषितों, मजदूरों और किसानों का एक बड़ा तबका खामोश नहीं था और था भी !  खामोश इसलिये नहीं था कि उसने यूपी विधानसभा 2012 और लोकसभा 2014 के चुनाव में अपने मत से “ हाथी के मद ” को चूर कर दिया। 80 और शून्य पर लाकर हाँसिये पर खड़ा कर दिया। और खामोश इसलिये भी था कि इनके नेता की तरह इनको भी देश की न्याय व्यवस्था पर विश्वास था।
    हाँ ! बात हो रही है प्रदेश के पिछड़ों व मजलूमों के दिग्गज नेता बाबूसिंह कुशवाहा की। जो एक जमाने में बसपा की रीढ़ माने जाते रहे हैं लेकिन जिस सामंतवाद के खिलाफ इन्होंने बसपा को मजबूती दी उसी सामंतवाद के चलते बसपा ने कुछ लोगों के गुनाहों पर पर्दा डालकर इनको एनआरएचएम घोटाले का आरोपी बना दिया। प्रदेश की 80 फीसदी अतिपिछड़ी जातियां केवल बाबुसिंह कुशवाहा पर भरोसा जता रही हैं। इसका अंदाजा सभी राजनीतिक दलों को है और यही वजह है कि प्रदेश में सभी प्रमुख दलों ने अतिपिछड़ी जातियों को ट्रंप कार्ड के रूप में इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था। बसपा ने आरएस कुशवाहा को आगे किया तो भाजपा ने केशव प्रसाद मौर्य को डिप्टी सीएम के पद से नवाज दिया, सपा ने लीलावती कुशवाहा को एमएलसी बनाया था। वजह सिर्फ एक है 14 प्रतिशत की हिस्सेदारी करने वाले समाज को अपने पक्ष में लाने की। किन्तु आज के परिदृश्य में इस बिरादरी के अलावा अतिपिछड़ी जातियों के नायक और विकल्प सिर्फ और सिर्फ बाबूसिंह कुशवाहा ही हैं।
    परोक्ष रूप से इन्हीं की देन है कि इस समाज के कुछ लोग प्रदेश में कुछ राजनीतिक दलों में शीर्ष में हैं। बाबूसिंह कुशवाहा के जन अधिकार पार्टी का लाल झंडा आज सर्वहारा वर्ग का प्रतीक बनता जा रहा है। मुस्लिम समाज के कई दिग्गज भी जनअधिकार पार्टी के साथ हैं। अवध-पूर्वांचल में अतिपिछड़ी जातियों का घनत्व अधिक है अतः इन लोकसभा सीटों पर जनअधिकार पार्टी का अच्छा खासा प्रभाव दिखेगा।
    इस लोकसभा में काँग्रेस ने जातियों का यह आँकड़ा देखते हुए सम्मान जनक सीटें जाप को दी हैं तथा पटेल बिरादरी के बड़े वोट बैंक को साधने के लिये अपना दल (कृष्णा पटेल) को भी साथ में लेकर यूपी की सियासत में एक नयी इबारत लिखने की तैयारी में लग गयी है। जो इस चुनावी महासमर को अपने झंझावतों से तो अवगत करायेगा ही साथ में मिशन 2022 को फतेह भी करेगा।

    jetendra Gupta
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