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    Home»ब्लॉग

    नक्सली बसवा राजू के आतंक का अंत

    ShagunBy ShagunMay 22, 2025Updated:May 22, 2025 ब्लॉग No Comments6 Mins Read
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    कौन था बसवा राजू : नंबाला केशव राव, उर्फ बसवा राजू, भारत के सबसे खूंखार नक्सली नेताओं में से एक था, जिसे 21 मई 2025 को छत्तीसगढ़ के नारायणपुर-बीजापुर-दंतेवाड़ा ट्राइ-जंक्शन क्षेत्र में अबूझमाड़ के घने जंगलों में सुरक्षा बलों ने एक मुठभेड़ में मार गिराया। इस ऑपरेशन में कुल 27 नक्सलियों को ढेर किया गया, जिसमें बसवा राजू की मौत को नक्सलवाद विरोधी अभियान में एक ऐतिहासिक सफलता माना जा रहा है। सरकार ने उस पर 1.5 करोड़ रुपये का इनाम रखा था, जो उसकी खतरनाक गतिविधियों और माओवादी संगठन में उसकी अहम भूमिका को दर्शाता है।

    बसवा राजू का प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

    बसवा राजू का जन्म 1955 में आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले के जियान्नापेटा गांव में हुआ था। उसने वारंगल के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT) से बीटेक की डिग्री हासिल की थी, जो उसे एक पढ़ा-लिखा और रणनीतिक माओवादी नेता बनाती थी। स्कूल और जूनियर कॉलेज के दौरान वह कबड्डी का खिलाड़ी था, लेकिन 1970 के दशक में माओवादी विचारधारा से प्रभावित होकर उसने नक्सली गतिविधियों में कदम रखा।

    कैसे शामिल हुआ नक्सल आंदोलन में

    बसवा राजू ने 1980 के दशक की शुरुआत में CPIML-पीपुल्स वॉर ग्रुप में शामिल होकर नक्सल आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। 1992 में वह माओवादी संगठन की केंद्रीय समिति का सदस्य बना, और 2004 में CPI (माओवादी) के गठन के बाद उसे सेंट्रल मिलिट्री कमीशन का सचिव नियुक्त किया गया। 2018 में गणपति के इस्तीफे के बाद वह संगठन का महासचिव बना। वह न केवल एक रणनीतिकार था, बल्कि युद्ध कला और गुरिल्ला हमलों में भी माहिर था। उसने लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम (LTTE) से प्रशिक्षण लिया था, जिसने उसे विस्फोटक बनाने और जटिल हमलों की योजना बनाने में निपुण बनाया।

    बसवा राजू कई छद्म नामों से जाना जाता था, जैसे गंगन्ना, विजय, नरसिम्हा रेड्डी, प्रकाश, कृष्णा, उमेश, और कमलू। उसकी पहचान छिपाने की कला इतनी प्रभावी थी कि उसकी आखिरी तस्वीर 30 साल पुरानी थी, और वह 60-70 वर्ष की आयु में भी सुरक्षा बलों के लिए एक रहस्य बना रहा।

    छत्तीसगढ़ के नारायणपुर-बीजापुर सीमा पर वन क्षेत्र में नक्सली मुठभेड़ पर बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक ने बोलें : “छत्तीसगढ़ में मुठभेड़ में मारे गए 27 नक्सलियों में प्रतिबंधित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) का महासचिव बसवराजू भी शामिल है। ऑपरेशन के दौरान डीआरजी का एक जवान शहीद हो गया और कई अन्य घायल हो गए। उन्हें चिकित्सा उपचार दिया गया है और अब वे खतरे से बाहर हैं। मुठभेड़ स्थल पर फिलहाल तलाशी अभियान चल रहा है।

    आतंक का इतिहास

    बसवा राजू को भारत में हुए कई घातक नक्सली हमलों का मास्टरमाइंड माना जाता था। उसकी रणनीतियां इतनी जटिल थीं कि कई बार सुरक्षा बल भी उसके जाल में फंस जाते थे। मीडिया रिपोर्टों से मिले कुछ प्रमुख हमले, जिनमें उसकी संलिप्तता थी, निम्नलिखित हैं:

    1. 2003: अलीपीरी बम विस्फोट
      आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की हत्या का असफल प्रयास। इस हमले में बसवा राजू की रणनीति और विस्फोटक निर्माण की विशेषज्ञता सामने आई थी।
    2. 2010: दंतेवाड़ा नरसंहार
      छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में हुए इस हमले में 76 सीआरपीएफ जवान शहीद हुए थे। यह भारत के इतिहास में सबसे घातक नक्सली हमलों में से एक था, और बसवा राजू इसकी योजना में प्रमुख भूमिका में था।
    3. 2013: झीरम घाटी हमला
      छत्तीसगढ़ में हुए इस हमले में वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं सहित 27 लोग मारे गए थे। इस हमले ने नक्सलियों की क्रूरता को उजागर किया और बसवा राजू की रणनीतिक क्षमता को दर्शाया।
    4. 2019: श्यामगिरी हमला
      इस हमले में बीजेपी विधायक भीमा मंडावी सहित पांच लोग मारे गए थे। बसवा राजू ने इस हमले की योजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
    5. इन हमलों के अलावा, बसवा राजू पर सैकड़ों सुरक्षाकर्मियों और नागरिकों की हत्या का आरोप था। वह नक्सलियों के लिए हथियारों की ट्रेनिंग और रणनीति निर्माण में माहिर था, और उसकी अगुवाई में नक्सली संगठन ने छत्तीसगढ़, तेलंगाना, और अन्य राज्यों में अपने नेटवर्क को मजबूत किया।

    सुरक्षा बलों की कार्रवाई और अंत

    21 मई 2025 को छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ जंगलों में शुरू हुए ‘ऑपरेशन कगार’ में डीआरजी (डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड) और अन्य सुरक्षा बलों ने 50 घंटे से अधिक समय तक चले अभियान में बसवा राजू सहित 27 नक्सलियों को मार गिराया। इस ऑपरेशन में भारी मात्रा में हथियार और विस्फोटक सामग्री भी बरामद की गई।

    प्रधानमंत्री मोदी बोलें : सुरक्षा बलों की यह सफलता बताती है कि नक्सलवाद को जड़ से समाप्त करने की दिशा में हमारा अभियान सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में शांति की स्थापना के साथ उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए हम पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं।

    केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसे “राष्ट्रीय गौरव का क्षण” करार देते हुए कहा कि यह नक्सलवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई में पहली बार है जब एक महासचिव स्तर के नक्सली नेता को ढेर किया गया।

    इस ऑपरेशन के बाद, छत्तीसगढ़, तेलंगाना, और महाराष्ट्र में 54 नक्सलियों को गिरफ्तार किया गया, और 84 ने आत्मसमर्पण किया, जिससे नक्सली संगठन को और कमजोर करने में मदद मिली।

    नक्सलवाद पर प्रभाव
    बसवा राजू की मौत को नक्सल संगठन के लिए पिछले 40 वर्षों में सबसे बड़ा झटका माना जा रहा है। वह न केवल एक कमांडर था, बल्कि संगठन का वैचारिक और रणनीतिक आधार भी था। उसकी अनुपस्थिति में CPI (माओवादी) के नेतृत्व और संगठन में गंभीर संकट पैदा हो सकता है।

    नक्सलवाद का व्यापक परिदृश्य
    नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से हुई थी, और यह आंदोलन माओ त्से तुंग की विचारधारा से प्रेरित था। यह आंदोलन मुख्य रूप से आदिवासी क्षेत्रों में सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष पर आधारित है, जो आर्थिक असमानता और शोषण को समाप्त करने का दावा करता है। हालांकि, नक्सली गतिविधियां हिंसा, वसूली, और विकास कार्यों में बाधा डालने के लिए कुख्यात हैं।

    केंद्र सरकार ने नक्सलवाद को खत्म करने के लिए ‘ऑपरेशन समाधान’ जैसे अभियान शुरू किए हैं, जो कुशल नेतृत्व, आक्रामक रणनीति, और विकास कार्यों पर केंद्रित हैं। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2009-13 की तुलना में 2014-18 में नक्सली हिंसा में कमी आई है, और सरकार का लक्ष्य 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह समाप्त करना है।

    बसवा राजू का आतंक का इतिहास भारत के लिए एक गंभीर चुनौती थी। उसकी रणनीतिक कुशलता, युद्ध कला में महारत, और माओवादी संगठन में शीर्ष नेतृत्व ने उसे सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ा खतरा बनाया था। उसकी मौत न केवल नक्सलवाद के खिलाफ एक बड़ी जीत है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि भारत सरकार और सुरक्षा बल इस खतरे को समाप्त करने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। यह सफलता नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शांति और विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। – रिपोर्ट : सुशील कुमार 

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