राहुल गांधी की सुधरती छवि

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file photo

सटीक टिप्पणी: अमिताभ श्रीवास्तव की वॉल से

जब आपने  Presstitute, News Trader, बाजारू, बिकाऊ, दलाल जैसी अपमानजनक उपाधियों को badge of honour की तरह स्वीकार कर लिया था तो Pliable पर ही सारा स्वाभिमान क्या इसलिए नहीं उबल पड़ा है कि इस बार ताना विपक्ष के नेता ने मारा है? वह भी उन राहुल गांधी ने जो कल तक मीडिया में चुटकुलों और चकल्लस का विषय होते थे! यह सही है कि राहुल गांधी को अपनी सुधरती हुई छवि के बीच इस तरह की अभिव्यक्तियों से यथासंभव परहेज़ करना चाहिए लेकिन उनको यह कहने का मौका मिला क्यों, इस सवाल पर भी ईमानदारी से मीडिया मंचों पर चर्चा होनी चाहिए।

कांग्रेस और राहुल गांधी की भर्त्सना ज़रूर करिये लेकिन मीडिया को फिलहाल अपने गिरेबान में भी झांक कर देखने की सख्त ज़रूरत है। हाल-फिलहाल में बीजेपी, केंद्र सरकार और राज्यों की बीजेपी सरकारों की चरण वंदना ने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड दिए हैं। Pliability is bitter truth of media in India today . बीजेपी का नेता बीजेपी परस्त पत्रकार को, बीजेपी कवर करने वाले पत्रकार को और/या ऐसे पत्रकार को इंटरव्यू देना पसंद करता है जिसके साथ वह comfortable महसूस करता है। यही हाल कांग्रेस और बाकी तमाम छोटी-बड़ी पार्टियों का है। किसी को अब तीखे सवाल पूछने वाले पत्रकार पसंद नहीं हैं।

पत्रकार और मीडिया संस्थान भी नेताओं के साथ अपने संबंध बिगाड़ना नहीं चाहते। राजनीतिक इंटरव्यू भी अब चालू/चलताऊ किस्म की फिल्मी पत्रकारिता की तरह ज़्यादातर पीआर का हिस्सा हैं, इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता। नेताओं को मीडिया चाहिए, मीडिया को नेता। और अब इस रिश्ते में मिठास, नरमी, दोस्ती, pliability वगैरह खबरों के पुराने तौर-तरीकों से आगे जाकर बड़े-बड़े मीडिया समारोहों और इवेंट्स में नेताओं की भीड़ जुटाने के लिए ज़रूरी बन गई है।

अफसोस की बात यह है कि कुछ नामी-गिरामी लोगों की वजह पूरे मीडिया का दामन दाग़दार हो चुका है और आम लोगों की नज़रों में अब पत्रकारों के लिए पहले जैसा सम्मान नहीं रहा है। यह गंभीर समस्या है और इस पर खुल कर बेबाकी से बात होनी चाहिए।

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