मामला मानवाधिकार का नहीं, न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास का है

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सोशल मीडिया पर सुलगते सवाल

बलात्कारियों के पुलिस एनकाउंटर पर ख़ुशी मनाने वालों को शायद यह अहसास नहीं है कि वे पुलिसिया बर्बरता के लिए रास्ते चौड़े कर रहे हैं। पुलिस किसी को भी अपराधी बताकर मुठभेड़ में मार देगी और लोग तालियां बजाते रहेंगे। बस्तर के आदिवासियों की पुलिस मुठभेड़ में हत्या की ख़बर याद कर लें। हमारा ज़ोर हमारी न्याय व्यवस्था को मज़बूत, पारदर्शी बनाने पर होना चाहिए, न्याय मिले और जल्दी मिले इसके लिए आवाज़ उठानी चाहिए न कि पुलिस मुठभेड़ों में आरोपियों-अपराधियों के मारे जाने का समर्थन करना चाहिए। मामला मानवाधिकार का नहीं, न्यायिक प्रक्रिया में विश्वास का है।


हैदराबाद एनकाउंटर मामले पर लोगों की प्रतिक्रियाएं दुखद हैं और डराने वाली भी। हैदराबाद एनकाउंटर में कम से कम आरोपियों के भागने की कोशिश, हथियार छीनने, हमले की कोशिश वगैरह के बाद पुलिस के गोली चलाने की बात सामने आ रही है। लेकिन लोग जोश और उत्तेजना में कह रहे हैं हां अब हर जगह एनकाउंटर ही होना चाहिए। लोगों को लग रहा है यही इलाज है। ऐसा कहने वालों में आम लोगों के साथ-साथ नेता, अभिनेता, पत्रकार, साहित्यकार भी शामिल हैं। यह दिखाता है कि समाज किस क़दर हिंसक और अराजक हो चुका है।

लोगों का भरोसा हर तरह की व्यवस्था और प्रक्रिया से उठ गया है। सरकार, प्रशासन, अदालतें, पुलिस वगैरह लोगों का भरोसा न्याय प्रक्रिया में बनाते रखने में नाकाम रहे हैं तो बेहतर है अब सरकारें जिस तरह टीबी, मलेरिया, एनीमिया के मरीजों को दवा की गोलियां बांटतीं हैं , पीडीएस के तहत अनाज बांटती हैं, उसी तरह सस्ती दरों पर हथियार और लाइसेंस भी मुहैया कराने की स्कीम लाई जानी चाहिए।

हथियार निर्माण के कई कारखाने खुलेंगे तो लोगों को रोज़गार भी मिलेगा, सरकार को कारखानों से, हथियार बेचने वाली दुकानों से और खरीदने वाले ग्राहकों से राजस्व भी मिलेगा। लाइसेंस की फीस की आमदनी अलग। लोगों को हथियार मिल जाएंगे तो वे किसी आईपीसी, सीपीसी, सीआरपीसी, पुलिस, कोर्ट-कचहरी के फेर में नहीं पड़ेंगे, सब ख़ुद ही न्याय हासिल कर लेंगे। आत्मनिर्भरता, स्वावलंबन पर आधारित पूर्ण स्वराज का स्वप्न साकार होगा। यही होना बचा है अब।

  • वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव की वॉल से

बलात्कार की बढ़ती घटनाओं के विरोध में प्रदर्शन:

प्रदेश में बिगड़ती कानून व्यवस्था और महिलाओं तथा बच्चियों के प्रति दुष्कर्म की बढ़ती घटनाओं के विरोध में आज हजरतगंज लखनऊ स्थित गांधीजी की प्रतिमा पर समाजवादी महिला सभा ने धरना दिया। धरना के पश्चात् महामहिम राज्यपाल जी को सम्बोधित ज्ञापन में भाजपा की नाकारा सरकार के विरूद्ध संवैधानिक कार्यवाही किए जाने की मांग की गई। विरोध प्रदर्शन तथा धरना स्थल पर श्रीमती जूही सिंह, डाॅ मधु गुप्ता, श्रीमती लीलावती कुशवाहा, श्रीमती गीता सिंह, श्रीमती मीरा वर्धन, श्रीमती शीला सिंह आदि शामिल रहीं।


निर्भया फंड का पैसा अभी तक क्यों नहीं खर्च किया गया ? 

 
वह पुलिस जो हैदराबाद की चिकित्सक के साथ अनहोनी की सूचना मिलने पर चार घंटे तक. “यह मेरे थाने का मामला नहीं “, “तुम्हारी बेटी किसी मित्र के साथ चली गयी होगी ” जैसी बात करती रही . रात साढ़े ग्यारह बजे तक वह बच्ची ज़िंदा थी और पुलिस थाने से बाहर नहीं निकली थी. 
 
वह पुलिस जिसने बगैर जब्ती, पड़ताल के मुजरिमों को जेल भेज दिया और बाद में पुलिस कस्टडी मांगी, आधी रात के बाद हथकड़ी लगा कर, सौ से ज्यादा पुलिस वाले उन्हें ले कर जाते हैं . इस पर चार अपराधी (?) भाग जाते हैं, पुलिस के हथियार छीन कर —- फिर पुलिस को याद आता है की अरे उनके पास भी असलहा हैं.
 
ध्यान से देखें यह सारी घटना पुलिस के निकम्मेपन, लापरवाही की कहानी है — ज़रा एक बार अपने अपने राज्य में– स्वाति मालीवाल भी — यह बता दें कि निर्भया फंड का कितना पैसा अभी तक क्यों नहीं खर्च किया गया ? 
 
हैदराबाद पुलिस ने महज तीन पुलिस वालों को सस्पेंड किया, इस तरह एक बच्ची की जिंदगी पुलिस के निकम्मेपन से गयी तो उन पुलिस वालो को 120 बी में सह अभियुक्त क्यों नहीं बनाया गया — फूल उड़ाने, जय जयकार करने से पहले इस खाकी की कोताही पर गौर करने बात है। 
 
  • वरिष्ठ पत्रकार पंकज चतुर्वेदी की वॉल से

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